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रामायण (प्रसंग -एक)
रामायण हमारा वास्तविक जीवन की कथा है:-

रामायण एक ऐसा महाकाव्य है जिसमें दर्ज प्रसंग, पात्र, और उनके प्रतिसाद सदियों से लोगों का मार्गदर्शन करते आ रहे हैं। राम-चरित-गाथा बचपन से सुनते व देखते आ रहे हैं। आज राम का नाम लेते ही उनका सम्पूर्ण चरित्र आॅखों के सामने तैरने लगते हैं। जिससे लोग चेतना की उच्च अवस्था पर पहॅुच जाते हैं, सकारात्मक ऊर्जा, भक्ति शांति और आनन्द महसूस करने लगते हैं।


रामायण में समाहित कुछ चरित्र हमें बेहद आकर्षित करते हैं और हमारे सामने एक आदर्श रखकर हमें उनके जैसा बनने हेतु प्रेरित करते हैं। जैसे:- भरत और लक्ष्म्ण का आदर्श भाई का चरित्र, सीता का आदर्श पत्नी का चरित्र, हनुमान का श्रेष्ठ चरित्र आदि। वहीं दूसरी ओर कुछ चरित्र को पढ़कर, घोर घृणा उत्पन्न होता है, लगता है, चाहे कुछ भी हो जाय, हमें ऐसा बिलकुल नहीं बनना है। जैसे रावण, कुम्भकरण, मंथरा, कैकेयी आदि का चरित्र। रामायण को पढकर मनन करने पर किसी भी व्यक्ति को खुद समझ में आने लगता है कि इस समय वह कौन है, उसके भीतर कब राम पैदा होते हैं, कब उसका वनवास होता है, कब वह मंथरा बन जाता है, और वह कब रावण होता है। इन जानकारियों के आधार पर व्यक्ति अपनी जीवन यात्रा को सही समझ के साथ सही दिशा में आगे बढ़ सकता है। रामायण हर पल व्यक्ति का हर मनोभाव में मार्गदर्शन करेगी। देखा जाय तो रामायण, चरित्रों का नहीं, बल्कि इंसान के अलग-अलग मनोभावों का ताना-बाना है। रामायण की हर घटना, इंसान की आंतरिक स्थिति का ही प्रतिबिंब है। हर चरित्र उसके अंदर ही मौजूद है, जो समय-समय पर बाहर निकलता है। उदाहरणार्थ, जब एक इंसान किसी दूसरे इंसान के विरूद्ध कान भरता है तब वह मंथरा बन जाता है। जब वह वासना अहं और क्रोध जैसे विकारों के वशीभूत होकर, अपनी मर्यादा लाॅघ जाए तो उस वक्त वह रावण हो जाता है। व्यक्ति के अंदर अहंकार हावी हो जाता है, तब उसके जीवन से सत्य अनुभव यानी राम चला जाता है। जिससे उसके जीवन में सारी नकारात्मकता यथा दुःख, चिंता, डर, संशय, निराशा आदि अहंकार की ही पूंछ है, जो इसके पीछे-पीछे बंधी चली आती है। अहंकारी व्यक्ति स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ और अपने को दूसरों से अलग मानने वाला ‘‘मैं‘‘ बन जाता है, जो इंसानी जीवन को राम के वियोग वाली सूनी अयोध्या बना देता है।


जब ईश्वर किसी शरीर (व्यक्ति) के माध्यम से अपना अनुभव कर, अपने गुणों को अभिव्यक्त (प्रकट) करना चाहता है, तो उस व्यक्ति के जीवन में ऐसी अनेक घटनाॅए घटती हैं, जो उसमें सत्य की प्यास जगाती है। तब उसके हृदय से सत्य प्राप्ति के लिए सच्ची प्रार्थना उठती है। यही प्रार्थना उसके जीवन में सत्य का अवतरण कराती है।
जब इंसान को अपने जीवन में राम का महत्व का पता चलता है, तब उसके जीवन में राम की वापसी (राम के विभिन्न गुणों का अनुशीलन करने) के लिए प्रयास शुरू होते हैं।
वह गुरू (शिक्षक,धार्मिक/आघ्यात्मिक ग्रंथ, सत्संग आदि) के मार्गदर्शन से अपने भीतर सत्य की ताकत को बढ़ाता है और रावण (विकार और अहंकार) से युद्ध कर उसे परास्त कर देता है। अब इस तरह के व्यक्ति के जीवन में राम ( राम के गुणों, जिन्हें ईश्वरीय गुण कहते है यथा प्रेम, मौन, आनंद, दया, विनम्रता, विश्वास, करूणा, क्षमा, रचनात्मकता, सहजता, साहस, निर्भयता, परोपकार, निष्काम सेवा, कपटहीनता) वापस आते हैं, ऐसे व्यक्ति के जीवन रूपी अयोध्या में दिवाली होने लगती है। दिवाली यानी उल्लास, उत्साह, प्रेम, मौन, आनन्द, उत्सव का संचार होने लगता है।
आचार्य शंकर
ग्राम – अन्धरा ठाढ़ी
जिला – मधुबनी (बिहार)
मो.नं. – 9425209181

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