दुनिया इस समय एक जटिल भू-राजनीतिक दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, खासकर ईरान से जुड़ा संकट, वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार पर गहरा असर डाल रहा है। ऊर्जा आपूर्ति से लेकर लॉजिस्टिक्स तक, हर स्तर पर अनिश्चितता बढ़ी है। ऐसे समय में भारत ने अपनी आर्थिक रणनीति को नए सिरे से ढालते हुए स्पष्ट संकेत दिया है कि वह केवल पारंपरिक बाजारों पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि नए और उभरते बाजारों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएगा। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट इसी दिशा में भारत की तैयारियों को रेखांकित करती है

रिपोर्ट के अनुसार, भारत तेजी से निर्यात विविधीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि देश अब सीमित बाजारों पर निर्भर रहने के बजाय अपने व्यापारिक संबंधों का विस्तार कर रहा है। इसके लिए कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर तेजी से काम चल रहा है। इनमें कनाडा, इजराइल, श्रीलंका, पेरू, चिली, ऑस्ट्रेलिया और मेक्सिको जैसे देश शामिल हैं। इसके अलावा फिलीपींस और मालदीव के साथ भी बातचीत आगे बढ़ने की संभावना है।
भारत की यह रणनीति केवल बाजार बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य वैश्विक जोखिमों को संतुलित करना भी है। जब किसी एक क्षेत्र में संकट उत्पन्न होता है, तो उसका सीधा असर व्यापार पर पड़ता है। ऐसे में अगर व्यापार कई क्षेत्रों में फैला हो, तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यही कारण है कि भारत अब बहु-क्षेत्रीय व्यापार मॉडल की ओर बढ़ रहा है।
नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि पारंपरिक बाजार जैसे उत्तरी अमेरिका, खासकर अमेरिका, और यूरोप अभी भी भारत के निर्यात के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं। यूरोप में नीदरलैंड्स एक अहम भूमिका निभा रहा है। हालांकि, इसके साथ ही उत्तर-पूर्व एशिया और पूर्वी अफ्रीका जैसे उभरते बाजार भी तेजी से महत्व प्राप्त कर रहे हैं। यह बदलाव धीरे-धीरे लेकिन स्पष्ट रूप से भारत के व्यापारिक दृष्टिकोण में विविधता को दर्शाता है।
मुक्त व्यापार समझौतों का प्रभाव भी अब साफ दिखने लगा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2006 में भारत के कुल व्यापार में FTA का हिस्सा केवल 4.6 प्रतिशत था, जो 2024 में बढ़कर 28.8 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह वृद्धि बताती है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में व्यापारिक समझौतों के जरिए अपनी वैश्विक पहुंच को काफी हद तक बढ़ाया है। आने वाले समय में यदि अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौता लागू होता है, तो यह हिस्सेदारी और भी बढ़ सकती है।
हालांकि, वैश्विक संकटों का असर पूरी तरह से टाला नहीं जा सकता। ईरान संकट के चलते खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी है, जिसका सीधा असर ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ा है। तेल के प्रमुख ढांचों पर हमलों की खबरों ने कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है। इसका असर न केवल ऊर्जा लागत पर पड़ा है, बल्कि परिवहन और उत्पादन खर्च भी बढ़ गए हैं। इससे वैश्विक व्यापार की गति धीमी होने का खतरा पैदा हो गया है।
भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। देश के कुल निर्यात-आयात में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 12 प्रतिशत है। इसमें संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब प्रमुख साझेदार हैं। यूएई न केवल एक बड़ा व्यापारिक भागीदार है, बल्कि वह एक प्रमुख पुनः निर्यात केंद्र के रूप में भी काम करता है। इसके जरिए भारत का व्यापार पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप तक पहुंचता है। इस लिहाज से खाड़ी क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता भारत के व्यापार पर प्रभाव डाल सकती है।
भारत के कुल निर्यात में अमेरिका, यूएई और हांगकांग की संयुक्त हिस्सेदारी 70 से 75 प्रतिशत के बीच है। यह आंकड़ा बताता है कि अभी भी कुछ बाजारों पर निर्भरता काफी अधिक है। हालांकि, उत्तर-पूर्व एशिया में निर्यात में 33.5 प्रतिशत की वृद्धि यह संकेत देती है कि भारत धीरे-धीरे नए क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। स्पेन का शीर्ष-10 निर्यात गंतव्यों में शामिल होना भी इसी दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
नीति आयोग की रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि ऊर्जा कीमतों में लगातार वृद्धि होती रही, तो इसका असर वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर पड़ सकता है। विशेष रूप से वे देश जो ईंधन आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। भारत भी एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए उसके लिए यह जरूरी है कि वह ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों और आपूर्ति के नए रास्तों पर ध्यान दे।
इन चुनौतियों के बावजूद भारत की रणनीति स्पष्ट है—विविधीकरण, लचीलापन और विस्तार। नए बाजारों में प्रवेश, व्यापार समझौतों को बढ़ावा और घरेलू उत्पादन को मजबूत करना इस रणनीति के मुख्य स्तंभ हैं। सरकार ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों के जरिए उत्पादन और निर्यात को बढ़ाने पर जोर दे रही है।
इसके अलावा, डिजिटल व्यापार और सेवा क्षेत्र भी भारत के लिए नए अवसर खोल रहे हैं। आईटी और डिजिटल सेवाओं के जरिए भारत न केवल पारंपरिक व्यापार बाधाओं को पार कर रहा है, बल्कि वैश्विक बाजार में अपनी अलग पहचान भी बना रहा है। यह क्षेत्र भविष्य में भारत की व्यापारिक रणनीति का अहम हिस्सा बन सकता है।
कुल मिलाकर, ईरान संकट और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह चुनौतियों से घबराने वाला नहीं है। बल्कि, वह इन परिस्थितियों को अवसर में बदलने की दिशा में काम कर रहा है। नए बाजारों की तलाश, व्यापार समझौतों का विस्तार और मजबूत आर्थिक नीतियां भारत को वैश्विक व्यापार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना रही हैं।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत अपनी इस रणनीति को कितनी तेजी और प्रभावशीलता के साथ लागू कर पाता है। लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि बदलती दुनिया में भारत ने अपने कदम सही दिशा में बढ़ा दिए हैं—जहां जोखिम भी हैं, लेकिन संभावनाएं उससे कहीं ज्यादा बड़ी हैं।
स्वर्णिम टाईम्स : Swarnim Times आपका अपना इंटरनेट अख़बार !