सौराठ सभा :: तीस सालों बाद मिथिला की संस्कृति पुनर्जीवित, तय हुईं 365 शादियां

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डेस्क : तीस वर्षों के बाद मिथिला की सभ्यता और संस्कृति पुनर्जीवित होती दिखी। ‘सौराठ सभा’ में इस वर्ष 365 शादियां तय हुईं । मैथिल ब्राह्मणों ने 700 साल पहले करीब वर्ष 1310 में एक प्रथा शुरू की थी, ताकि विवाह संबंध अच्छे कुलों के बीच तय हो सके। 1971 में यहां करीब डेढ़ लाख लोग आए थे, उसके बाद आगंतुकों की संख्या काफी घट गई। इस वर्ष आगंतुकों की संख्या एक बार फिर बढ़ी है।

परंपरा के मुताबिक, यहां पहले गुरुकुल से सीधे योग्य युवकों को सौराठ सभागाछी में लाया जाता था और उन योग्य शिक्षित युवकों के प्रतिभा को देखकर अपने स्वजनों के लायक उचित वर समझकर गुरुजनों से आज्ञा लेते थे और विवाह तय होते थे.

इस दौरान यह भी देखा जाता था कि लड़कों के पैतृक परिवार के सात पुश्तों में और मातृक परिवार के पांच पुश्तों में पहले कभी सीधा रक्त संबंध नहीं बने हों. इसके बाद गुरुजन ‘अधिकार निर्णय’ करवाते थे, ऐसे अधिकार निर्णय को एक ताड़ के पत्ते पर लाल स्याही से लिखवाया जाता था, जिसे ‘सिद्धांत’ कहा जाता था. इसके बाद शादी तय होती थी.

 तीन दशक पहले मिथिलांचल के अधिकांश युवक, युवतियों की शादी, या यूं कहें कि हर अविवाहित लड़का-लड़के की शादी सौराठ सभा में ही तय होती थी.  न दहेज का लेन-देन और न बरात में आज के जमाने जैसा ताम-झाम और खर्च. कन्या पक्ष सौराठ सभा में आकर योग्य वर को पसंद करते, दोनों पक्षों में वहीं बात तय होती.

उसी रात या एक-दो दिन बाद शादी हो जाती. खाना भी परंपरागत तरीके से ही बरातियों को परोसा जाता. धीरे-धीरे दहेज की बात चली, तो सौराठ सभा में लोगों के आने की संख्या में भी कमी आती गयी.  दो दशक में तो सौराठ सभा वास की खानापूरी ही होती रही. इस साल इस सभा को विभिन्न संगठनों ने पुनर्जीवित करने की पहल की, तो इसका असर भी दिखा. न सिर्फ अन्य सालों की अपेक्षा इसमें आने वाले लोगों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई बल्कि सालों बाद इस सभा से पुराने जमाने की तरह ही एक शादी भी तय हुई. इसे अपनी संस्कृति को बचाने के साथ दहेज मुक्त शादी को बढ़ावा देने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है.

मधुबनी के जिलाधिकारी शीर्षत कपिल अशोक भी इस सभा में पहुंचे और इस अभियान की प्रशंसा की. उन्होंने कहा कि किसी भी परंपरा को जीवित रखना आने वाली पीढ़ी के लिए आवश्यक है. आने वाली पीढ़ी अपनी परंपरा से ही अपने संस्कार और परंपराएं सीखती है.

दरभंगा के कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति सर्वनारायण झा इस वर्ष सौराठ सभा की सफलता पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहते हैं, “इस वर्ष प्रबुद्धजनों की मेहनत रंग लाई और उसका परिणाम है कि मिथिला की सभ्यता और संस्कृति पुनर्जीवित होती दिखी.”

 

 ‘चलू सौराठ सभा’ अभियान सफल 

मिथिलालोक फाउंडेशन के चेयरमैन और शिक्षाविद् डॉ़ बीरबल झा इसकी सफलता पर कहते हैं, ‘यह केवल मिथिलालोक फाउंडेशन की ही मेहनत का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें सभी का सहयोग रहा. इस सभा को पुनर्जीवित करने के लिए न केवल जनजागरण अभियान चलाया गया, बल्कि ‘चलू सौराठ सभा’ के माध्यम से लोगों को सभा में आने का निमंत्रण दिया गया.’उन्होंने कहा, ‘सौराठ सभा वैवाहिक संस्था है, इसको मजबूत किया जाना चाहिए। मिथिला विश्व के लिए एक आदर्श बन सकता है। यहां दस लाख की जनसंख्या में एक भी शादी टूटने की बात सुनने को नहीं मिलेगी।’

सौराठ सभा में पारंपरिक पंजीकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. यहां जो रिश्ता तय होता है, उसे मान्यता पंजीकार ही देते हैं. पंजीकार के पास वर और कन्या पक्ष की वंशावली रहती है. वे दोनों तरफ की उतेढ़ (विवाह का रिकर्ड) का मिलान करते हैं. दोनों पक्षों के उतेढ़ देखने पर जब पुष्टि हो जाती है कि दोनों परिवारों के बीच सात पीढ़ियों में इससे पहले कोई वैवाहिक संबंध नहीं हुआ है, तब पंजीकार कहते हैं, ‘अधिकार होइए! यानी पहले से रक्त संबंध नहीं है, इसलिए रिश्ता पक्का करने में कोई हर्ज नहीं.

 सौराठ में शादियां तय करवाने वाले पंजीकार विश्वमोहन चंद्र मिश्र बताते हैं, “मैथिल ब्राह्मणों ने 700 साल पहले करीब सन् 1310 में यह प्रथा शुरू की थी, ताकि विवाह संबंध अच्छे कुलों के बीच तय हो सके. सन् 1971 में यहां करीब डेढ़ लाख लोग आए थे, उसके बाद आगंतुकों की संख्या काफी घट गई. इस वर्ष आगंतुकों की संख्या एक बार फिर बढ़ी है.”

इस वर्ष ‘सौराठ सभा’ में मिथिला की प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए मिथिलालोक फाउंडेशन द्वारा एक संगोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें शास्त्रार्थ के तहत बौद्धिक विमर्श की शुरुआत की गई. इस विमर्श में मिथिला क्षेत्र के अनेक विद्वानों ने विभिन्न समसामयिक विषयों पर न केवल विचार-विमर्श किया, बल्कि इस परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प भी लिया.