गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज एक मामले में पुलिस और प्रशासन की बड़ी लापरवाही सामने आई है। अदालत में गैंगचार्ट के माध्यम से गलत तथ्यों को प्रस्तुत करना अब अधिकारियों को महंगा पड़ता नजर आ रहा है। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/विशेष न्यायाधीश (गिरोहबंद अधिनियम) ने इस गंभीर चूक को संज्ञान में लेते हुए जिले के एसपी, डीएम और कोतवाली नगर के प्रभारी निरीक्षक को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में तलब करने के आदेश दिए हैं। अदालत के इस सख्त रुख से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।

यह मामला उस समय सामने आया जब गैंगस्टर एक्ट के तहत नामजद अभियुक्ता रजनी ने अपने खिलाफ दर्ज मुकदमे में नियमित जमानत के लिए न्यायालय में प्रार्थना पत्र दाखिल किया। सुनवाई के दौरान अभियुक्ता के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष कई अहम तथ्यों को रखा और गैंगचार्ट में दर्ज जानकारी पर गंभीर सवाल खड़े किए।
अधिवक्ता ने दलील दी कि गैंगचार्ट में अभियुक्ता रजनी के खिलाफ दो मुकदमे—अपराध संख्या 155/2025 और 156/2025—दिखाए गए हैं। इन दोनों मामलों के संबंध में गैंगचार्ट में यह उल्लेख किया गया है कि आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल हो चुके हैं और अदालत ने उनका संज्ञान भी ले लिया है। जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि इन दोनों मामलों में न तो अब तक आरोप पत्र दाखिल हुए हैं और न ही किसी न्यायालय ने उनका संज्ञान लिया है। दोनों ही मुकदमे अभी विवेचना के स्तर पर हैं। इतना ही नहीं, अभियुक्ता इन मामलों में पहले से ही थाने से जमानत पर हैं और उनके खिलाफ कोई ऐसी स्थिति नहीं है, जिससे यह माना जा सके कि वे एक सक्रिय गिरोह की सदस्य हैं या गैंगस्टर एक्ट लगाने की शर्तें पूरी होती हैं।
अदालत ने जब इस दलील के बाद अभिलेखों का गहन अवलोकन किया, तो स्थिति और भी गंभीर हो गई। न्यायालय के रिकॉर्ड और प्रमाणित प्रतिलिपियों से स्पष्ट हुआ कि गैंगचार्ट में जिन तथ्यों को आधार बनाकर गैंगस्टर एक्ट लगाया गया, वे तथ्य सही नहीं थे। विशेष रूप से यह तथ्य असत्य पाया गया कि दोनों मामलों में आरोप पत्र दाखिल हो चुके हैं।
न्यायालय ने यह भी पाया कि उक्त गैंगचार्ट को 9 दिसंबर 2025 को जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) और पुलिस अधीक्षक (एसपी) द्वारा अनुमोदित किया गया था। यानी बिना तथ्यों की सही जांच और सत्यापन के गैंगचार्ट को मंजूरी दे दी गई। अदालत के अनुसार, यह न केवल अभियुक्ता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के साथ भी गंभीर खिलवाड़ है।
विशेष न्यायाधीश वीरेश चंद्रा ने अपने आदेश में स्पष्ट शब्दों में कहा कि गैंगस्टर एक्ट जैसे कठोर कानून के तहत किसी व्यक्ति को अभियुक्त बनाए जाने से पहले तथ्यों का सही और निष्पक्ष होना बेहद जरूरी है। यदि प्रशासनिक अधिकारी या पुलिस जानबूझकर या लापरवाहीवश गलत तथ्य प्रस्तुत करते हैं, तो यह न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।
इसी आधार पर अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए एसपी, डीएम और कोतवाली नगर के प्रभारी निरीक्षक को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का आदेश दिया है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिए हैं कि उपस्थित होकर अधिकारियों को यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर किस आधार पर गलत तथ्यों वाला गैंगचार्ट तैयार किया गया और उसे अनुमोदन कैसे मिला।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह आदेश पुलिस और प्रशासन के लिए एक कड़ा संदेश है। अक्सर देखने में आता है कि गैंगस्टर एक्ट जैसे कानूनों का इस्तेमाल बिना पर्याप्त ठोस आधार के कर लिया जाता है, जिससे आम नागरिकों को अनावश्यक रूप से कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अदालत का यह कदम भविष्य में ऐसे मामलों पर अंकुश लगाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
वहीं, इस पूरे घटनाक्रम के बाद प्रशासनिक महकमे में भी खलबली मची हुई है। अधिकारियों के तलब होने से यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या गैंगस्टर एक्ट के मामलों में पर्याप्त जांच और कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है या नहीं। यदि अदालत आगे भी सख्ती दिखाती है, तो इस मामले का असर अन्य लंबित और नए गैंगस्टर मामलों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल, सभी की निगाहें अब अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां एसपी, डीएम और थाना प्रभारी को अपने-अपने जवाब पेश करने होंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस गंभीर लापरवाही पर आगे क्या रुख अपनाती है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई होती है या नहीं।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि कानून के तहत किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करते समय तथ्यों की सच्चाई और निष्पक्षता सबसे अहम है। गलत जानकारी के आधार पर की गई कार्रवाई न केवल आरोपी के अधिकारों का हनन करती है, बल्कि न्याय व्यवस्था की साख पर भी सवाल खड़े करती है।
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