मौरावां थाना क्षेत्र के गांव पांडेयपुर में सोमवार का दिन कभी न भूलने वाला बन गया। बाराबंकी जिले में सड़क हादसे का शिकार हुए युवक का शव जैसे ही गांव पहुंचा, पूरे इलाके में कोहराम मच गया। घर के दरवाजे पर शव आते ही रोते-बिलखते परिजनों की चीख-पुकार से माहौल गमगीन हो गया। जिसने भी यह मंजर देखा, उसकी आंखें नम हो गईं।

मृतक की पहचान 28 वर्षीय आशीष कुमार के रूप में हुई है, जो एक एनजीओ में काम करता था। आशीष परिवार की उम्मीदों का सहारा था और मेहनत-मजदूरी के बल पर अपने घर की जिम्मेदारी उठा रहा था। लेकिन एक सड़क हादसे ने उसके सपनों के साथ-साथ पूरे परिवार की खुशियों को हमेशा के लिए छीन लिया।
काम के सिलसिले में गया था बाराबंकी
परिजनों के मुताबिक, आशीष 18 जनवरी को काम के सिलसिले में बाराबंकी गया था। वह एनजीओ से जुड़ा हुआ था और अक्सर दूसरे जिलों में काम के लिए आना-जाना करता रहता था। किसी को अंदाजा भी नहीं था कि यह उसकी आखिरी यात्रा साबित होगी।
बाराबंकी में वह ई-रिक्शा से सफर कर रहा था। जैसे ही ई-रिक्शा पल्हरी ओवरब्रिज के नीचे पहुंचा, पीछे से तेज रफ्तार डंपर ने जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि ई-रिक्शा के परखच्चे उड़ गए। हादसे में आशीष को गंभीर चोटें आईं और मौके पर ही उसकी मौत हो गई।
घटना की सूचना मिलते ही आसपास के लोग मौके पर जमा हो गए। स्थानीय पुलिस को जानकारी दी गई, जिसके बाद पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। हादसे के बाद डंपर चालक मौके से फरार हो गया, जिसकी तलाश पुलिस कर रही है।
पोस्टमार्टम के बाद गांव पहुंचा शव
पोस्टमार्टम की कार्रवाई पूरी होने के बाद सोमवार को आशीष का शव उसके पैतृक गांव पांडेयपुर लाया गया। जैसे ही शव गांव में पहुंचा, परिवार में कोहराम मच गया। पत्नी शिवकुमारी अपने पति का शव देखकर बदहवास हो गई। वह बार-बार यही कहती रही कि अब उसके और बेटी के सहारे कौन रहेगा।
मां तुलसी का भी रो-रोकर बुरा हाल था। बेटे को खोने का गम वह सहन नहीं कर पा रही थीं। शव से लिपटकर वह फूट-फूटकर रोती रहीं। मासूम बेटी अदिति अपने पिता को उठाने की कोशिश करती रही, यह कहते हुए कि “पापा उठो, घर चलना है।” बेटी की यह हालत देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं।
परिवार की टूटी कमर
आशीष चार भाई-बहनों में सबसे छोटा था। घर में वही सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जाता था। पिता पहले ही दुनिया से जा चुके हैं और मां की देखभाल की जिम्मेदारी भी आशीष ही निभा रहा था। उसकी कमाई से ही घर का खर्च चलता था। उसकी मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।
परिजनों का कहना है कि आशीष बेहद शांत स्वभाव का था और मेहनती था। वह हमेशा परिवार के लिए बेहतर भविष्य का सपना देखता था। पत्नी और बेटी के लिए वह दिन-रात मेहनत करता था। अचानक हुए इस हादसे ने पूरे परिवार को बेसहारा कर दिया है।
गांव में पसरा सन्नाटा
आशीष की मौत की खबर से पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। गांव के लोग उसके घर पहुंचकर परिजनों को ढांढस बंधाते नजर आए। हर किसी की जुबान पर यही सवाल था कि इतनी कम उम्र में आशीष को आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि उसे बाहर जाकर काम करना पड़ा और उसकी जान चली गई।
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि सड़क हादसे लगातार बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। तेज रफ्तार और लापरवाही लोगों की जान ले रही है।
बक्सर घाट पर किया गया अंतिम संस्कार
शव गांव पहुंचने के कुछ समय बाद परिजन अंतिम संस्कार की तैयारी में जुट गए। पूरे विधि-विधान के साथ शव को बक्सर घाट ले जाया गया। वहां परिजनों और ग्रामीणों की मौजूदगी में आशीष का अंतिम संस्कार किया गया। चिता को मुखाग्नि देते समय परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था।
अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद लोगों ने परिवार को हर संभव मदद का भरोसा दिलाया। वहीं परिजनों ने प्रशासन से मांग की है कि हादसे के लिए जिम्मेदार डंपर चालक के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और परिवार को आर्थिक सहायता दी जाए।
सवालों के घेरे में सड़क सुरक्षा
यह हादसा एक बार फिर सड़क सुरक्षा और यातायात नियमों की अनदेखी पर सवाल खड़े करता है। ओवरब्रिज और उसके आसपास भारी वाहनों की तेज रफ्तार अक्सर हादसों का कारण बनती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते ऐसे इलाकों में सख्ती बरती जाए, तो कई जानें बचाई जा सकती हैं।
आशीष की मौत ने उसके परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है। पत्नी, मां और बेटी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। एक हंसता-खेलता परिवार पलभर में उजड़ गया। अब सभी की नजरें प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या पीड़ित परिवार को न्याय और मदद मिल पाएगी या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
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