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विशेष :: सरकार की उपेक्षाओं का शिकार विश्वकर्मा समुदाय, कर रहा अपनी मौलिक अधिकारों की मांग

नई दिल्ली (दिबाकर कुंडू) : विश्वकर्मा समुदाय ने भारत सरकार से अपने विश्वकर्मा समुदाय की गौरवशाली पहचान वापस लाने एवं मौलिक अधिकारों को सौंपने को लेकर प्रेस वार्ता कर पांच सूत्री मांग पत्र प्रस्तुत की। प्रेस वार्ता में स्वामी शिवात्मानंद सरस्वती की ओर से बताया गया कि हमारा समुदाय “ द विश्वकर्मा समुदाय – सनातन वैदिक शिल्प विश्वकर्मा ब्राह्मण समुदाय” आमतौर पर और व्यापक रूप से “ शिल्पकला के स्वामी “ के नाम से जाना जाता रहा है। हजारों सालों से शिल्प और वास्तुशास्त्र की परंपरा से बहुत बड़े योगदान से उच्च विरासत और संस्कृति का निर्माण करता रहा है। विश्व प्रसिद्ध कोणार्क का सूर्य मंदिर, जगन्नाथ पुरी मंदिर, भुवनेश्वर का लिंग राजा मंदिर, अजंता और एलोरा गुफा मंदिर, एलोरा में कैलाश मंदिर (एक चट्टान से खुदी हुई), महाबलीपुरम में रॉक मंदिर और बहुत से कार्य विश्वकर्मा समुदाय के महान कार्यो की गवाही हैं। श्री ज्ञानानंद आश्रम के एस वी वेनुगोपालाचार्य के अनुसार स्वतंत्रता से पहले और बाद में भी विश्वकर्मा समुदाय को मौलिक अधिकारों से वंचित किया गया है। जनगणना के लिए नियुक्त सरकारी और गैसरकारी नौकरों की अज्ञानता के कारण, भारत में 11% से ज्यादा जनसंख्या के समुदाय को अनेक सूक्ष्म खंडों में विभाजित कर दिया गया है। पहले की सरकारो ने विश्वकर्मा समुदाय की बड़ी आबादी को बड़ी और मुख्य जनसंख्या नहीं माना, इसलिए राज्यसभा और लोकसभा में जनसंख्या के आधार पर नोमिनेशन उपेक्षित किया। अध्यक्ष दिनेश कुमार विश्वकर्मा ( वत्स ) ने कहा कि विश्वकर्मा समुदाय के बेरोजगार व गरीब युवाओं को सहायता प्रदान करने के लिए भारत सरकार ने “विश्वकर्मा सर्व सम्मान” नाम से एक योजना लागू की और करीब रु 1000 / – करोड़ धनराशि आवंटित की ये धनराशि आर्टिसन (कारीगर) विभाग को दी। जहां अन्य समुदाय के लोगों को भी वित्त पोषित / लाभान्वित किया जा रहा हैं। अतः ये योजना अपने मुख्य उद्देश्यों को पूरा और सही तरीके के क्रियांवित नहीं हो रही है। इन सभी बिंदुओं पर इनकी पांच सूत्री मांग इस प्रकार हैं –

1. सरकार देश में किसी भी जगह विश्वविद्यालय की स्थापन करे. ये विश्वविद्यालय हजारों साल पुरानी परंपरागत समुदाय कौशल कला “ पत्थर पर शिल्पकारी, सोने से शिल्पकारी, ताम्बे पर शिल्पकारी, लकड़ी पर शिल्पकारी व नक्काशी और वास्तुशास्त्र के गहन अध्ययन का केंद्र होगा. इस विश्वविद्यालय का नाम “ विश्वकर्मा विश्व विद्यालय“ हो.

