सौरभ शेखर श्रीवास्तव की ब्यूरो रिपोर्ट दरभंगा। वैशाली के मुस्लिम विद्वानों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी प्रमुख हस्तियों के जीवन, कार्य एवं योगदान पर आधारित महत्वपूर्ण पुस्तक ‘मुस्लिम एलीट्स ऑफ वैशाली’ (Muslim Elites of Vaishali) का विमोचन शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026 को दरभंगा में किया गया। पुस्तक विमोचन समारोह का आयोजन अल-मंसूर एजुकेशनल एंड वेलफेयर ट्रस्ट, दरभंगा के तत्वावधान में हकीम दमरी मंजिल, डॉ. आफताब हुसैन कॉम्प्लेक्स, सुभाष चौक, दरभंगा में किया गया।

कार्यक्रम में शिक्षा, साहित्य, सामाजिक सेवा, पत्रकारिता और बौद्धिक क्षेत्र से जुड़े बड़ी संख्या में गणमान्य लोगों, विद्वानों और साहित्यप्रेमियों ने भाग लिया। समारोह के दौरान पुस्तक के विषय-वस्तु, लेखक के शोध प्रयास और वैशाली के मुस्लिम समाज की शैक्षिक एवं सांस्कृतिक विरासत को दस्तावेजी रूप देने के प्रयास की सराहना की गई।

वैशाली की मुस्लिम बौद्धिक विरासत को सामने लाने का प्रयास
‘मुस्लिम एलीट्स ऑफ वैशाली’ पुस्तक मूल रूप से ‘तज़्किरा-ए-मुस्लिम मशाहीर वैशाली’ के नाम से तैयार की गई कृति का उर्दू रूपांतरण है। इसके लेखक अमारत-ए-शरिया के नायब नाजिम मुहम्मद सना-उल-हुदा कासमी हैं, जबकि पुस्तक का उर्दू अनुवाद प्रसिद्ध अधिवक्ता एवं साहित्यिक क्षेत्र से जुड़े सैयद महमूद अहमद करीमी ने किया है।
पुस्तक में वैशाली क्षेत्र से जुड़े मुस्लिम विद्वानों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और अन्य प्रमुख हस्तियों के जीवन एवं उनके विभिन्न क्षेत्रों में योगदान को संकलित किया गया है। पुस्तक के माध्यम से उन व्यक्तित्वों की शैक्षिक, साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सेवाओं को सामने लाने का प्रयास किया गया है, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि वैशाली भारतीय इतिहास और संस्कृति में एक विशिष्ट स्थान रखने वाला क्षेत्र है। इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर विभिन्न स्तरों पर अध्ययन एवं शोध होते रहे हैं। ऐसे में वैशाली से जुड़े मुस्लिम विद्वानों और प्रमुख हस्तियों के योगदान को एक पुस्तक के रूप में संकलित करना क्षेत्र की सामाजिक एवं बौद्धिक विरासत को समझने की दिशा में उपयोगी प्रयास है।

प्रोफेसर तरज़ी ने की समारोह की अध्यक्षता
पुस्तक विमोचन समारोह की अध्यक्षता प्रसिद्ध शायर प्रोफेसर अब्दुल मन्नान तरज़ी ने की। वहीं कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर अब्दुल वदूद कासमी ने किया। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने पुस्तक की विषय-वस्तु, शोधपरक दृष्टिकोण और ऐतिहासिक महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए।
वक्ताओं ने कहा कि किसी भी क्षेत्र का इतिहास केवल राजनीतिक घटनाओं, युद्धों या प्रशासनिक बदलावों तक सीमित नहीं होता। किसी क्षेत्र की शैक्षिक, साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में योगदान देने वाले व्यक्तित्व भी उसके इतिहास का अभिन्न हिस्सा होते हैं। ऐसे लोगों के जीवन और कार्यों को दस्तावेजी रूप देना आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत तैयार करने के समान है।
उन्होंने कहा कि ‘मुस्लिम एलीट्स ऑफ वैशाली’ में वैशाली से संबंधित मुस्लिम विद्वानों और प्रमुख हस्तियों के जीवन परिचय एवं सेवाओं को संकलित किए जाने से पाठकों को क्षेत्र की बौद्धिक एवं सामाजिक परंपरा को समझने में मदद मिलेगी।

