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रामायण (प्रसंग-दो) वाल्मीकि की जीवन यात्रा (महर्षि वंश में जन्म से लेकर रत्नाकर डाकू, फिर वाल्मीकि ऋषि बन रामायण रचना तक)

महर्षि वाल्मीकि का जन्म महर्षि कश्यप के वंश में पूत्र प्रचेता और उनकी पत्नी चर्षणी के घर में हुआ। महर्षि वाल्मीकि के भाई महर्षि भृगु भी परम ज्ञानी थे। वाल्मीकि जी का पालन-पोषण उनके असली माता-पिता प्रचेता व चर्षणी नहीं कर सके थे क्योंकि उन्हें बचपन में ही एक भील चुरा कर ले गया था। भील के वाल्मीकि जी को चुरा कर ले जाने के कारण इनका पालन-पोषण भील प्रजाति में हुआ था। भीलों का प्रमुख कार्य लोगों से लूट-पाट करके अपना जीवन गुजारना था।

भीलों में पले-बढ़े होने के कारण यह भी एक डाकू बने, इन्हें इनके तब के नाम रत्नाकर डाकू से जाना जाता था। एक बार रत्नाकर की मुलाकात नारद मुनि से हुई। रत्नाकर ने उन्हें भी लूटने का प्रयास किया तो नारद मुनि ने उनसे पूछा कि यह कार्य क्यों करते हो ? रत्नाकर ने उत्तर दिया कि परिवार के पालन-पोषण के लिए, वह ऐसा करते है। नारद मुनि ने रत्नाकर से कहा कि वह जिस परिवार के लिए अपराध कर रहे हैं, क्या उस परिवार का सदस्य उनके पापों का भागीदार बनने को तैयार होंगे ? असमंजस में पड़े रत्नाकर ने नारद मुनि को पास ही किसी पेड़ से बांधा।

अपने घर उस प्रश्न का उत्तर जानने पहुंच गए। उनके परिवार ने उनके पापों में भागीदार होने से इनकार कर दिया। यह जानकर उन्हें निराशा हुई। यह सुन रत्नाकर वापस लौटे, नारद मुनि को खोला, और उनके चरणों में गिर गए तथा इन पापों से मुक्ति पाने का परामर्श मांगे। तत्पश्चात् नारद मुनि ने उन्हें परामर्श दिए कि राम-राम का जप करें, साथ ही श्री राम के जीवन चरित्र का वर्णन सुनाए। फिर रत्नाकर ने धुनी रमा ली और वह राम-नाम का तप करने लगे। ध्यान में मग्न रत्नाकर शरीर के चारों ओर दीमकों ने अपना घर बना लिया।

रत्नाकर, नारद जी के कहे अनुसार राम नाम का जाप करते रहे लेकिन भूलवश उन्होंने राम-राम कहने की बजाय, मरा,मरा,मरा कहना शुरू कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम का गलत नाम जपने के कारण इनकी काया बहुत दुर्बल हो गयी व इनके ऊपर दीमकों ने अपनी बांबी (वाल्मिक) बना ली, शायद यही उनके द्वारा किए गए पापों की सजा थी। जब वाल्मीकि जी की साधना पूर्ण हुई तो वे दीमकों के घर से बाहर निकले। चूॅकि दीमकों के घर को वाल्मिक कहते हैं, तो वे वाल्मीकि के नाम से विख्यात हुए। उन्होनें श्री राम के जीवन को जन-जन व घर-घर पहॅुचाया।


एक बार महर्षि वाल्मीकि गंगा नदी में स्नान करने जा रहे थे, उनके शिष्य भारद्वाज जी उनके कपड़े पकड़े हुए थे। वही पर नदी किनारे उन्होंने सारस (क्रौंच पक्षी) के जोड़े को प्रेमालाप में मग्न पाया। वाल्मीकि जी और उनके शिष्य भरद्वाज जी उस पक्षी के जोड़े को देखकर बहुत प्रसन्न महसूस कर रहे थे। तभी अचानक कहीं से तीर आकर नर सारस को लग गया, तीर लगने की वजह से नर सारस की तत्काल मृत्यु हो गयी। अपने साथी के वियोग में मादा सारस की भी तड़पकर मौत हो गयी। ऐसी घटना अपनी आॅखों के सामने देखकर वाल्मीकि जी बहुत दुखी हो गए एवम् उन्होंने श्राप दिया। वाल्मीकि के मुँह से निकला श्राप जो संस्कृत श्लोक (संसार का पहला संस्कृत श्लोक) के रूप में इस प्रकार है
‘‘ मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतींः समाः
घत्क्रौंच मिथुनादेकम् अवधीः काम मोहितम्।।

हे शिकारी, तूने पे्रमालाप में मग्न सारस पक्षी को मारा है इसलिए तुझे पूरे जीवन काल में कभी प्रतिष्ठा प्राप्ति नहीं होगी।

उसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य रामायण (जिसे वाल्मीकि रामायण‘‘ के नाम से जाना जाता है) की रचना की और आदिकवि वाल्मीकि के नाम से अमर हो गए। रामायण सर्वांग सुंदर, साहित्य के सभी रसों की अनुभूति कराने वाला, काव्य कला की दृष्टि से सर्वोच्च कोटि का धार्मिक ग्रंथ है। यह उपदेशात्मक ग्रंथ है। इसके उपदेश मानव को शांतिमय जीवन जीने प्रेरित करते हैं। रामायण धर्म का समग्र रूप और अमृतवाणी है, जिसका पठन व श्रवण करते ही मन शांत और आत्मा प्रसन्नता का अनुभव करती है। रामायण में पवित्र सोच व उत्तम विचारों का समावेश है।

साहित्य में रामायण का महत्व:- इसका महत्व हिन्दी साहित्य में ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य में भी अद्वितीय है। इसमें 24000 श्लोकों के द्वारा श्री राम का वर्णन है। अपने महाकाव्य ‘‘रामायण‘‘ में उन्होंने अनेक घटनाओं के समय सूर्य, चंद्र, तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है इससे ज्ञात होता है कि ज्योतिष विद्या एवम् खगोल विद्या के भी प्रकाण्ड ज्ञानी थे।

हिन्दु पंचांग के अनुसार अश्विन मास की शरद पूर्णिमा की तिथि पर महर्षि वाल्मीकि का जन्म दिवस है। इसी दिन वाल्मीकि कि जयंती देशभर में मनाया जाता है। महर्षि वाल्मीकि वैदिक काल के मान् ऋषियों में शुमार हैं। वे संस्कृत भाषा में निपुण थे और एक महान् कवि थे। वाल्मीकि मंदिरों में श्रद्धालु जाकर उनकी पूजा करते हैं। इसमें झांकियों के साथ शहरभर में शोभा यात्रा निकलते है।


ब्रम्हा जी द्वारा वाल्मीकि को रामायण लिखने हेतु प्रेरित करने की पौराणिक कथा:-


रामायण में करूण (पीड़ा) और त्याग का महत्व बहुत ज्यादा है। उदाहरणार्थ राम-सीता का वियोग करूण रस पर आधारित है। करूणा ही इस कल्प का श्रृंगार है। राम-सीता और भरत रूपी चरित्रों में त्याग की भावना को प्रमुखता से दर्शाया गया है। जब ब्रम्हा जी के नजर में यह बात आई कि क्रौंच पक्षी का वियोग करूण रस का उदाहरण है तथा जो संस्कृत श्लोक निकला है वह भी करूणा पर ही आधारित है जिस पर रामायण के कथानक आधारित है।

भाव की समानता देखते हुए ब्रम्हा ने वाल्मीकि को रामायण की रचना करने हेतु सर्वथा उचित व्यक्ति माने। जब ब्रम्हा के मन में यह बात स्पष्ट हो गयी कि वाल्मीकि से रामायण की रचना करायी जाए तो ब्रम्हा जी ने वाल्मीकि ऋषि को उत्तर रामायण काल में ब्राम्हण श्रेष्ठ कहकर संबोधित किए थे। तथा वाल्मीकि से रामायण लिखने का आव्हान किए। वाल्मीकि जी को उनके पूर्व अवस्था अर्थात् रत्नाकर डाकू की अवस्था में राम के चरित्र का वर्णन नारद जी द्वारा सुनाई जा चुकी थी। अब ब्रम्हा जी के आशीर्वाद से वाल्मीकि जी के जिह्ना पर सरस्वती जी का वास कराया गया।

इस प्रकार ब्रम्हा के वरदान से वाल्मीकि को परमसिद्धि का वरदान प्राप्त हुआ जिसके तहत ब्रम्हा जी ने कहा कि श्री राम के बारे में जो प्रगट हुआ है या जो गुप्त है उसके बारे में वाल्मिकी जो लिखेंगे वही सत्य होगा। साथ ही वाल्मीकि द्वारा राम के चरित्र पर काव्यात्मक शैली में लिखा गया रामायण मानव के लिए परम कल्याणकारी होगा। ब्रम्हा द्वारा ही वाल्मीकि को सरस्वती के मदद से संस्कृत में उत्कृष्ठ श्रेणी के काव्य करने की दिव्य शक्ति प्रदान की गई। परमसिद्धि प्राप्त वाल्मीकि द्वारा विरचित रामायण समस्त प्राणियों के भक्ति और मोक्ष प्राप्त करने के एक प्रेरक धर्माचरण का रास्ता है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित महाग्रंथ रामायण ने प्रेम, तप, त्याग इत्यादि दर्शाते हुए हर मनुष्य को सद्भावना के पथ पर चलने के लिए मार्गदर्शन किया है।

आचार्य शंकर

ग्राम – अन्धरा ठाढ़ी
जिला – मधुबनी (बिहार)
मो.नं. – 9425209181

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