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उ.प्र. :: मां के इस मंदिर से कोई भक्त नहीं लौटता निराश – पुजारी नरेश सैनी

लखनऊ (राज प्रताप सिंह) : कभी अवध प्रांत की और अब उत्तर प्रदेश की राजधानी के रूप में हिन्दुस्तान की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र मानी जाने वाली, लखनऊ नगरी में अंग्रेजों और अवध के नवाबों के ऐश्वर्य की चुगली करती बारादरी, छतर मंजिल, इमामबाड़ा रेजीडेन्सी और चारबाग स्टेशन जैसी इमारतों की गरिमा में डूबी इस नगरी की प्राणरेखा गोमती नदी के किनारे अनेक ऐसे पौराणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल मौजूद हैं जहां रमणीकता, श्रद्धा एवं विश्वास लाखों लोगों को खींच ले जाता है। ऐसे ही पौराणिक स्थलों में है लखनऊ से लगभग 28 किमी. दूर सीतापुर रोड पर मुख्य मार्ग से लगभग 6 किमी. दूर घने जंगलों के बीच स्थापित चंद्रिका देवी मंदिर ।  मंदिर स्थल तीन ओर से गोमती नदी से घिरा हुआ है। इस स्थल को एक छोटा टापू भी कहा जा सकता है। लोक विश्वास के अनुसार इस मंदिर को मूल रूप से त्रेता युग में श्री राम के भाई लक्ष्मण जी के पुत्र चन्द्रकेश ने स्थापित किया था। कहते हैं कि एक बार सेना के साथ जब राजकुमार चन्द्रकेश इस स्थल से गुजर रहे थे तो चलते-चलते रात हो गयी। घना जंगल, दूर तक आबादी या शरणस्थल का नामोनिशान तक नहीं, चारों ओर अंधकार। घबराकर राजकुमार ने मां की अराधना की तो पल भर में ही वहां चांदनी फैल गयी और मां के दर्शन हुए। इसी के बाद कृतज्ञ राजकुमार ने इस मंदिर की स्थापना की। इस स्थल के निकटतम गांव कठवारा ही मुख्य पुजारी का निवास स्थल है। मंदिर में मां की पिंडियों के बाईं ओर बाद में दुर्गा जी, हनुमान जी एवं सरस्वती जी के विग्रहों की स्थापना स्थानीय भक्तों के सहयोग से की गई।पौराणिक सन्दर्भों से समृद्ध आस्था का केंद्र यह स्थल स्थानीय निवासियों के लिये तो अनवरत आकर्षण का केंद्र है।
चंद्रिका देवी मंदिर में बसी है लखनऊ की आस्था
कहा जाता है कि गोमती नदी के समीप स्थित महीसागर संगम तीर्थ के तट पर एक पुरातन नीम के वृक्ष के कोटर में नौ दुर्गाओं के साथ उनकी वेदियाँ चिरकाल से सुरक्षित रखी हुई हैं। गांव वालों के अनुसार पांडव अपने वनवास के समय द्रोपदी के सात इस तीर्थ पर आए थे और आश्वमेघ यज्ञ कर घोड़ा छोड़ा था, जिससे इस क्षेत्र के तात्कालिक राना हंशध्वज द्वारा रोके जाने पर युद्धुष्ठिर की सेना से उन्हें युद्ध करना पड़ा था। युद्ध के समय एक पुत्र सुधन्वा का माता के मंदिर में पूजा अर्चना करते रहने की वजह से उसे खौलते तेल में डाल दिया गया था। मां की कृपा से उसके शरीर पर कोई आंच नहीं आई थी।
चंद्रिका देवी मंदिर के पास बने महिसागर तीर्थी की भी आपनी मान्यता है। लोगों के अनुसार इस तीर्थ में घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने तप किया था। ये तीर्थ मनोकामनीपूर्ती व पापों को नाश करने के लिए माना जाता है।
मंदिर की तीन दिशाओं में गोमती नदी है तथा एक ओर संगम जो मंदिर को पर्यटन के लिहाज से भी खास है। मंदिन की मान्यता व लोकप्रियता के चलते यहां हर महीने की आमावस्या को मेला लगता है। जिसमें तमाम भक्त शामिल होतेहै। अठारहवीं सदी के पूर्वार्द्ध से यहां मां चंद्रिका देवी मंदिर का भव्य मंदिर बना हुआ है। ऊंचे चबूतरे पर एक मठ बनवाकर पूजा-अर्चना के साथ देवी भक्तों के लिए प्रत्येक महीने की अमावस्या को मेला लगता था, जिसकी परम्परा आज भी जारी है। 
श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए मां के दरबार में आकर मन्नत मांगते हैं, चुनरीकी गांठ बांधते हैं तथा मनोकामनापूरी होने पर मां को चुनरी, प्रसाद चढ़ाकर मंदिर परिसर में घण्टा बांधते हैं। अमीर हो अथवा गरीब, अगड़ाहो अथवा पिछड़ा, मां चन्द्रिका देवी के दरबार में सभी को समान अधिकार है। मां के मंदिर में पूजा-अर्चना पिछड़ा वर्ग के मालियों द्वारा तथा पछुआ देव के स्थान (भैरवनाथ)पर आराधना अनुसूचित जाति के पासियों द्वारा कराई जाती है। ऐसा उदाहरण दूसरी जगह मिलना मुश्किलहै। स्कन्दपुराण के अनुसार द्वापर युग में घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने मां चन्द्रिका देवी धामस्थित महीसागर संगम में तपकिया था। आज भी करोड़ों भक्त यहां महारथी वीर बर्बरीक की पूजा-आराधना करते हैं।

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