हरियाणा राज्यसभा चुनाव इस बार पूरी तरह से गणित, रणनीति और किस्मत का खेल बन गया। चुनाव के नतीजे इतने करीबी रहे कि जीत और हार के बीच का अंतर एक वोट से भी कम रह गया। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि राजनीति में हर एक वोट की कीमत कितनी बड़ी होती है।

इस चुनाव में कुल 90 विधायकों को वोट डालना था, लेकिन इंडियन नेशनल लोकदल (INLD) के दो विधायकों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। इससे कुल डाले गए वोटों की संख्या 88 रह गई। जब मतगणना हुई, तो पांच वोट रद्द कर दिए गए—इनमें कांग्रेस के चार और भाजपा का एक वोट शामिल था। इस तरह अंत में 83 वोट ही वैध माने गए।
राज्यसभा चुनाव का गणित सामान्य चुनावों से थोड़ा अलग होता है। यहां जीत के लिए एक तय कोटा हासिल करना पड़ता है। कुल वैध वोटों (83) को सीटों की संख्या (2) में एक जोड़कर भाग दिया जाता है और फिर उसमें एक जोड़ा जाता है। इस प्रक्रिया के अनुसार जीत का आंकड़ा करीब 27.66 वोट तय हुआ।
भाजपा की स्थिति शुरू में मजबूत दिखाई दे रही थी। पार्टी के पास 48 विधायक थे, लेकिन एक वोट रद्द होने के बाद उसके पास 47 वैध वोट बचे। पहली प्राथमिकता के वोटों में भाजपा के उम्मीदवार संजय भाटिया को 39 वोट मिले, जिससे उन्होंने आसानी से जीत का कोटा पार कर लिया। उनके जीतने के बाद बची हुई वोट वैल्यू का कुछ हिस्सा दूसरी प्राथमिकता के आधार पर ट्रांसफर हुआ।
दूसरी ओर, कांग्रेस को इस चुनाव में झटका भी लगा और फायदा भी हुआ। पार्टी के चार वोट रद्द हो गए और पांच विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी। इसके बावजूद कांग्रेस के पास 28 वैध वोट बच गए, जो जीत के लिए जरूरी 27.66 के आंकड़े से थोड़ा ज्यादा थे। इसी के चलते कांग्रेस के उम्मीदवार कर्मवीर बौद्ध जीतने में सफल रहे।
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार सतीश नांदल को लेकर रही। उन्हें कुल 16 पहली प्राथमिकता के वोट मिले, जिनमें भाजपा, कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों का समर्थन शामिल था। हालांकि यह आंकड़ा मजबूत दिख रहा था, लेकिन आगे की प्रक्रिया में उनका गणित गड़बड़ा गया।
जब संजय भाटिया की जीत के बाद उनके अतिरिक्त वोट दूसरी प्राथमिकता के आधार पर ट्रांसफर हुए, तो उसका फायदा नांदल को मिला। इसके बाद उनका कुल वोट वैल्यू 27.34 तक पहुंच गया। लेकिन यह जीत के लिए काफी नहीं था, क्योंकि कांग्रेस के कर्मवीर बौद्ध के पास 28 वोट थे। इस तरह नांदल महज 0.66 वोट से हार गए।
इस पूरे चुनाव में INLD का मतदान से दूर रहना भी बड़ा फैक्टर साबित हुआ। अगर उसके दोनों विधायक वोट डालते और वे नांदल के पक्ष में जाते, तो नतीजे पूरी तरह बदल सकते थे। ऐसे में निर्दलीय उम्मीदवार की जीत लगभग तय मानी जा रही थी।
भाजपा का एक वोट रद्द होना भी निर्णायक साबित हुआ। अगर यह वोट वैध रहता, तो नांदल के पास ज्यादा वोट वैल्यू हो सकती थी और वे कांग्रेस उम्मीदवार को पीछे छोड़ सकते थे। यानी एक छोटी सी गलती ने पूरा समीकरण बिगाड़ दिया।
वहीं, कांग्रेस के लिए यह जीत आसान नहीं थी। चार वोट रद्द होने और पांच विधायकों के क्रॉस वोटिंग करने के बावजूद पार्टी ने जीत हासिल की। यह दिखाता है कि सही समय पर मिला थोड़ा सा समर्थन भी बड़ी जीत दिला सकता है।
वोट की गोपनीयता को लेकर भी विवाद सामने आया। कांग्रेस विधायक भरत सिंह बेनीवाल के वोट पर आपत्ति जताई गई थी, लेकिन जांच में वह वोट वैध पाया गया। अगर यह वोट रद्द हो जाता, तो कांग्रेस की स्थिति कमजोर हो सकती थी और नतीजा बदल सकता था।
कुल मिलाकर, हरियाणा राज्यसभा चुनाव ने यह दिखा दिया कि राजनीति में जीत सिर्फ संख्या की नहीं, बल्कि रणनीति, अनुशासन और सही मौके पर सही फैसले की भी होती है। यह चुनाव आने वाले समय में एक उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा, जहां मामूली अंतर ने पूरे खेल का रुख बदल दिया।
स्वर्णिम टाईम्स : Swarnim Times आपका अपना इंटरनेट अख़बार !