साक्षात्कार :: मैंने प्रण लिया है मैथिली सिनेमा के जिर्णोधार का – कुणाल ठाकुर !

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मैथिली भाषा को अष्टम सूची में स्थान मिला वहीं दूसरी तरफ ‘‘जय मिथला! जय मैथली!’’ के स्वर आज भी केन्द्र तक गुंज रहें हैं।

जहाॅ मिथिला भाषा प्रेमी और मिथिला राज्य की स्थापना के लिए बड़ा जन समुदाय जद्दो-जहद में लगा हुआ हैं वहीं एक दृश्य यह भी है कि मैथिली अपने अस्तीत्व और जिर्णोधार की बाट जोह रहा है।
एक सर्वे की माने तो मिथिला और मैथिली की बात करने वाले बस बातें ही कर पा रहें हैं। मगर वहीं आज तक मिथिला की धरती से विकास के लिए किए गये ज्यादातर प्रयास विफल नजर आतें हैं।
माना जाता है किसी भी सभ्यता या भाषा के विकास और जिर्णोधार में साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार एवं नाट्यों की अहम भुमिका रहती हैं। जो परिदृश्य भारत की आजादी में भी दिखा।
मिथिला की धरती से भी कई प्रयास किए गए जिनमें कई स्थानिय टी0वी0 चैनलों, सामाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं। वास्तविक्ता तो यह है कि ये सारे प्रयास पूर्णतः विफल नजर आए क्योंकि मिथिलांचल (मैथिल) दर्शकों एवं पाठकों की विशेष रूची इन्हें प्राप्त नहीं हुई जिस कारण इनका व्यवसायीकरण नहीं हो पाया।

इसी क्रम में मैथिली में एक फिल्म बनी ‘‘सस्ता जिनगी महग सेनुर‘‘ सन्-1999 में जिसमें बालकृष्ण झा ने बतौर निर्माता अपनी पून्जी का निवेश किया जिसे मैथिलों के साथ अन्य भाषाई दर्शकों ने भी खुब सराहा जिसके बाद मैिथली के बाजार के स्थापित होने के कयास लगाने जाने लगे मगर वहीं मैिथली का बाजार कभी बन ही नहीं पाया।

