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उ.प्र. :: स्वेच्छा से भेजे गए थे 14 शव – एसएसपी

लखनऊ (राज प्रताप सिंह) : जीसीआरजी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल कालेज में 14 शवों के मामले पर एसएसपी दीपक कुमार ने कॉलेज को अपनी ओर से क्लीनचिट दे दी। जब एसएसपी को इन शवों के बारे में पूरी जानकारी थी तो आखिर कॉलेज में पुलिस कर क्या रही थी। हालांकि यह सब तब था जब एमसीआई लगातार इन शवों पर संदेह जता रही है और प्रमाणपत्र से लेकर अन्य तमाम चीजें संदेह में हैं। इतना ही नहीं कॉलेज प्रबंधक अभिषेक यादव यहां पर आए शवों की जानकारी और आवश्यक दस्तावेज एमसीआई को नहीं दे पाए थे।
  • भेजे गए 14 शवों को लेकर मचा हड़कंप
  • राम रहीम मामले से जुड़ रहा मेडिकल कॉलेज
दुष्कर्म का आरोपी गुरमीत राम-रहीम के सिरसा आश्रम से राजधानी स्थित जीसीआरजी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस में छह माह के अंदर 14 अवैध शवों को भेजने का मामला सामने आया है। जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की समिति ने मेडिकल साइंसेस के दस्तावेजों की जांच की तो खुलासा हुआ। समिति के अनुसार जनवरी 2017 से अगस्त 2017 के बीच भेजे गए 14 शवों के साथ ना ही कोई मृत्यु प्रमाणपत्र था और न ही अन्य अनुमति ली गई थी। हालांकि एसएसपी दीपक कुमार ने सभी प्रमाण पत्रों और स्वीकृति पत्रों का होने का दावा किया है। उनके अनुसार इन शवों को देहदान और परिजनों की सहमति के आधार पर ही मेडिकल कॉलेज को भेजा गया था।
बख्शी का तालाब में स्थित इस मेडिकल कॉलेज में भेजे गए शव आश्रम में मरे हुए लोगों के हो सकते हैं। इन्हें ठिकाने लगाने के लिए मेडिकल कॉलेज सबसे सेफ जोन माना जा सकता है। इसीलिए किसी को इसकी भनक ना लगे और शवों को बड़े सुनियोजित ढ़ंग से यहां भेज दिया गया। यह कॉलेज उस समय विवाद में आ गया था जब मेडिकल कांउसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने 7 जनवरी 2017 को यहां का निरीक्षण किया था। इस दौरान कॉलेज के पास एक मात्र शव था। जांच के दौरान कई कमियां मिलने समिति ने इसकी मान्यता रद कर दी थी। मामले पर कॉलेज प्रशासन उच्च न्यायालय पहुंचा तो अदालत ने सुनवाई का मौका देने को कहा। सुनवाई के दौरान ही कमेटी को यह पता चला कि कॉलेज को 14 शव सिरसा आश्रम से भेजे गए थे। हालांकि इनके मृत्यु प्रमाण पत्र भी नहीं थे। कॉलेज के प्रबंधक अभिषेक यादव भी पूरे मामले पर कोई जवाब नहीं दे पाए। अब स्वास्थ्य मंत्रालय ने कॉलेज की मान्यता रद करने के साथ ही कठोर कदम उठाने की सिफारिश की है।
“बीकेटी के कॉलेज में मार्च से अब तक 14 शव आईं थी। शव के परिजनों ने कॉलेज को देहदान के पत्र भी दिए हैं साथ ही मेडिकल कॉलेज ने शव की स्वीकृति पत्र भी परिजनों को सौंपे हैं। इसलिए जो भी शव यहां पर आए हैं वह स्वेच्छा से भेजे गए थे। इसलिए यह पूरी तरह सही हैं। मामले पर एमसीआई से भी बात की जाएगी और उन्हें पूरा सहयोग किया जाएगा।”
-दीपक कुमार
एसएसपी
आखिर कौन सी पुलिसिंग
शवों को लेकर एक ओर जहां कॉलेज पर कार्रवाई की बात हो रही है तो वहीं पुलिस इसे स्वेच्छा से भेजा जाना बता रही है। सवाल यह है कि विरोधाभाष के बीच राजधानी में यह कैसी पुलिसिंग हो रही है। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब ऐसा हुआ हो। इसी वर्ष मार्च महीने में जब एटीएस ने संदिग्ध आतंकी सैफुल्ला को मार गिराया तो तत्कालीन एडीजी लॉ-ऑर्डर दलजीत चौधरी ने उसे आतंकी मानने से इनकार कर दिया। जबकि उसके पास से बहुत सी संदिग्ध चीजे बरामद की गई थीं। कुछ ऐसा ही मामला यहां भी हुआ कि जब एमसीआई इसे संदिग्ध बता रहा है तो पुलिस ने इसे क्लीन चिट दे दी।
लाख रुपये का एक शव
एक लाश की कीमत एक लाख रुपये की होती है। मेडिकल कॉलेज एनॉटॉमी की पढ़ाई के लिए इसे खरीद भी लेते हैं। यह शव अधिकतर सड़क हादसों के शिकार हुए लोगों के अधिक होते हैं। इसलिए पुलिस की मिलीभगत से शवों को लावारिस रूप में मेडिकल कॉलेज पहुंचाकर मोटी रकम ले ली जाती है। नए नियम के अनुसार एमसीआई ने शव को रखना अनिवार्य कर दिया है इसलिए बिना पोस्टमार्टम के शवों की मांग बढ़ गई है।

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