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बिहार :: अलाइव एंड थ्राइव और यूनिसेफ के द्वारा निजी चिकित्‍सकों के क्षमतावर्द्धन के लिए प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन

पटना : अलाइव एंड थ्राइव और यूनिसेफ के द्वारा इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (बिहार शाखा) और पटना ओब्स्टेट्रिक एंड गयनेकोलॉजिकल सोसाइटी (POGS)के सहयोग से मातृ शिशु और नवजात पोषण (एमआईवाईसीएन) के उपर मेडिकल प्रैक्टिशनर/चिकित्‍सकों के क्षमतावर्द्धन के लिए प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। 

प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (बिहार शाखा) के अध्यक्ष डॉ अरूण साह, यूनिसेफ बिहार के पोषण विशेषज्ञ रवि एन पाढी, पटना के वरिष्‍ठ चिकित्‍सक और पीएमसीएच के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉनिगम प्रकाश नारायण,नेशनल ट्रेनर, डॉ सतीश तिवारी और डॉ श्रीनिवास सदगोपालन , डॉ एस ए कृष्णा, वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञडॉ उत्‍पलकांत सिंह, अलाइव एंड थ्राइव के डॉ शैलेश जगताप,अनुपम श्रीवास्‍तव , (POGS) की डॉ आभारानी सिन्‍हा और डॉ मीना सामंत ने सदस्‍य डाक्‍टरों और अन्‍य गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में दीप जला कर किया।

  • माताओं और बच्‍चों के कुपोषण को दूर करने के लिए इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (बिहार शाखा) और पटना ओब्स्टेट्रिक एंड गयनेकोलॉजिकल सोसाइटी (POGS) के चिकित्‍सक करेंगे मिलकर काम

इस प्रशिक्षण कार्यशाला का उद्देश्य मातृ शिशु और नवजात बच्‍चों के पोषण को सुधारने के लिए नीति और कार्यक्रम एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए चिकित्सा संस्थानों और आईएपी और POGSजैसे संगठनों को शामिल करना और पूरे राज्‍य में मातृ शिशु और छोटे बच्‍चों के पोषण (एमआईवाईसीएन) के बारे में निजी चिकित्सकों खास कर पीडियाट्रिक्स और ओब्स्टेट्रिक के बीच प्रभावी ढंग से जागरूकता पैदा करना है ताकि बिहार के बच्‍चों, माताओं और नवजात बच्‍चों को सुपोषित किया जा सकें। इस प्रशिक्षण के माध्‍यम से आज लगभग 50 मेडिकल प्रैक्टिशनर को प्रशिक्षित किया गया है जो बिहार में सभी निजी चिकित्सकों (बाल रोग विशेषज्ञों और Obstetricians) की क्षमतावर्द्धन कर इस पहल को आगे बढाएंगे। 

कार्यशाला को संबोधित करते हुए इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (बिहार शाखा) के अध्‍यक्ष डॉ अरूण साह ने कहा कि हम सब यह जानते हैं कि स्‍तनपान से बेहतर कोई विकल्‍प नहीं हैं बच्‍चों के लिए फिर क्‍या कारण हैं कि बिहार में अब भी जन्‍म के 1 घंटे के अंदर केवल 35 प्रतिशत बच्‍चों में ही स्‍तनपान की शुरूआत हो पाती है। हमें सोचना होगा कि क्‍या इसकेलिए हम पीडियाट्रिक्स जिम्‍मेदार है। स्तनपान राष्ट्रीय उत्पादकता से भी जुड़ा हुआ है। कुपोषित बच्‍चे और किशोर देश की उत्‍पादकता को कम करते हैं। मां का पहला दूध (कोलोस्ट्रम) से संबंधित मिथकों के बारे में बताते हुए डॉ साह ने कहा कि कुछ लोग यह मानते है कि इसे बच्चे को नहीं देना चाहिए। जबकि पहला दूध मां की पूरी स्तनपान अवधि का सबसे अच्छा दूध होता है। मां के दूध में पानी समृद्ध रूप में होता है, इसलिए स्तनपान कराने वाले बच्चों को अतिरिक्त पानी की आवश्यकता नहीं होती है। उन्होंने उन सभी डॉक्टरों से अपील किया कि सीजेरियन मामले में भी पाउडर मिल्‍क या किसी मिल्‍क सबस्टीट्यूट की सलाह नहीं देगे। उन्‍होनें कहा कि हम सब मिलकर स्तनपान को प्रोत्साहित करें , सुरक्षित करें और उसका समर्थन करें। 

