बिहार :: दहेज प्रथा दफन करने वाला ‘ बत्तीसगामा समाज ‘ 800 सालों की परंपरा बरकरार, बना आधुनिक समाज के लिए एक मिसाल

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picsart_10-18-11-34-07-320x245डेस्क : दहेज लेना-देना कानूनन अपराध है.आधुनिक समाज में जाति को जिस तरह से हिकारत भरी नजरों से देखा जाता है,उस दौर में जाति आधारित यह संगठन सरकारी तामझाम और मीडिया की चकाचौंध से दूर है और दहेज प्रथा के खिलाफ काम कर रहा है।दहेज बुरी बात है नहीं लेना चाहिए. लोग दबा के लेते हैं क्योंकि समाज के आगे दिखाना होता है. कमाऊ लड़का इतना सामान लाया. पर भारत में एक ऐसा समाज भी है जहां दहेज लेना गुनाह है और इतना ही नहीं जो दहेज लेते हैं या देते हैं उनको समाज से निकाल दिया जाता है. ये परंपरा चली आ रही है वो भी बिहार की धरती पर. ‘दहेज़ नहीं बेटी चाहिए, सामान नहीं सम्मान चाहिए’  के नारे के साथ इस गांव के लोगों ने लगभग 800 सालों से दहेज़ प्रथा पर अंकुश लगा रखा है। आज भी इस समाज से जुड़े दर्जनों गांव के लोग इस परंपरा को निभा रहे हैं। इस समाज का नाम है ‘बत्तीसगामा समाज’

बिहार के दरभंगा और मधुबनी जिले के कायस्थ बहुल 32 गांवों के लोगों का यह एक संगठन है। दरभंगा के बहादुरपुर, खराजपुर, रामपट्टी, सुंदरपुर, बेरी, सुल्तानपुर और मधुबनी के भच्छी, कैथाई, हैदरपुर, बेलारहि, कमालपुर, नवानी, फेंट, इजोत समेत 32 गांव के कायस्थ जाति के लोग आज उन लोगों के लिए मिसाल हैं, जो दहेज प्रताड़ना से समाज को बदनाम कर रहे हैं।

यह परंपरा जो 800 साल पहले दरभंगा महाराज हरिसिंह देव के समय में बनाया गया था। उस जमाने में दरभंगा महाराज हरिसिंह देव ने सामाजिक समरूपता की नींव रखी थी। हर जाति में विवाह के लिए पंजी प्रथा बनवाई। जिसके तहत पंजीकार सजातीय वर और वधू के सात पुश्तों की जन्मावली देखकर रिश्ता तय करते थे। बदलते समय के साथ सबकुछ बदला और पंजी प्रथा समाप्त हो गई सिवाय ‘बत्तीसगामा समाज’ को छोड़कर। आज भी यहां पंजीकार के पास 800 साल पुरानी पंजी मौजूद है, जो तिरहुता लिपि में लिखी हुई है।

पंजीकार बताते हैं कि आजतक इस समाज के लोगों ने दहेज लेन-देन की बात नही की है। फिर भी, अगर कोई लालच में पड़ कर दहेज लेता है तो उसका ‘बत्तीसगामा समाज’ बहिष्कार कर देता है।

इस समाज के एक बुजुर्ग ने भी बताया कि ‘हमारे पूर्वजों ने 32 गांवों का एक संगठन बनाया और निर्णय लिया कि हम अपने बेटों-बेटियों की शादी में न दहेज़ लेंगे और न दहेज़ देंगे.अगर कोई दहेज़ लेते हैं तो हम उसका सामाजिक बहिष्कार करते हैं साथ ही उनके यहां खान-पान बंद कर देते हैं ‘. लेकिन आज सिर्फ मैथिल कायस्थ परिवार ही इस नियम का पालन कर रहे हैं.

वाकई जिस तरह बत्तीसगामा समाज के लोग दहेज नहीं लेते हैं और जिस तरह इस परंपरा का आजतक संतुलन बनाये रखें हैं वैसा ही सभी समाज के लोग करें तो कितना अच्छा होता.