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बेटी की शादी से नाराज़ पिता ने कराया फर्जी जन्म प्रमाण पत्र तैयार, हाईकोर्ट ने लगाया जुर्माना

हरियाणा के नूंह जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने अंतरधार्मिक विवाह और पारिवारिक विरोध को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक मुस्लिम युवती द्वारा हिंदू युवक से शादी करने के बाद उसके पिता ने कथित तौर पर उसे नाबालिग साबित करने की साजिश रची। अदालत में फर्जी जन्म प्रमाण पत्र पेश किए जाने का खुलासा होने पर Punjab and Haryana High Court ने सख्ती दिखाते हुए संबंधित पक्ष पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।

सोशल मीडिया से शुरू हुई प्रेम कहानी

मामला फिरोजपुर झिरका थाना क्षेत्र के पाडला गांव का है। यहां की रहने वाली नजराना की दोस्ती इंस्टाग्राम के जरिए पाडला गांव के ही रहने वाले मोहित से हुई थी। बातचीत का सिलसिला बढ़ा और दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। परिवार की सहमति न मिलने के बावजूद दोनों ने 12 जनवरी को विधिवत कोर्ट मैरिज कर ली।

मोहित अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखते हैं। ऐसे में यह विवाह सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से भी संवेदनशील बन गया। शादी के बाद युवती ने एक वीडियो जारी कर अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई और कुछ स्थानीय लोगों पर दबाव बनाने के आरोप लगाए।

अदालत में पेश हुआ विवादित दस्तावेज

विवाह के बाद युवती के परिवार ने इस रिश्ते को अमान्य घोषित कराने की कोशिश की। इसके लिए अदालत में एक जन्म प्रमाण पत्र पेश किया गया, जिसमें लड़की की उम्र ऐसी दर्शाई गई थी कि वह शादी के समय नाबालिग प्रतीत हो। परंतु जांच के दौरान यह दस्तावेज संदिग्ध पाया गया।

मामला जब Punjab and Haryana High Court पहुंचा तो अदालत ने रिकॉर्ड की बारीकी से जांच की। प्रमाण पत्र पर नूंह जिले की मुहर लगी थी, जबकि संबंधित अवधि में जिले का नाम “मेवात” हुआ करता था। वर्ष 2005 से 2016 तक सरकारी अभिलेखों में जिला मेवात के नाम से दर्ज था। ऐसे में 2010 की तिथि वाले प्रमाण पत्र पर नूंह की मुहर होना कई सवाल खड़े करता है।

वास्तविक उम्र और फर्जी तारीख

अदालत में प्रस्तुत दस्तावेज में युवती की जन्मतिथि 17 दिसंबर 2010 दर्शाई गई थी, जिससे वह विवाह के समय नाबालिग साबित होती। जबकि रिकॉर्ड के अनुसार उसकी वास्तविक जन्मतिथि 21 जून 2007 पाई गई। इस अंतर ने अदालत को यह मानने पर मजबूर किया कि न्यायालय को गुमराह करने की कोशिश की गई है।

युवती ने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि उसके दूर के रिश्तेदार और स्थानीय विधायक Maman Khan ने परिवार की मदद की। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के तहत की जानी बाकी है।

कोर्ट का कड़ा संदेश

हाईकोर्ट ने फर्जी दस्तावेज पेश करने को गंभीर अपराध मानते हुए प्रतिवादी नंबर 4 पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। साथ ही नूंह के उपायुक्त को निर्देश दिया कि छह महीने के भीतर जुर्माने की राशि की वसूली सुनिश्चित की जाए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि अन्य लोगों की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।

न्यायालय की इस सख्ती को न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ कर न्याय को प्रभावित करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सामाजिक और कानूनी पहलू

यह मामला केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि अंतरधार्मिक विवाह को लेकर समाज में अब भी तनाव और विरोध मौजूद है। बालिग होने पर किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद से विवाह करने का कानूनी अधिकार है, लेकिन कई बार परिवार इस फैसले को स्वीकार नहीं कर पाते और कानूनी रास्तों का दुरुपयोग करने की कोशिश करते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है। ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच और कड़ी कार्रवाई आवश्यक है।

आगे क्या?

अब प्रशासन अदालत के आदेश के अनुसार जुर्माने की वसूली करेगा। साथ ही फर्जी प्रमाण पत्र बनाने की प्रक्रिया में यदि किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ भी जांच संभव है। दूसरी ओर, नजराना और मोहित की सुरक्षा और वैवाहिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भी न्यायालय आगे सुनवाई करेगा।

यह पूरा प्रकरण एक बार फिर यह संकेत देता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक दबाव के बीच टकराव की स्थिति में अदालतें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हाईकोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए स्पष्ट संदेश है जो न्यायालय को गुमराह करने की कोशिश करते हैं।

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