कई प्रमुख हस्तियों की रही मौजूदगी
समारोह में दरभंगा के शैक्षिक, साहित्यिक, सामाजिक और पत्रकारिता जगत से जुड़ी अनेक प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं। कार्यक्रम में प्रोफेसर शाकिर खलीक, पूर्व एडीएम नियाज अहमद, मदरसा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष मौलाना एजाज अहमद, अल-मंसूर ट्रस्ट के संरक्षक डॉ. सैयद जफर आफताब हुसैन, मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व उर्दू विभागाध्यक्ष प्रोफेसर रईस अनवर, अमारत-ए-शरिया के दरभंगा काजी अरशद हुसैन सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे।
इसके अलावा अहमद हुसैन कासमी, प्रसिद्ध शायर एवं साहित्यकार कामरान गनी सबा, वसीम अख्तर, डॉ. मुजीर अहमद आजाद, डॉ. एहसान आलम, जुबैर आलम (सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया), मंजर सिद्दीकी, मौलाना मेहदी रजा रोशन, अफलाक मंजर, नसीम रिफअत मलिकी, मौलाना नजरुल हुदा कासमी, मंजर सुलेमान, मुहम्मद शमशाद और मुहम्मद रियाजुद्दीन सहित अनेक विद्वान, साहित्यकार एवं पुस्तक प्रेमी कार्यक्रम में शामिल हुए।
पुस्तक में शिक्षा और साहित्यिक योगदान का दस्तावेजीकरण
‘मुस्लिम एलीट्स ऑफ वैशाली’ में वैशाली क्षेत्र से जुड़े विभिन्न मुस्लिम विद्वानों एवं प्रमुख व्यक्तित्वों की जीवन यात्रा तथा उनके कार्यों को संकलित करने का प्रयास किया गया है। पुस्तक में उनके शैक्षिक, साहित्यिक एवं सामाजिक योगदान के साथ-साथ उनके समय और समाज पर पड़े प्रभाव को भी रेखांकित किया गया है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि समाज के इतिहास को समझने के लिए केवल प्रसिद्ध घटनाओं का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। उन लोगों के योगदान को भी दर्ज करना आवश्यक है, जिन्होंने शिक्षा, साहित्य, सामाजिक सेवा और बौद्धिक गतिविधियों के माध्यम से समाज के विकास में योगदान दिया।
इस दृष्टि से पुस्तक को एक दस्तावेजी प्रयास के रूप में देखा गया, जिसमें वैशाली की मुस्लिम बौद्धिक एवं सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े विभिन्न पहलुओं को एक जगह संकलित करने की कोशिश की गई है।
शोध और साहित्य के महत्व पर हुई चर्चा
समारोह के दौरान शोधपरक एवं ऐतिहासिक पुस्तकों की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि बदलते समय में मौखिक परंपराओं और व्यक्तिगत स्मृतियों पर आधारित अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां धीरे-धीरे विलुप्त हो सकती हैं। ऐसे में किसी क्षेत्र के प्रमुख व्यक्तित्वों, उनकी उपलब्धियों और सामाजिक योगदान को लिखित रूप में संरक्षित करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि पुस्तकें केवल जानकारी का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे समाज की सामूहिक स्मृति को संरक्षित करने का कार्य भी करती हैं। किसी क्षेत्र की शैक्षिक और साहित्यिक परंपरा पर आधारित शोध भविष्य के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और पाठकों के लिए उपयोगी सामग्री उपलब्ध करा सकता है।
कार्यक्रम में ‘मुस्लिम एलीट्स ऑफ वैशाली’ के लेखक मुहम्मद सना-उल-हुदा कासमी के शोध प्रयास की भी सराहना की गई। साथ ही अनुवादक सैयद महमूद अहमद करीमी द्वारा पुस्तक को उर्दू पाठकों तक पहुंचाने के प्रयास को महत्वपूर्ण बताया गया।

प्रोफेसर तरज़ी और सैयद महमूद अहमद करीमी को मिला ‘अलहुदा अवार्ड’
समारोह के दौरान अलहुदा एजुकेशनल एंड वेलफेयर ट्रस्ट, वैशाली की ओर से वरिष्ठ शायर प्रोफेसर अब्दुल मन्नान तरज़ी और प्रसिद्ध अधिवक्ता सैयद महमूद अहमद करीमी को उनकी शैक्षिक एवं साहित्यिक सेवाओं के सम्मान में ‘अलहुदा अवार्ड’ से सम्मानित किया गया।

सम्मान समारोह के दौरान अतिथियों ने व्यक्तित्वों की शैक्षिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का उल्लेख करते हुए उनके योगदान की सराहना की। इस अवसर पर उन्हें सम्मानित किए जाने को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय लोगों के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया।
बौद्धिक संवाद को बढ़ावा देने पर जोर
कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि इस तरह के आयोजन समाज में अध्ययन, शोध और साहित्यिक संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पुस्तक विमोचन जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से लेखक, पाठक, शोधकर्ता, साहित्यकार और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग एक मंच पर आते हैं और किसी विषय पर विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।
अल-मंसूर एजुकेशनल एंड वेलफेयर ट्रस्ट की ओर से कार्यक्रम में शामिल विद्वानों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, विद्यार्थियों एवं पुस्तक प्रेमियों का स्वागत किया गया। आयोजकों ने कहा कि शैक्षिक और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देना समाज की बौद्धिक विरासत को मजबूत करने की दिशा में आवश्यक कदम है।
डॉ. मंसूर खुश्तर ने जताया आभार
कार्यक्रम के अंत में अल-मंसूर एजुकेशनल एंड वेलफेयर ट्रस्ट, दरभंगा के सचिव डॉ. मंसूर खुश्तर ने समारोह में शामिल सभी विद्वानों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और सम्मानित अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि ‘मुस्लिम एलीट्स ऑफ वैशाली’ जैसी शोधपरक पुस्तकें किसी क्षेत्र की शैक्षिक एवं सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण पहलुओं को सुरक्षित रखने में भूमिका निभाती हैं। उन्होंने पुस्तक के लेखक मुहम्मद सना-उल-हुदा कासमी और अनुवादक सैयद महमूद अहमद करीमी को इस महत्वपूर्ण शैक्षिक एवं साहित्यिक प्रयास के लिए बधाई दी।
समारोह में उपस्थित लोगों ने पुस्तक के विमोचन को वैशाली से जुड़े मुस्लिम विद्वानों, साहित्यकारों और प्रमुख हस्तियों के योगदान को दस्तावेजी रूप में सामने लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पहल बताया। कार्यक्रम का समापन सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुआ।

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