शनिवार को अमांपुर कस्बे से आई एक दर्दनाक खबर ने पूरे इलाके को सन्न कर दिया। बंद मकान के भीतर जब पुलिस ने दरवाजा तोड़कर प्रवेश किया, तो सामने ऐसा दृश्य था जिसे देखकर हर किसी की रूह कांप उठी। जमीन पर मां और तीन बच्चों के शव पड़े थे, जबकि घर का मुखिया छत से फंदे पर लटका मिला। कुछ ही पलों में यह खबर पूरे कस्बे में आग की तरह फैल गई और लोग घटनास्थल की ओर दौड़ पड़े।

पुलिस के मुताबिक 50 वर्षीय सत्यवीर, जो गैस वेल्डिंग का काम करता था, पिछले कई महीनों से आर्थिक तंगी और कर्ज के दबाव में था। पड़ोसियों का कहना है कि घर में अक्सर चूल्हा तक नहीं जलता था। बेटे की बीमारी और काम की अनियमितता ने उसकी मानसिक स्थिति को और कमजोर कर दिया था।
जांच अधिकारियों ने बताया कि प्रथम दृष्टया घटना की कहानी बेहद भयावह लगती है। माना जा रहा है कि सत्यवीर ने पहले अपने तीन बच्चों — 12 वर्षीय प्राची, 10 वर्षीय आकांक्षा और 8 वर्षीय गिरीश — को किसी जहरीले पदार्थ का सेवन कराया। इसके बाद उसने पत्नी शीला का चाकू से गला रेत दिया। वारदात को अंजाम देने के बाद उसने खुद को फंदे पर लटका लिया।
मकान तीन दिन से बंद था, जिससे पड़ोसियों को शक हुआ। बदबू आने पर उन्होंने पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची टीम ने जब दरवाजा काटकर खोला तो अंदर का मंजर दिल दहला देने वाला था।
घटना की सूचना मिलते ही वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे। जांच की निगरानी कर रहे प्रभाकर चौधरी ने बताया कि परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा था और प्राथमिक जांच इसी दिशा में इशारा कर रही है। हालांकि उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद ही पूरी सच्चाई सामने आएगी।
जिलाधिकारी प्रणय सिंह ने घटना को अत्यंत दुखद बताते हुए कहा कि प्रशासन पीड़ित परिवार के रिश्तेदारों की हर संभव मदद करेगा। वहीं पुलिस अधीक्षक अंकिता शर्मा ने कहा कि घटना के सभी पहलुओं की गहन जांच की जा रही है और किसी भी संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
घटना की गंभीरता को देखते हुए क्षेत्रीय विधायक हरिओम वर्मा भी मौके पर पहुंचे। उन्होंने प्रशासन से पीड़ित परिवार के परिजनों को सहायता देने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सत्यवीर मेहनती व्यक्ति था, लेकिन पिछले कुछ समय से उसका काम ठप पड़ा था। कई बार उसने मदद भी मांगी थी। बेटे की बीमारी और घर के खर्चों ने उसे तोड़ दिया था। लोगों का मानना है कि यदि समय रहते उसे आर्थिक या मानसिक सहारा मिल जाता, तो शायद यह परिवार आज जिंदा होता।
घटना के बाद पूरे इलाके में शोक और भय का माहौल है। लोगों के बीच यह चर्चा भी तेज हो गई है कि बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और कर्ज का बोझ किस तरह सामान्य परिवारों को मानसिक रूप से तोड़ रहा है। कई सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की पहचान कर उन्हें समय रहते सहायता दी जाए।
फिलहाल पुलिस ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और घर से बरामद वस्तुओं की जांच की जा रही है। फॉरेंसिक टीम ने भी साक्ष्य जुटाए हैं। अधिकारी मान रहे हैं कि यह मामला सिर्फ एक पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक चेतावनी भी है — कि आर्थिक और मानसिक दबाव का बोझ कई बार इंसान को ऐसे अंधेरे में धकेल देता है, जहां से वापसी संभव नहीं होती।
इस दर्दनाक घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे समाज में आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों तक समय पर मदद पहुंच रही है? क्या मानसिक तनाव से जूझ रहे परिवारों के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था है?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक कासगंज की यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक चेतावनी बनी रहेगी — कि गरीबी और निराशा मिलकर सबसे मजबूत रिश्तों को भी खत्म कर सकती हैं।
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