डॉ निगम प्रकाश नारायण ने कहा कि पहले 24 महीने तक बच्‍चों के लिए मां का दूध ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत होता है। भारत जैसे सीमित संसाधन वाले देश के लिए, स्‍तनपान कुपोषण को दूर करने में बहुत महत्‍वपूण भूमिका निभा सकता है। यह बच्‍चों को सबसे अच्‍छा पोषण प्रदान करता है , प्रतिरक्षा में वृद्धि करता हैं और बच्चे के मस्तिष्क के उचित विकास में मदद करता है। डॉ नारायण ने स्‍तनपान के चार मुख्‍य सिद्धांतों सीधा, समीप, सहारा, सामने के बारे में बताया और कहा कि हमें मां को हमें यही समझाना है।

 नेशनल ट्रेनर डॉ श्रीनिवास सदगोपालन ने विशेष परिस्थितियों जैसे कम वजन वाले बच्‍चे और सिजेरियन के माध्‍यम से जन्‍मे बच्‍चों में स्‍तनपान की शुरूआत के बारे में बताया । नेशनल ट्रेनर डॉ सतीश तिवारी ने स्‍तनपान के सही शुरूआत और पूरक आहार का सही तरीका और विभिन्‍न फूड ग्रुप और डायट डाइवर्सिटी के बारे में विस्‍तृत रूप से बताया। एक गर्भवती माँ के पेट में पलने वाले बच्चे की सेहत पूरी तरह से अपनी माँ की सेहत पर निर्भर होती है। गर्भावस्था के समय सही पोषणयुक्त खाना, न केवल एक सेहतमंद शिशु का जन्म होना तय करता है बल्कि प्रसव के समय होने वाले खतरों को भी कम करता है। 

यूनिसेफ के पोषण विशेषज्ञ रवि एन पाढ़ी ने कहा लैनसेंट 2003 के अनुसार IYCF प्रैक्टिस के माध्‍यम से हम लगभग 20 फीसदी बच्‍चों की होने वाली मौतों को कम कर सकते हैं। अन्‍य शोधों के अनुसार जन्‍म से एक घंटे के अंदर स्‍तनपान से 22 प्रतिशत नवजातों को बचाया जा सकता हैं । बिहार में कुपोषण और शिशु मृत्‍यु दर में कमी के लिए मातृत्‍व स्‍वास्‍थ्‍य तथा पोषण और खास तौर से दो साल से कम के बच्‍चों में विशेष ध्यान देने की जरूरत है और इसमें आईएपी और POGS अहम साझीदार हैं।
माताओं के पोषण के बारे मे बताते हुए डॉ मीना सांमत ने कहा कि बच्‍चों को सही पोषण की शुरूआत गर्भावस्था में ही हो जाती हैं। बच्‍चों के समुचित विकास के लिए मां का पोषण काफी जरूरी है और ऐसे में गर्भवती को फाइव फूड ग्रुप्स का खाना मिलना चाहिए ।

यूनिसेफ की पोषण पदाधिकारी डॉ शिवानी दर ने यूनिसेफ के सहयोग से चलाएं जा रहे IYCF कॉउंसलिंग सेंटर के बारे में विस्तृत प्रस्तुतिकरण दिया।

अलाइव एंड थ्राइव के डॉ शैलेश जगतापने बच्‍चों के विकास के लिए महत्वपूर्ण 1000 दिनों के बारे में बताते हुए कहा कि गर्भ के शुरूआत से लेकर बच्‍चें के जन्‍म के 2 साल बाद तक का समय कुपोषण को कम करने का सबसे महत्वपूर्ण समय है और अगर हमने अगर इसपर फोकस कर लिया तो काफी बेहतर परिणाम मिलेंगें।

कार्यक्रम के दौरान सभी लोगों ने मिलकर बिहार मे माताओं, बच्‍चों और नवजातों के पोषण को बेहतर करने के लिए एक एक्‍शन प्‍लान का भी निर्माण किया। कार्यक्रम के दौरान सभी सत्रों के बाद संबधित विषयों से जुडे फिल्‍मों और एजुकेशनल वीडियो की स्क्रीनिंग किया गया। प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र भी वितरित किया गया। अंत में अलाइव एंड थ्राइव के डॉ विशाल शास्‍त्री ने धन्‍यवाद ज्ञापन दिया।

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