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बाल कैंसर पर बड़ी जीत: हजारों बच्चों की जिंदगी में लौटी मुस्कान

कभी कैंसर का नाम सुनते ही जिस डर और निराशा का माहौल बन जाता था, आज वही कहानी उम्मीद और हौसले की मिसाल बन गई है। देश में पांच हजार से अधिक बच्चों ने कैंसर को हराकर न सिर्फ नई जिंदगी पाई है, बल्कि इलाज के पांच साल बाद भी पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। यह उपलब्धि बाल चिकित्सा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक सफलता मानी जा रही है।

यह खुलासा देश के प्रमुख संस्थान एम्स दिल्ली के पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी विभाग द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्ययन में हुआ है। इस शोध का नेतृत्व विभाग की प्रमुख डॉ. रचना सेठ ने किया। अध्ययन के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि समय पर इलाज और नियमित निगरानी से बच्चों में कैंसर का सफल उपचार संभव है।

आठ वर्षों का विस्तृत अध्ययन

यह अध्ययन 2016 से 2024 के बीच देशभर के 20 प्रमुख चिकित्सा केंद्रों में किया गया। इसमें 0 से 18 वर्ष तक के 5,419 कैंसर सर्वाइवर बच्चों को शामिल किया गया। अध्ययन की रिपोर्ट प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल The Lancet Child & Adolescent Health में प्रकाशित हुई है, जिससे इसके निष्कर्षों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली है।

रिपोर्ट के अनुसार, पूरे समूह में पांच साल की कुल सर्वाइवल दर 94.5 प्रतिशत दर्ज की गई। वहीं 89.9 प्रतिशत बच्चे बीमारी से पूरी तरह मुक्त पाए गए। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में बाल कैंसर के इलाज की गुणवत्ता और परिणामों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

फॉलोअप से बढ़ी सुरक्षा

अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन बच्चों ने इलाज के बाद कम से कम दो वर्षों तक नियमित फॉलोअप कराया, उनमें परिणाम और भी बेहतर रहे। ऐसे 2,266 बच्चों में पांच साल की सर्वाइवल दर 98.2 प्रतिशत रही, जबकि 95.7 प्रतिशत बच्चे पूरी तरह कैंसर मुक्त रहे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इलाज खत्म होने के बाद भी नियमित जांच और निगरानी बेहद जरूरी है। इससे बीमारी के दोबारा लौटने की संभावना कम हो जाती है और किसी भी जटिलता का समय रहते समाधान किया जा सकता है।

इलाज के दौरान अपनाए गए उपाय

रिपोर्ट में बताया गया कि 94.7 प्रतिशत बच्चों को कीमोथेरेपी दी गई। करीब 30.3 प्रतिशत बच्चों की सर्जरी की गई और 26.3 प्रतिशत को रेडियोथेरेपी दी गई। कई मामलों में इन उपचार विधियों का संयुक्त उपयोग किया गया ताकि बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सके।

अध्ययन में शामिल बच्चों में लड़कों की संख्या अधिक रही। कुल 3,537 लड़के और 1,812 लड़कियां शामिल थीं। विशेषज्ञ इसे सामाजिक जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच से भी जोड़कर देख रहे हैं।

बच्चों में पाए गए प्रमुख कैंसर

सबसे अधिक मामले एक्यूट ल्यूकेमिया के सामने आए, जो कुल मामलों का लगभग 40.9 प्रतिशत था। इसके अलावा लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (34.4%), हॉजकिन लिंफोमा (12.9%), रेटिनोब्लास्टोमा (7.4%), बोन ट्यूमर (8.4%) और किडनी ट्यूमर (4.61%) के मामले भी दर्ज किए गए।

विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में कैंसर का इलाज वयस्कों की तुलना में अधिक प्रभावी हो सकता है, बशर्ते बीमारी की पहचान समय रहते हो जाए। आधुनिक दवाओं, बेहतर तकनीक और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता ने इलाज को पहले से कहीं ज्यादा सफल बनाया है।

जागरूकता अभियान भी जारी

बाल कैंसर के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए दिल्ली के इंडिया गेट पर एक वॉकथॉन का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य यह संदेश देना है कि कैंसर अब लाइलाज बीमारी नहीं है। सही समय पर उपचार और परिवार के सहयोग से इसे हराया जा सकता है।

उम्मीद की नई दिशा

यह अध्ययन केवल चिकित्सा उपलब्धि नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के लिए राहत और खुशी की खबर है। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझते देखा, आज वही बच्चे सामान्य जीवन जी रहे हैं, स्कूल जा रहे हैं और अपने भविष्य के सपने साकार कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बच्चों में लंबे समय तक बुखार, असामान्य सूजन, अचानक वजन कम होना या बार-बार संक्रमण जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत जांच करानी चाहिए। शुरुआती पहचान और सही इलाज ही इस लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार है।

कुल मिलाकर यह अध्ययन बताता है कि मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली, प्रशिक्षित डॉक्टरों की टीम और जागरूक परिवार मिलकर बाल कैंसर के खिलाफ बड़ी जीत हासिल कर सकते हैं। आज पांच हजार से अधिक बच्चों की मुस्कान इस बात का प्रमाण है कि उम्मीद और इलाज साथ हों, तो जिंदगी फिर से खिल उठती है।

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