2. भारत सरकार देश भर के विश्वकर्मा समुदाय की भावनाओं का सम्मान करते हुये “ कन्या संऋमण ” यानि 17 सितम्बर को विश्वकर्मा जयंती पर “ राजपत्रित ( सार्वजनिक ) अवकाश ” घोषित करे और इसे ” देव शिल्पी विश्वकर्मा जयंती ” के रूप में देश और राज्य स्तर पर सरकारी कोष से भव्य उत्सव के रुप मे मनायें। 

3. विश्वकर्मा समुदाय के सदस्यों की एक समिति का गठन करे जो केवल विश्वकर्मा समुदाय के युवाओं को “विश्वकर्मा सर्व सम्मान” योजन” से धन के आवंटित / लाभ / अनियमित्ताओं पर निगरानी और नजर रख सके।

4. भारत सरकार अब विश्वकर्मा समुदाय की वर्तमान जनसंख्या पर अध्ययन और रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिये प्रख्यात व्यक्तित्व लोगों का आयोग गठन करें और इसके आधार पर राज्यसभा और लोकसभा में विश्वकर्मा समुदाय के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के नामांकन पर विचार करे।

5. प्राचीन, ऐतिहासिक स्मारकों, मंदिरों, विरासत स्थलों से सरकार द्वारा अर्जित राजस्व का कुछ हिस्सा विश्वकर्मा समुदाय के कल्याण पर खर्च किया जाए। 

गौरवशाली अतीत रहा है विश्वकर्मा समुदाय का

भारत हज़ारो हजारो सालों से समृद्ध संस्कृति और विरासत के साथ एक विशाल देश है। शायद हजारों समुदाय तो नहीं मगर सैकड़ों समुदायों जिनमें से प्रत्येक ने हमारे देश की विरासत की समृद्धि में योगदान दिया है। ऐसा एक समुदाय विश्वकर्मा समुदाय है ।
“ द विश्वकर्मा समुदाय – सनातन वैदिक शिल्प विश्वकर्मा ब्राह्मण समुदाय” आमतौर पर और व्यापक रूप से “ शिल्पकला के स्वामी “ के नाम से जाना जाता रहा है,जिसने भारत की शिल्प और वास्तुशास्त्र परंपरा के लिए बहुत योगदान दिया है। शिल्पकला में पत्थर की प्रतिमायें और मंदिर के लिये पत्थरों की मूर्तियों, कांस्य/पीतल/कांसा/पंच धातु की प्रतिमायें और मूर्तियों, लकड़ी की नक्काशी, प्रतिमायें और मूर्तियां आदि का निर्माण करना होता है। प्रत्येक काम मे बारीक जानकारी, अच्छी कल्पना, रचनात्मकता और ध्यान काम करने की आवश्यकता होती है। विश्वकर्मा समुदाय द्वारा बनाई गई मूर्तियां आज भी सजीव और ऊंचाईयों को छुती है जो मूर्तिकारों की रचनात्मकता और समर्पण को उजागर करती हैं।

जगन्नाथपुरी मंदिर, जहां भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा हर साल निकाली जाती है, विश्व प्रसिद्ध कोणार्क का सूर्य मंदिर, भुवनेश्वर के लिंगराजा मंदिर, महाराष्ट्र में विश्व प्रसिद्ध अजंता और एलोरा गुफा मंदिर, एलोरा में कैलाश मंदिर, यह कैलाश मंदिर एक निर्मित मंदिर नहीं है बल्कि एक बहुत बड़ी चट्टान से ऊपर से नीचे तक काट एक मंदिर बनाया गया है। इस मंदिर की अकाल्पनिक भव्यता को देख कर लोग आश्चर्य चकित और दिमाग घुम जाते है आज तक यह मंदिर आधुनिक बिल्डरों / वास्तुकारों और वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती है। कोणार्क मंदिर में मंदिर के शीर्षतम भाग में एक 52 टन का एकल पत्थर पाया जाता है। यह एक रहस्य बना हुआ है कि इस भारी भरकम चट्टान को कैसे ऊपर उठाया गया और शीर्ष पर रखा गया. कोई भी, मशहूर महाबलिपुरम जो चेन्नई से 40 किलोमीटर की दूरी पर है का दौरा करके- यह देख सकता है कि मूर्तिकला में सभी संभव है। इस समुद्र तट में कई मूर्तियां, पत्थर की नक्काशी और मंदिर पाए जाते हैं जो केवल एक बहुत बड़ी चट्टान से ऊपर से नीचे तक काट बनाये है जो यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि ये मनुष्य द्वारा निर्मित या खुद भगवानों द्वारा बनाये गये है। बेलुरु और हलाबिडु के होयसाला स्थान में विश्व प्रसिद्ध और महान वास्तुकला के मंदिर है जिनकी भव्यता को देख कर न केवल अचरज बलिक श्वासों को रोक देने वाली मूर्ति कला देखी जा सकती है. बादामी, आयहोले, पट्टादलकुरु में चालुक शैली में गुफा मंदिरों और अन्य मंदिरों में मूर्तियां इसके अलावा कर्नाटक और अन्य दक्षिण भारत के कई शहरों में कई मंदिर और गुफा हैं जो विश्वकर्मा समुदाय के महान काम की गवाही देते हैं।

