देश के प्रसिद्ध लेखक शंकर झा की कलम से। मिथिला, जो अपनी सांस्कृतिक संपन्नता और उपजाऊ भूमि के लिए जानी जाती है, आज आर्थिक परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। यहाँ की घनी आबादी और कृषि पर अत्यधिक निर्भरता को देखते हुए, बड़े उद्योगों की तुलना में कुटीर उद्योग (Cottage Industries) ही समावेशी विकास (Inclusive growth) और प्रति व्यक्ति आय (Per Capita income) बढ़ाने का सबसे व्यावहारिक और टिकाऊ मॉडल सिद्ध हो सकते हैं।

समावेशी विकास का आधारः स्थानीय संसाधन
मिथिला के कुटीर उद्योगों की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि इनके लिए कच्चा माल और कौशल दोनों स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हैं। समावेशी विकास का अर्थ है समाज के अंतिम व्यक्ति तक आर्थिक लाभ पहुँचाना, और मिथिला के संदर्भ में यह तीन मुख्य स्तंभों पर टिका हैः
1. महिला सशक्तिकरण और मधुबनी पेंटिंगः मिथिला पेंटिंग अब केवल दीवारों तक सीमित नहीं है। इसने ग्रामीण महिलाओं को ‘उद्यमी’ बनाया है। जब एक ग्रामीण महिला घर के कामों के बीच खाली समय में पेंटिंग कर आय अर्जित करती है, तो वह सीधे तौर पर परिवार की प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करती है। यह मॉडल ‘वर्क फ्राम होम’ (Work from home) का सबसे पुराना और सफल उदाहरण है।

2. मखानाः ‘व्हाइट गोल्ड’ का आर्थिक चक्रः मखाना केवल एक फसल नहीं, बल्कि एक संपूर्ण कुटीर उद्योग है। इसके लावा निकालने से लेकर ग्रेडिंग और पैकेजिंग तक की प्रक्रिया में स्थानीय श्रम की भारी आवश्यकता होती है। यदि इसके प्रसंस्करण (Processing) को सूक्ष्म स्तर पर हर गांव में प्रोत्साहित किया जाए, तो यह पलायन रोकने में सबसे प्रभावी हथियार बन सकता है।

3. सिक्की कला (Sikki Grass Craft) और सुजनी कढ़ाई कला (Sujani Embroidery Craft): ये कलाएँ शून्य या न्यूनतम निवेश पर आधारित हैं। जंगली घास (सिक्की) और पुराने कपड़ों (सुजनी) से मूल्यवान उत्पाद बनाना ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ (Waste to Wealth) का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो भूमिहीन श्रमिकों के लिए आय का जरिया बनता।

आर्थिक प्रभावः-
(1) प्रति व्यक्ति आय में वृद्धिः– जब हम बड़े कारखानों की बात करते हैं, तो लाभ का बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों के पास जाता है। इसके विपरीत, कुटीर उद्योग में ‘मूल्य संवर्धन’ (Value Addition) का लाभ सीधे कलाकार या श्रमिक को मिलता है।
(2) पूंजी की कम आवश्यकताः– यहाँ “उत्पादन का पैमाना” (Scale of Production) नहीं, बल्कि “लोगों द्वारा उत्पादन” (Production by Masses) महत्वपूर्ण है। कुटीर उद्योग में कम पूँजी निवेश की जरूरत होती हैं, क्योंकि कच्चा माल सस्ते दर पर स्थानीय मार्केट में उपलब्ध, कम और स्थानीय उपकरण का उपयोग, पारम्परिक कौशल के आधार पर उत्पादन जहाँ श्रम लागत कम होता है।
3) पलायन पर रोकः– जब स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलता है, तो शहरी झुग्गियों में होने वाला अमानवीय पलायन कम होता है, जिससे जीवन स्तर (Quality of Life) में सुधार आता हैं।
चुनौतियाँ और सुधार के उपाय
यद्यपि यह मॉडल व्यावहारिक है, लेकिन इसके पूर्ण दोहन (Optimum Utilization) के लिए कुछ बाधाओं को दूर करना आवश्यक हैः-
- बिचौलियों (Middle men) का अंतः डिजिटल साक्षरता और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स (जैसे अमेजन, फ्लिपकार्ट या सरकारी ई-मार्केटप्लेस) के माध्यम से कलाकारों को सीधे ग्राहकों से जोड़ना होगा।
- मानकीकरण (Standardization): उत्पादों की गुणवत्ता में एकरूपता लाने के लिए क्लस्टर आधारित ट्रेनिंग सेंटर्स की आवश्यकता है।
- क्रेडिट (Credit) सुविधाः मुद्रा योजना जैसी ऋण योजनाओं को धरातल पर और सुलभ बनाना होगा ताकि छोटे उद्यमी नई तकनीक अपना सकें।
निष्कर्षः– मिथिला के लिए कुटीर उद्योग केवल परंपरा नहीं, बल्कि भविष्य का आर्थिक इंजन हैं। यदि सरकार और समाज मिलकर बुनियादी ढांचे (Basic infrastructure) और विपणन (Marketing) पर ध्यान दें, तो मिथिला का यह ‘लोकल’ मॉडल वैश्विक स्तर पर ‘वोकल’ बनकर भारत की जीडीपी में अमूल्य योगदान दे सकता है। यह एक ऐसा मॉडल है जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना, सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए, समाज के सबसे निचले तबके की आय बढ़ाने की क्षमता रखता है। अर्थात मिथिला का कुटीर उद्योग, आर्थिक समावेशी विकास का व्यवहारिक मॉडल प्रस्तुत करता हैं।

एस. झा
(छ0ग० राज्य वित्त सेवा) वित्त नियंत्रक पु.मु.
अटल नगर, नवा रायपुर
एम.एस.सी. (कृषि अर्थशास्त्र) एल.एल.बी.
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