दरभंगा। संयुक्त कृषि कार्यालय परिसर, बहादुरपुर में आयोजित दो दिवसीय जिला स्तरीय कृषि यांत्रिकीकरण मेला अब गंभीर सवालों के घेरे में है। किसानों के नाम पर लाखों रुपये खर्च कर आयोजित इस मेले में जमीनी हकीकत बेहद निराशाजनक रही। जहां किसानों की भीड़ होनी चाहिए थी, वहां खाली कुर्सियां नजर आईं। अब यह आयोजन किसानों के हित में था या सिर्फ कागजी खानापूर्ति—यह बड़ा सवाल बन गया है।
लाखों रूपए फूंके, किसान नहीं पहुंचे—जिम्मेदार कौन, जिला कृषि पदाधिकारी जवाब दें!


आदेशों का दोहरा खेल: कृषि मेले में प्रशासनिक साजिश की बू?
कार्यालय से जारी आधिकारिक पत्र में कृषि समन्वयक एवं किसान सलाहकारों को प्रत्येक पंचायत से कम से कम 20 किसानों की उपस्थिति सुनिश्चित करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया था।

अनुमंडल कृषि पदाधिकारियों को भी सख्ती से समन्वय स्थापित कर अधिकाधिक किसानों को मेला तक लाने का आदेश दिया गया। लेकिन हकीकत यह रही कि मेले में किसानों की संख्या नगण्य दिखी।
लिखित आदेश बनाम व्हाट्सएप फरमान—कृषि विभाग में आखिर चल क्या रहा है?

सूत्रों के अनुसार, इसी बीच संबंधित व्हाट्सएप समूह में संदेश प्रसारित किया गया कि मेला में कोई नहीं जाएगा। यदि यह सही है, तो यह सीधा-सीधा प्रशासनिक दोहरा खेल है—एक तरफ कागज पर आदेश, दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर उल्टा निर्देश। आखिर यह विरोधाभासी आदेश किसके संरक्षण में जारी हुआ ?

जिला कृषि पदाधिकारी सिद्धार्थ ने खुद से मीडिया का माईक हटाया, ऑन कैमरा बोले – जवाब नहीं दूंगा
सबसे चिंताजनक पहलू दरभंगा जिला कृषि पदाधिकारी सिद्धार्थ का रवैया रहा। जब मीडिया ने उनसे जवाब मांगा, तो उन्होंने ऑन कैमरा खुद से माइक हटाते हुए कहा – जवाब नहीं दूंगा। एक जिम्मेदार अधिकारी का यह व्यवहार पारदर्शिता की बजाय संदेह को जन्म देता है। यदि सब कुछ नियम के अनुसार हुआ है, तो जवाब देने में परहेज क्यों?

आदेश कुछ और, संदेश कुछ और—कृषि मेला बना प्रशासनिक विरोधाभास का उदाहरण
कृषि यांत्रिकीकरण मेला का उद्देश्य किसानों को अनुदानित दर पर आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराना बताया गया। लेकिन जब आयोजन में ही समन्वय की विफलता, विरोधाभासी निर्देश और किसानों की अनुपस्थिति सामने आए, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर प्रशासनिक विफलता प्रतीत होती है।


किसानों को दूर रखकर किसके लिए हुआ कृषि मेला ?
आरोप यह भी लग रहे कि किसानों के नाम पर योजनाओं का बजट खर्च कर औपचारिक कार्यक्रम कर देना और वास्तविक लाभार्थियों को जानकारी तक न पहुंचाना, किसानों के साथ अन्याय है।
किसानों के हित की आड़ में अव्यवस्था—जांच की उठी तेज मांग
अब मांग उठ रही है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हो, जिला कृषि पदाधिकारी की भूमिका की समीक्षा की जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि लाखों रुपये खर्च के बावजूद परिणाम शून्य क्यों रहा।
कृषि मेले में किसानों की अनुपस्थिति, जिम्मेदारी तय कब होगी?
जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक यह सवाल बना रहेगा—क्या यह मेला किसानों के लिए था या सिर्फ कागजों के लिए?

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