अपनी हस्तकला द्वारा विश्वकर्मा शिल्पीयों ने दुनिया के लाखों लाख लोगों को पूजा करने के लिए एक रूप दिया है। उन्होंने भावनाओ और भक्ति को प्रतिमाओं , मुर्तियों , मंदिरो और गुफाओ का आकार दिया है उपरोक्त स्थान सभी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थलों है और दुनिया भर के पर्यटक जो पूजा और कला के पुजारी है इन स्थानों में बढ़ रहे हैं जिससे देश को विदेशी मुद्रा में लाखों डॉलर में सक्षम बनाया जा रहा है । इस प्रकार विश्वकर्मा समुदाय ने देश के सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक कल्याण में योगदान दिया है।
इस तरह की उपलब्धियां हजारों व सैकड़ों साल पहले संभव थी क्योंकि समुदाय को तत्कालीन शासकों से लगातार समर्थन प्राप्त था जिससे उनकी ख्याति दूर दूर तक फैली । लेकिन अब यह समुदाय सबसे अधिक उपेक्षित, सबसे अपरिचित समुदाय के रूप में खड़ा है, जिसे सरकारों ने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से सहयोग न करके पीछे धकेल दिया है। उनके मूल शिल्पकला और इनकी रचनात्मकता का भविष्य अंधकारमय दिखता है. रोजी रोटी के लिये समुदाय रोजगार और व्यवसाय के अन्य रूपों को अपना रहे हैं। वास्तिवक्त यह शरीर के अंगों में से एक को खोने की तरह होगा।

गौरतलब है कि विश्वकर्मा समुदाय की महिमा को पुनः प्राप्त और स्थापित करने के प्रयास में, “अखिल भारत विश्वकर्मा साधु-संत समावेश” नामक एक समावेश, स्वामी शिवात्मानंद सरस्वती जी, बैंगलुरु ने आयोजित किया था। समावेश 5, 6 और 7 मई को श्री श्री रविशंकर गुरु जी, कनकपुर रोड, बंगलुरु के आश्रम में आयोजित किया गया। श्री श्री रविशंकर गुरुजी द्वारा साधु-संत समावेश का उद्घाटन किया गया और उन्होंने समावेश के दौरान आशीर्वाद भाषण भी दिया। भारत के सभी राज्यों से मठ्ठाधिपतियो, पिठ्ठाधिपतियो, साधु और संत, आईएएस, आईपीएस अधिकारियों और प्रसिद्ध राजनेताओं (वीआईपी), विश्वकर्मासमुदाय( मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ) के 500 से ज्यादा सदस्य शामिल हुए। स्वामी शिवात्मानंद सरस्वती जी के भगीरथ प्रयासों का स्वागत किया। तीन दिवसीय समावेश के समापन से पहले बारह संकल्प विश्वकर्मा समुदाय को लाभान्वित करने और विश्वकर्मा समुदाय की दिव्या महिमा वापस पाने के लिए पारित हुए थे। 

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