हरियाणा में होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। सोमवार को नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख है, जिसके बाद यह साफ हो जाएगा कि चुनाव दो उम्मीदवारों के बीच होगा या फिर तीन प्रत्याशी मैदान में डटे रहेंगे। तीसरे उम्मीदवार के उतरने से यह चुनाव अचानक चर्चा का विषय बन गया है और पूरे प्रदेश की निगाहें इस पर टिक गई हैं।

इस बार राज्यसभा चुनाव के लिए सत्तारूढ़ भाजपा ने पूर्व सांसद संजय भाटिया को उम्मीदवार बनाया है। वहीं कांग्रेस ने कर्मबीर बौद्ध पर भरोसा जताते हुए उन्हें अपना प्रत्याशी घोषित किया है। इसके अलावा भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार सतीश नांदल ने भी नामांकन दाखिल किया है। नांदल के चुनावी मैदान में आने से राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं और अब यह मुकाबला पहले से ज्यादा दिलचस्प हो गया है।
दरअसल हरियाणा की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर पहले भी कई बार नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिले हैं। पिछले दो चुनावों में जिस तरह के राजनीतिक खेल सामने आए थे, उसे देखते हुए इस बार भी सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। यही वजह है कि सभी राजनीतिक दल अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए लगातार रणनीति बना रहे हैं।
सोमवार को नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि होने के कारण यह दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर निर्दलीय प्रत्याशी सतीश नांदल अपना नाम वापस नहीं लेते हैं तो 16 मार्च को राज्यसभा सीट के लिए मतदान होना तय हो जाएगा। ऐसे में आने वाले दिनों में हरियाणा की राजनीति और ज्यादा सक्रिय हो सकती है।
कांग्रेस पार्टी इस चुनाव को लेकर विशेष सतर्कता बरत रही है। पार्टी हाईकमान ने कर्मबीर बौद्ध को उम्मीदवार बनाया है और उनके समर्थन में पूरी ताकत झोंक दी गई है। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस नेतृत्व लगातार हरियाणा के नेताओं और विधायकों के संपर्क में बना हुआ है ताकि पार्टी के भीतर किसी तरह की टूट-फूट या असंतोष की स्थिति पैदा न हो।
बताया जा रहा है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने हरियाणा कांग्रेस के नेताओं को साफ निर्देश दिए हैं कि राज्यसभा चुनाव में किसी भी तरह की चूक पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है। पिछले चुनावों के अनुभव को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व इस बार कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर इस चुनाव में कोई अप्रत्याशित परिणाम सामने आता है तो इसका असर कांग्रेस की आंतरिक राजनीति पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि पार्टी नेतृत्व अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
उधर निर्दलीय उम्मीदवार सतीश नांदल के मैदान में उतरने से कांग्रेस की चिंता कुछ बढ़ गई है। अगर तीसरा उम्मीदवार चुनाव में नहीं होता तो मौजूदा राजनीतिक समीकरण के अनुसार एक सीट भाजपा और दूसरी सीट कांग्रेस के खाते में जाती हुई नजर आ रही थी। लेकिन अब तीसरे प्रत्याशी की मौजूदगी ने इस चुनाव को दिलचस्प बना दिया है।
भाजपा की स्थिति फिलहाल मजबूत मानी जा रही है। पार्टी ने अपने अनुभवी नेता और पूर्व सांसद संजय भाटिया को उम्मीदवार बनाया है। हरियाणा विधानसभा में भाजपा के पास 48 विधायक हैं, जिससे पार्टी को स्पष्ट बढ़त मिलती है।
इसके अलावा तीन निर्दलीय विधायक भी सरकार के समर्थन में हैं। इनमें हिसार से विधायक सावित्री जिंदल, बहादुरगढ़ से विधायक राजेश जून और गन्नौर से विधायक देवेंद्र कादियान शामिल हैं। इन विधायकों के समर्थन के साथ भाजपा खेमे की संख्या लगभग 51 तक पहुंच जाती है। इस वजह से भाजपा की एक सीट लगभग सुरक्षित मानी जा रही है।
वहीं कांग्रेस के पास विधानसभा में कुल 37 विधायक हैं। पार्टी को उम्मीद है कि अपने संख्याबल के आधार पर वह एक सीट जीतने में सफल हो सकती है। हालांकि तीसरे प्रत्याशी के मैदान में होने से चुनावी समीकरण थोड़ा पेचीदा हो गया है और सभी दल अपने-अपने स्तर पर रणनीति बनाने में जुटे हैं।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी हुई है कि नामांकन वापसी की आखिरी तारीख तक कौन उम्मीदवार मैदान में बना रहता है। अगर सतीश नांदल चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो 16 मार्च को मतदान होना तय है और इससे राज्यसभा चुनाव में राजनीतिक हलचल और तेज हो जाएगी।
कुल मिलाकर हरियाणा का यह राज्यसभा चुनाव केवल संसदीय प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रदेश की सियासत में प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि इस चुनाव में कौन सी पार्टी बाजी मारती है और क्या कोई नया राजनीतिक मोड़ देखने को मिलता है।
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