मासूम का ये रूप कर रहा मानवीय संवेदनाओं को शर्मसार,ककहरा सीखने की उम्र में उठा रहीं जिम्मेदारी
लखनऊ,ब्यूरो:राज प्रताप सिंह।
लखनऊ। घर से लेकर बाहर तक अपने हौंसलों से उड़ान भरने वाली बेटियां भगवान का दिया हुआ एक अनमोल वरदान है।जब इसी वरदान पर काले बादल मंडराने लगते हैं तो प्रकृति के सृजन के साथ खिलवाड़ होता दिखाई देने लगता है। जिस उम्र में बेटियों को ककहरा सीखना चाहिए उस उम्र में वो परिवार का पालन-पोषण करने का दायित्व निभा रही हों तो कहीं न कहीं मानवीय संवेदनाएं शर्मसार होती हुई प्रतीत होती हैं। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभालते ही बेटियों की समृद्घि पर गहन चिंतन किया था और एक योजना ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ लागू की। उनकी इस योजना से प्रदेशों ने सबक लिया और अपने-अपने सूबे में इसे लागू करने के लिए आलाहुक्मरानों को कड़े निर्देश भी दिये। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इस योजना को लागू करने के लिए कागजों में भले ही अथक प्रयास किये गये हों लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
बेटियां चाहे किसी की भी हों बेटियां घर की लक्ष्मी ही मानी जाती है। सरकार भी ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ मिशन पर काम कर रही है। इसके बावजूद गरीब बेटियों का भविष्य संवरता नहीं दिख रहा। बचपन से ही बेटियों को भीख मांगने, घरों में जूठे बर्तन साफ करने या फिर रईसजादों की गाडिय़ों के आगे खड़े होकर खिलौने बेंचने के काम में लगा दिया जाता है। मजबूरी जो भी हो गरीब बेटियों की ऐसी दुर्दशा, सरकार के ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ मिशन की सार्थकता पर सवाल उठा रहे है। आखिर इन बेटियों की शिक्षा-दीक्षा, रहन-सहन, खान-पान से लेकर शादी-विवाह तक समस्या ही समस्या है। इनका जीवन स्तर कैसे सुधरेगा। आखिर सरकारी योजनाओं का लाभ इन तक कैसे पहुंचेगा। गरीब बेटियों को कौन पढ़ाएगा, कौन इनसे शादी करेगा। ऐसे तमाम सवाल हर गरीब बेटियों के सामने यक्ष प्रश्न बने हुए हैं। इन सवालों का जवाब खोजने वाले गरीब परिवार तनाव में जीवन गुजार रहे हैं। ऐसे परिवार अवसाद या तमाम बीमारियों से ग्रसित होकर समय से पहले दम तोड़ देते हैं। यतीम बेटियों के आगे अपने भविष्य को लेकर फिर वही यक्ष प्रश्न खड़ा हो जाता है। जिसका जवाब उन्हें सड़क के किनारे भीख मांगने, लोगों के जूठे बर्तन साफ करने, गंदे कपड़े धुलने और रईसों की गाडिय़ों के आगे खिलौने बेंचने के बाद भी नहीं मिलता। हालांकि गरीब बहन-बेटियों की यह समस्या बहुत पुरानी है। लेकिन केन्द्र की मोदी और राज्य की योगी सरकार से गरीबों को उम्मीद है कि उनके बच्चों का भविष्य उज्जवल होगा। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान शुरू होने के बाद गरीब बेटियां भी अपने उज्जवल भविष्य की आस लगाये बैठी हैं।
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कौन सुधारेगा हमारा भविष्य।
सूबे की राजधानी की सड़कों पर कुंवारी बेटियां जगह-जगह भींख मांगते या फिर किसी रईस की गांडिय़ां साफ कर रही है। यह हाल तब है जब केन्द्र और राज्य सरकार बेटियां बचाओ-बेटियां पढ़ाओ अभियान चला रही है। ऐसे में गरीबी से कराह रहे लाखों परिवारों को सरकार से बड़ी उम्मीदें है। लेकिन उन्हें कही से उम्मीद की किरन नजर नहीं आ रही। शायद यही कारण है कि एक तरफ ‘बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओ अभियान का जोर-शोर से प्रचार-प्रसार हो रहा है। वहीं दूसरी ओर शहरों की सड़कों के किनारे कम उम्र की बेटियां अपने हाथों में खिलौने लेकर बेंचती या कटोरा लेकर भीख मांगती नजर आती है। उनकी बेबस निगाहें सरकार और समाज से एक ही सवाल करती है कि आखिर कौन हमारा भविष्य सुधारेगा।
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हजरतगंज चौराहा बना इनका कर्मक्षेत्र।
भोर की किरण का उजाला मानों इन बेटियों के लिए अलार्म का काम करता है। सुबह-सुबह राजधानी की हृदय स्थली कहा जाने वाला हजरतगंज चौराहा इनके लिए कर्म क्षेत्र बन जाता है। चारों तरफ से आने वाले वाहन जो लाल बत्ती देख कर रूक जाते हैं। उनकी तरफ बड़ी उम्मीदों के साथ लपक पड़ती हैं। इनके हाथों में कापी किताब, बच्चों के खिलौने से लेकर बिक्री की अन्य तमाम वस्तुएं होती हैं। बावजूद इसके कारों में सवार लोग इनकी द्वारा बिक्री की जा रही वस्तुओं को दया की दृष्टि दिखाते हुए खरीदते हैं।
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