इसके बाद सन्-2018 में कुछ प्रवासी मैथिल युवाओं ने मैथिली सिनेमा के बाजार को स्थापित करने का प्रयास किया है। एक सिनेमा के माध्यम से जिसका नाम है ‘‘प्रेमक बसात‘‘ यानी प्रेम की हवा जिसमें बाॅलीवुड की वत्र्तमान तकनिक, कहानी और गाने भी वत्र्तमान बाॅलीवुड के तर्ज पर हीं प्रयोग किये गये हैं।
इस सिनेमा में बाॅलीवुड में अपना लम्बा अनुभव रखने वाले मिथिला प्रवाशी श्री कुणाल ठाकुर ने अपना योगदान सह-निर्माता के रूप में दिया है। श्री कुणाल ठाकुर बाॅलीवुड नें सुपरहिट सिनेमा टाॅयलेट एक प्रेम कथा, कयामत, माॅझी द् माॅनटेन मैन, द गोलमाल रिटर्न और आॅल द् बेस्ट जैसी दर्जनों फिल्मों में अपना योगदान दिया है।
सिनेमा ‘‘प्रेमक बसात‘‘ की सुटिंग मिथिला में हुई जिस क्रम में हमारी मुलाकात सह-निर्माता कुणाल ठाकुर जी से हुइ। हमारे द्वारा इक्षा व्यक्त किये जाने पर श्री कुणाल ठाकुर ने हमें अपना व्यस्ततम और बहूमुल्य समय देकर हमारे माध्यम से दर्शकों के साथ अपने अनुभव एवं विचारों को साॅझा किया जिसका सारंाश प्रस्तुत हैंः-
श्री कुणाल ठाकुर ने हमसे बात करते हुए बताया की मैथिली सिनेमा के व्यवसायकरण की अति आवश्यता है जबतक मैथिली सिनेमा का व्यवसायकरण नहीं होगा तब तक मैथिली भाषा की मिठास और मिथिला की संस्कृति का रस पान करवा पाना असंभव है। जिस क्रम में श्री कुणाल ठाकुर से यह भी जानकारी प्राप्त हुई की विगत 20 से 25 वर्षों से श्री ठाकुर हिंन्दी सिनेमा जगत में लगातार अपना योगदान दे रहें हैं और लगातार अलग-अलग भाषाओं में बनने वाली फिल्मांे के आर्थिक एवं अन्य परिस्थितियों को देख रहे हैं। जिस क्रम में इन्होंने बिहार से भोजपुरी और मैथिली को भी करीब से देखा है, जहाॅ भोजपुरी दिन-प्रतिदिन विकास कर रहा है क्योंकि भोजपुरी सिनेमा में लगने वाली पुंजी का मुनाफा भी आता है जहाॅ सायद ही किसी सिनेमा मे घाटा होता है। इसी कारण से भोजपुरी सिनेमा के निर्माताओं को हिंन्दी सिनेमा यानी बाॅलीवुड की तकनिक को अपनाने में कोई मुसकिल नहीं आ रही है और लगातार निवेशक अपनी पुंजी लगाने में हिचकिचा नहीं रहे हैं।
वही दुसरी ओर मैथिली सिनेमा की बात करें तो निवेशक या निर्माताओं को पुंजी निवेश से पहले यह डर सताता है कि पुंजी निवेश के बाद फायदा हो या नही मगर लागत पुंजी भी वापस आ पायेगी या नहीं।
यह भी एक प्रमुख वजह है जिस वजह से बड़े निवेशक या निर्माता मैथिली सिनेमा में अपनी पंुजी निवेश करने से डरते हैं। श्री कुणाल ठाकुर ने बातों हीं बातों में कहा की मैथिली अगर हमारी माँ है तो भोजपुरी हमारी मौसी है। वो दौर था जब ‘‘सस्ता जिनगी महग सिनुर’’ जैसी फिल्में बनी और गाढ़ी कमाई भी हुई मगर सन् 1999 के बाद न तो कोई बड़ा निवेश किया गया न ही मैथिली में फिल्मों ने दर्शको को आकर्शित किया। यह भी एक बड़ी वजह है कि जिस कारण से मैथिली सिनेमा का बाजार नहीं बना। श्री कुणाल ठाकुर ने दुख व्यक्त करते हुए कहा की आज मिथिला और मैथिली राजनिति का सिकार बन गयी है जहाॅ जय मिथिला! जय मैथिली! बस एक मुद्दे के तौर पे राजनिति के चूल्हे पर कुछ नेताओं के रोटी सेकने का माध्यम मात्र है। यदि मैथिली के लिए प्रयास राजनिति करण से बाहर आकर निःस्वार्थ भाव से विकाश और जिर्णाेधार के लिए किया गया होता तो आज परिदृश्य कुछ और ही होता। श्री कुणाल ठाकुर ने बताया की आज मिथिला के बाहर दिल्ली, मुम्बई और विदेशों में भी मिथिला महोत्सव एवं अन्य मैथिली कार्यक्रमों पर बड़ा खर्च होता है। सही मायनों में मिथिला वासिायों ने संपूर्ण विश्व पटल पर अपना पिरचम लहराया हुआ है! मगर मैथिली सिनेमा को किसी भी सिनेमा घर में जगह नहीं मिलने की वजह है मैथिली सिनेमा में बड़े निवेशकों का अभाव। वहीं जो छोटे निर्माता है उनके पास अनुभवहीनता और जानकारी की कमी होनेे के कारण भी पैसे ही नहीं बचते है कि फिल्मों को पुरा करने के बाद सिनेमा घरों तक पहॅूचा सकें।
श्री कुणाल ठाकुर ने बताया की मिथिला से फिल्म बनाने वालों के लिए मेरे दरवाजे हमेसा खुले रहते हैं, जब भी किसी मैथिल निवेशक को किसी भी प्रकार के सहयोग की आवश्यक्ता होती है तो मैं हर सम्भव प्रयास करता हूँ की उन्हें सही मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान करुँ। कई बार तो परिथतियां इतनी बत्तर होती है की मैथिली निर्माता अपनी फिल्म के पोस्टर तक छपवानें में असमर्थ होतें हैं और कभी छपनें के बाद भी फिल्म रिलिज नहीं हो पाती है। एक अनुमान के मुताबीक 90 प्रतिशत फिल्म अपने अंतिम चरन में दम तोड़ देतें हैं और आगे 10 प्रतिशत उपर वाले के भरोसे पर! यदि कोई फिल्म सिनेमा घर तक पहूँच भी गई तो दर्शक निरास कर देतें हैं।
श्री कुणाल ठाकुर नें अपनें इस करवे अनुभव के बाद यह प्रण किया की मेंरी मात्री भाषा मैथिली का अपमान अब नहीं! और श्री ठाकुर जुट गए निर्माताओं की खोज में आखिर कार श्री कुणाल ठाकुर नें अपनें लम्बी अनुभव से सिखा है की मैथिली सिनेमा में कीए गए निवेश को मुनाफे में कैशे बदला जाए।

