उत्तराखंड में धार्मिक स्थलों की पवित्रता और परंपराओं को लेकर एक बार फिर बड़ा फैसला सामने आया है। गंगोत्री धाम में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर औपचारिक रूप से रोक लगा दी गई है। मंदिर समिति का कहना है कि यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया है और इसका उद्देश्य पवित्र धाम की धार्मिक गरिमा, परंपरा और आस्था की रक्षा करना है। इसके साथ ही संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे प्रमुख धामों में भी इसी तरह की व्यवस्था लागू की जा सकती है।

श्री गंगोत्री मंदिर समिति के अध्यक्ष सुरेश सेमवाल ने बताया कि समिति की बैठक में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में सभी सदस्यों ने एकमत से निर्णय लिया कि गंगोत्री धाम में केवल हिंदू श्रद्धालुओं को ही प्रवेश की अनुमति होगी। उनका कहना है कि गंगोत्री धाम केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है, जहां सदियों से धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना होती रही है। ऐसे में यहां आने वाले लोगों को भी उसी मर्यादा और धार्मिक भाव के अनुरूप होना चाहिए।
इस फैसले का दायरा केवल गंगोत्री धाम तक सीमित नहीं रहेगा। मंदिर समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि गंगोत्री का शीतकालीन प्रवास स्थल मुखबा में भी गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित रहेगा। मुखबा में शीतकाल के दौरान मां गंगा की पूजा होती है और इसे भी उतना ही पवित्र माना जाता है जितना गंगोत्री धाम को। समिति का मानना है कि अगर गंगोत्री में प्रतिबंध है, तो मुखबा में भी वही नियम लागू होना चाहिए।
इधर, इस फैसले के बाद बदरीनाथ और केदारनाथ को लेकर भी हलचल तेज हो गई है। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने बताया कि उनकी अगली बोर्ड बैठक में इस विषय पर प्रस्ताव लाया जाएगा। यदि बोर्ड से प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो उसे शासन और सरकार के समक्ष भेजा जाएगा। उनका कहना है कि बदरीनाथ और केदारनाथ भी सनातन धर्म की आस्था के सबसे बड़े केंद्रों में से हैं और वहां भी परंपरा, मर्यादा और धार्मिक नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने हरिद्वार के हर की पैड़ी क्षेत्र में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर लगाए गए प्रतिबंध को ऐतिहासिक कदम बताया है। उनके अनुसार, राज्य सरकार ने जो फैसला हर की पैड़ी को लेकर लिया है, वही भावना बदरी-केदार धाम के लिए भी लागू होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह केवल किसी वर्ग के खिलाफ फैसला नहीं है, बल्कि धार्मिक स्थलों की पवित्रता और मूल स्वरूप को बनाए रखने का प्रयास है।
दरअसल, हरिद्वार में गंगा घाटों, हर की पैड़ी और आसपास के प्रमुख धार्मिक क्षेत्रों में पहले ही गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाई जा चुकी है। इसके बाद से ही अन्य धार्मिक संगठनों और मंदिर समितियों की ओर से भी इसी तरह की मांगें उठने लगी हैं। कई धार्मिक संस्थाओं ने तो सरकार से यह तक कहा है कि पूरे कुंभ क्षेत्र को ही गैर-हिंदुओं के लिए प्रतिबंधित घोषित किया जाए, ताकि वहां होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और पर्व पूरी तरह पारंपरिक तरीके से संपन्न हो सकें।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस पूरे मुद्दे पर संतुलित प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि राज्य के पवित्र धाम केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं, बल्कि सनातन धर्म की आस्था के केंद्र हैं। यहां कामकाज और व्यवस्थाएं पौराणिक मान्यताओं, परंपराओं और संस्कृति के अनुरूप ही होनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर समितियों और तीर्थ पुरोहितों की जो भी मांगें होंगी, सरकार उन्हें गंभीरता से सुनेगी और सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही निर्णय लेगी।
मुख्यमंत्री धामी ने हरिद्वार के गंगा घाटों को लेकर कहा कि वहां पहले से बने पुराने कानूनों और एक्ट का अध्ययन किया जा रहा है। उसी के आधार पर आगे के फैसले लिए जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि यदि बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति की ओर से कोई प्रस्ताव आता है, तो सरकार उस पर कानून, परंपरा और सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विचार करेगी। सरकार का उद्देश्य किसी को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि सनातन धर्म के पवित्र स्थलों की गरिमा और शुद्धता को बनाए रखना है।
राज्य में इस फैसले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। समर्थकों का कहना है कि धार्मिक स्थलों की एक विशिष्ट पहचान और परंपरा होती है, जिसे बनाए रखना जरूरी है। उनका मानना है कि जैसे कुछ धार्मिक स्थल केवल विशेष समुदाय के लिए आरक्षित होते हैं, वैसे ही हिंदुओं के प्रमुख तीर्थस्थलों में उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियम लागू होना स्वाभाविक है। वहीं, कुछ लोग इसे संवेदनशील मुद्दा मानते हुए कानूनी और सामाजिक पहलुओं पर सावधानी बरतने की बात भी कह रहे हैं।
फिलहाल इतना तय है कि गंगोत्री धाम में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक का फैसला उत्तराखंड की धार्मिक राजनीति और सामाजिक विमर्श में एक नया अध्याय जोड़ रहा है। आने वाले दिनों में बदरीनाथ और केदारनाथ को लेकर होने वाले फैसलों पर पूरे देश की नजरें टिकी रहेंगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार, मंदिर समितियां और समाज मिलकर इस मुद्दे पर किस तरह का संतुलन बनाते हैं, ताकि आस्था, परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के बीच तालमेल बना रहे।
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