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444 फीट ऊंचाई पर बना है भारेश्वर मंदिर, पांडवों के अज्ञातवास का गवाह माना जाता है चंबल का भारेश्वर मंदिर

-श्रीयमुना-चंबल की कगारों में स्थिति भारेश्वर मंदिर पर सैकड़ों कांवरियों ने श्रद्धा पूर्वक जलाभिषेक किया

प्रभारी निरीक्षक थाना भरेह मोहम्मद कामिल ने अपने सहयोगी स्टाफ की मदद से खुद के मैस में तैयार किया प्रसाद श्रद्धालुओं को श्रद्धा के साथ किया वितरण

मंदिर परिसर में श्रद्धालू शिवपुरांण व्यासपीठ से व्यास जगमोहन त्रिपाठी व 8 वर्षीय उपव्यास विट्ठल त्रिपाठी के युगल संगम में श्रद्धालु हो रहे आनंदित

(डाँ0एस.बी.एस. चौहान/अरविंद राजावत)
चकरनगर/इटावा। चंबलनदी के किनारे स्थापित भारेश्वर महादेव का हजारों साल पुराना मंदिर महाभारत के मुख्य पात्र पांडवों की व आज के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। भारेश्वर मंदिर 444 फीट ऊंचाई पर बना है, जहां तक पहुंचने के लिए 108 सीढ़ियां हैं। स्वतंत्रता संग्राम से भी इस मंदिर का ताल्लुक रहा है। बताते हैं कि भरेह के राजा रूपसिंह ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ इस स्थल पर सेना की प्रशिक्षण कार्यशाला बनाई थी। जानकार बताते हैं कि एक बार जब अंग्रेजों ने मंदिर को घेर लिया तो मंदिर से निकले बर्रो ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।

श्रीयमुना-चंबल संगम पर स्थित भारेश्वर महादेव मंदिर प्राचीन काल से आध्यात्मिक ज्ञान एवं तपस्या का केंद्र रहा है। मान्यता है कि विद्वान नीलकंठ ने कर्मकांड एवं दंड के 12 मयूक (ग्रंथ) एवं आयुर्वेदिक ग्रंथ इसी मंदिर में रहकर लिखे थे।

आगरा जाते समय गोस्वामी तुलसीदास भी इस मंदिर में कुछ समय रहे। परमहंस गुंधारी लाल ने भारेश्वर महाराज की तपस्या कर अपना कर्मक्षेत्र ग्राम बडे़रा को बनाया। परमहंस पुरुषेात्तम दास महाराज ने बिना भोजन व जल के भोलेनाथ की तपस्या की।भागवताचार्य पंडित रजनीश त्रिपाठी के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के समय भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर शंकर भगवान की आराधना हेतु भीमसेन द्वार व शंकर की विशाल पिंडी की स्थापना की थी, जिसकी द्रोपदी सहित पांचों पांडवों ने पूजा अर्चना की थी। मान्यता के अनुसार जो भक्त भगवान भोले नाथ की पूजा करके बाहर नंदी के कांन में जो भी मनोकामना कहकर मांगता है। वह शीघ्र ही पूरी हो जाती है।

महाशिवरात्रि के पर्व काल में यहां पर शिव पुराण का कार्यक्रम भी चल रहा है जहां पर व्यास जगमोहन त्रिपाठी ने बताया भारेश्वर मंदिर पर आए श्रद्धालु खाली हांथ और भरे हाथ खुशियों के साथ लौट कर जाते हैं। श्री त्रिपाठी व्यास जी ने मंदिर के और भगवान शंकर के विषय में कई महत्वपूर्ण विचार भी साझा किए उसके बाद उन्होंने बताया कि मैं वृंदावन में छठी ग्रह के पास श्रीजी आश्रम से आया हूं और वैसे हमारी पैतृक जन्मभूमि दिबियापुर है हमारा बेटा विट्ठल त्रिपाठी जो उपव्यास के रूप में है कथा कहता है जो इस समय कक्षा चार में अध्ययन भी कर रहा है जब हमारे संवाददाता ने प्रश्न किया कि जब उप व्यास 8 साल का कक्षा चार में पढ़ रहा है तो ग्रंथों का अध्ययन कैसे हुआ?

तो श्रीव्यास जी ने बताया कि यही सुसंस्कार और संयोग की बात है हमारी धर्मपत्नी भी कथावाचक है और मैं स्वतः कथावाचक हूं जब बच्चे को शुरू से ही संस्कार दिए गए तो वह धड़ाधड़ संस्कृत में बात करता हुआ वेद पुराणों की अच्छी जानकारी रखता है। भक्त बेहद शांतिपूर्ण तरीके से बच्चे की ओजस्वी वाणी को श्रवणकर अपने को धन्य समझते हैं। यह एक सुंदर पहल है यह है सनातन का प्रभाव! हजारों की तादाद में कांवरियों ने भगवान शंकर का काँवरें चढ़ा कर महाभिषेक किया तो वहीं अपनी अपनी मन्नते भी मांगी।

आपको बताते चलें जहाँ एक तरफ श्रद्धा से ओतपप्रोत श्रद्धालुओं ने घंटो लाइन में लगकर बाबा के दर्शन किए तो बहीं भरेह थाना प्रभारी निरीक्षक मु0 कामिल ने अपने स्टाफ व सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ प्रसाद वितरण किया यह प्रसाद जो प्रभारी निरीक्षक ने अपने थाना स्टाफ के सहयोग से खुद शुद्ध तरीके से मैंस में तैयार करवाया था। आपको बता दें कि वहीं जिलाधिकारी अवनीश राय ने बीते दिवस मंदिर का निरीक्षण कर हर संभव स्थानीय प्रशासन को निर्देश दिया था कि किसी भी प्रकार से श्रद्धालुओं को असुविधा न हो। इसका असर आज दिखा लेखपाल विवेक यादव ने वताया हम सब लेखपाल कल रात से ही अपनी डियूटी पर हैं,और सामाजिक कार्यकर्ता( स्वयंसेवक/ वॉलिंटियर) भी लगातार सहयोग कर रहे हैं।

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