इनकी मुहिम में साथ जुड़ गए मिथिला प्रवाशी मधुबनी निवाशी फिल्म निर्माता श्री वेदान्त झा जी जिन्होनें 2018 के सुरुआत में मैथिली सिनेमा के बाजारीकरन की नींव डाली एक मैथिली सिनेमा ‘‘प्रेमक बसात’’ के निर्माण के माघ्यम से जो अभी तक के सभी मैथिली फिल्मों से बिलकुल अलग है जहाॅ सभी तकनिक बाॅलीवुड स्तर के हैं, कहानी भी कुछ हट के है जिसमें हिन्दु-मुसलमान की प्रेम कहानी को दिखाया गया है वहीं बाॅलीवुड के विख्यात संगीतकार श्री सरोज सुमन के साथ तोचि रैना की सुफियाना गायकी और आदित्य नारायण ने भी अपनी पहली मैथिली गाने से अलंकृत किया है। वहीं मुख्य अभिनेत्री के रुप में खुबसुरत बाॅलीवुड अदाकारा रैना बनर्जी नें अपनी खुबसुरती और अदाकारी से दर्शकों का मन खुब मोहा है। फिल्म समीक्षकों की मानें तो इस फिल्म में बंगाल की खुबसुरत रैना बनर्जी की अदाकारी निश्चीत हीं मैथिली सिनेमा को अस्तीत्व दिलाएगी और यह फिल्म मिथिला सिनेमा जगत के इतिहास में मील का पत्थर साबीत होगी। कुछ तो यह भी मानतें हैं की आने वाले दौर में मैथिली सिनेमा जगत को रैना बनर्जी के नाम से जाना जाएगा।
श्री कुणाल ठाकुर नें हमें बताया की यह तो बस एक सुरुआत मात्र है जो कर्ज मिथिला की धरती का मेंरे उपर है उसे सायद कभी सधा नहीं पाउगा। मगर धरती माँ को अपना अधिकार दिलानें का हर सम्भव प्रयास करुंगा! आगे भी कई फिल्में आयेंगी जब तक मैथिली सिनेमा को अपना अस्तीत्व नहीं मिल जाता और मैथिली सिनेमा का बाजार नहीं बन जाता मैं सुकुन से नहीं रहूँगा आखीरकार किसी को तो आगे आना हीं होगा।
श्री कुणल ठाकुर ने अपने साक्षातकार के अन्त में ‘‘प्रेमक बसात’’ की पुरी टीम को धन्यवाद दिया और विशेष रुप से नाईका रैना बनर्जी को सम्बोधित करते हुए कहा की रैनी बनर्जी जो हिन्दी सिनेमां के अपने कामों को छोर कर उन्होंने इस बात पर तनिक भी विचार नहीं किया की कहीं मैथिली सिनेमा में काम करनें के बाद उन्हें हिन्दी सिनेमा में अपने पैर जमानें में कोई परेसानी न आए! बस जुट गई मैथिली सिनेंमा के विकाश की मुहीम में।
वैसे भी नाईका रैना बनर्जी नें मैथिली को इस सिनेमा में एैसे अपनाया है जैसे की बंगाल की बेटी ने मिथिला और बंगाल के बिच एक गहरा संबंध स्थापित कर दिया हो।
अति उत्साहित होते हुए श्री कुणाल ठाकुर नें कहा –
‘‘जय मिथला! जय मैथली! जय रैना बनर्जी!’’

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