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कच्चे तेल का बदलता खेल: भारत की नई रणनीति, रूस की वापसी और बढ़ते दामों का खतरा

वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय गहरे उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, सप्लाई में अनिश्चितता और भू-राजनीतिक संघर्षों ने कच्चे तेल की कीमतों को अस्थिर बना दिया है। इस बदलते परिदृश्य के बीच भारत ने अपनी तेल आयात नीति में लचीलापन दिखाते हुए नई रणनीति अपनाई है। हालिया आंकड़ों से साफ है कि भारत अब एक ही स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय कई देशों से तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है।

फरवरी महीने में भारत के तेल आयात में बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब इराक ने रूस को पीछे छोड़ते हुए सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता का स्थान हासिल कर लिया। इराक से आयात बढ़कर लगभग 11.8 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया, जबकि रूस से आयात में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। रूस से तेल की आपूर्ति घटकर करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई, जो पिछले महीनों की तुलना में करीब 32 प्रतिशत कम है।

हालांकि यह गिरावट स्थायी नहीं मानी जा रही। विशेषज्ञों का अनुमान है कि मार्च में रूस एक बार फिर भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन सकता है। इसकी मुख्य वजह है सस्ती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल और उसकी स्थिर सप्लाई। अनुमान लगाया जा रहा है कि मार्च में रूस से आयात 18 से 22 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है, जो भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभाएगा।

भारत के लिए तेल आयात केवल आर्थिक मामला नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, विशेषकर ईरान से जुड़े तनाव, ने होर्मुज जलसंधि जैसे महत्वपूर्ण मार्गों पर दबाव बढ़ा दिया है। यह जलसंधि वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख रास्ता है, और यहां किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ता है। ऐसे में भारत ने जोखिम को कम करने के लिए अपने आयात स्रोतों में विविधता लाने का फैसला किया है।

सऊदी अरब और अन्य मध्य पूर्वी देशों से भी भारत का आयात बढ़ा है। सऊदी अरब से फरवरी में करीब 9.98 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया गया। कुल मिलाकर, भारत के कुल आयात में मध्य पूर्व की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 59 प्रतिशत हो गई है। इसके अलावा, ब्राजील जैसे नए स्रोत भी उभरकर सामने आए हैं, जिसने फरवरी में भारत के चौथे सबसे बड़े सप्लायर के रूप में जगह बनाई।

रूसी तेल की वापसी के पीछे एक और अहम कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति है। अमेरिका ने हाल ही में भारत को रूसी तेल खरीदने पर कुछ प्रतिबंधों में छूट दी है, जिससे भारत के लिए रूस से तेल आयात करना आसान हो गया है। यह छूट भारत की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए दी गई है, जिससे देश सस्ते और उपलब्ध संसाधनों का लाभ उठा सके।

दूसरी ओर, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। सऊदी अरब के अधिकारियों का अनुमान है कि यदि ईरान से जुड़ा संघर्ष और ऊर्जा संकट अप्रैल के अंत तक जारी रहता है, तो तेल की कीमत 180 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकती है। यह एक ऐसा स्तर होगा, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर डाल सकता है।

हालांकि, हाल के दिनों में कीमतों में थोड़ी नरमी भी देखने को मिली है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा सप्लाई को स्थिर करने के प्रयासों के चलते तेल की कीमतों में गिरावट आई। ब्रेंट क्रूड वायदा कीमत में लगभग 1.45 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 107 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह राहत अस्थायी हो सकती है।

यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि से आम लोगों पर सीधा असर पड़ेगा। इसके साथ ही महंगाई दर बढ़ सकती है, जिससे आर्थिक विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।

भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ महंगाई पर भी नियंत्रण रखना होता है। ऐसे में सरकार के सामने संतुलन बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी है। एक ओर सस्ती दरों पर तेल खरीदना जरूरी है, तो दूसरी ओर सप्लाई की स्थिरता भी सुनिश्चित करनी होती है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भारत को न केवल आयात के स्रोतों में विविधता बनाए रखनी होगी, बल्कि वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर भी ध्यान देना होगा। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय स्रोतों में निवेश बढ़ाकर ही लंबे समय में इस तरह के वैश्विक संकटों से बचा जा सकता है।

इसके अलावा, रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) को मजबूत करना भी एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इससे आपातकालीन स्थितियों में देश को कुछ समय तक बाहरी झटकों से बचाया जा सकता है। भारत पहले ही इस दिशा में काम कर रहा है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इसमें और तेजी लाने की जरूरत है।

कुल मिलाकर, मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि वैश्विक ऊर्जा बाजार आने वाले महीनों में और अधिक अस्थिर हो सकता है। भारत ने अपनी नीति में लचीलापन दिखाते हुए सही दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। रूस, इराक और अन्य देशों के बीच संतुलन बनाकर ही भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है।

अगर हालात नहीं सुधरे, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है, जिसका असर हर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। ऐसे में भारत की रणनीति और कूटनीतिक संतुलन ही यह तय करेगा कि वह इस संकट से कितनी मजबूती से उभरता है।

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