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बिहार के मिथिला क्षेत्र के जिलों की प्रति व्यक्ति आय अन्य क्षेत्रों से कम, आय संवर्द्धन हेतू कुटीर उद्योग/सांस्कृतिक पर्यटन में सुधार (reformation) जरुरीः-

बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 (दिनांक 02 फरवरी 2026) को बिहार विधान में प्रस्तुत किया गया। यह बिहार का 20वां आर्थिक सर्वेक्षण था जिनकी कुछ मुख्य बाते इस प्रकार हैं:-
वर्ष 2024-25 में बिहार की आर्थिक विकास दर 13.1 प्रतिशत (वर्तमान मूल्य पर) रही, जो राष्ट्रीय औसत (8 प्रतिशत वर्तमान मूल्य पर) से अधिक है।
प्रति व्यक्ति आयः राज्य में प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) बढ़कर वर्तमान मूल्यों पर ₹76490 और स्थिर मूल्यों (2011-12) पर ₹40973 हो गई है।
क्षेत्रीय प्रदर्शनः प्रति व्यक्ति आय के मामले में पटना, बेगूसराय (औद्योगिक हब) और मुंगेर शीर्ष तीन जिलों में रहे, जबकि शिवहर, अररिया और सीतामढ़ी सबसे निचले पायदान पर रहे।
उपर्युक्त आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट बिहार की अर्थव्यवस्था में प्रति व्यक्ति आय की स्थिति, राज्य के भीतर गहरे क्षेत्रीय असंतुलन को दर्शाती है। जिलों एवम् क्षेत्रों के बीच आय का बड़ा अंतर काफी चिंताजनक है। इसे निम्नलिखित तथ्यों से आसानी से समझा जा सकता है। असमान आय को समझने आय का विवरण को तीन श्रेणियों में देखा जा सकता हैः-
(क) शीर्ष आय वाले क्षेत्र व जिलेः-
मगध क्षेत्रः- पटना इस क्षेत्र का हृदय है, जिसकी प्रतिव्यक्ति आय राज्य में सर्वाधिक (लगभग ₹1.31 लाख) है। मगध के अन्य जिले जैसे गया और जहानाबाद भी तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में है, क्योंकि यहाँ अर्थव्यवस्था का तृतीयक क्षेत्र, सेवा क्षेत्र (बैकिंग, पर्यटन, शिक्षा) और बुनियादी अवसंरचना काफी मजबूत है। इसके बाद बेगूसराय (औद्योगिक हब) और मुंगेर का स्थान आता है।
(ख) निम्न आय वाले क्षेत्रः– राज्य के सबसे पिछड़े जिलों में शिवहर (लगभग ₹22047), सीतामढ़ी (लगभग ₹ 24332) जो मिथिलांचल के क्षेत्र में है तथा अररिया जिला (लगभग 23670) जो सीमांचल और वृहद मिथिलांचल का क्षेत्र में आता है।
यहाँ नोट करने की बात है कि पटना (मगध) और शिवहर (मिथिला) की आय में लगभग 6 गुणा का अंतर है।
(ग) शहरी बनाम ग्रामीणः– शहरी क्षेत्रों (विशेषकर पटना और मुजफ्फरपुर) में सेवा क्षेत्र (Ter tiary Sector) की प्रधानता के कारण आय अधिक है, जबकि ग्रामीण क्षेत्र (शिवहर, सीतामढ़ी, अररिया आदि) की आय कृषि की अनिश्चितता पर निर्भर है। उत्तर बिहार के मिथिलांचल के जिले (जैसे शिवहर सीतामढ़ी, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर) हर साल बाढ़ से प्रभावित होते हैं, जिससे यहाँ पूँजी निर्माण/निवेश नहीं हो पाता है।
बिहार के अर्थ-व्यवस्था (GSDP) में आर्थिक क्षेत्रों के योगदान तथा क्षेत्रवार रोजगार की उपलब्धताः-
(क) कृषि व संबद्ध क्षेत्रः- राज्य के स.रा.घ.उ. में 20 प्रतिशत का योगदान परन्तु राज्य के लगभग 54 प्रतिशत जनसंख्या इस पर निर्भर। अतः प्रति व्यक्ति आय में कमी।
(ख) उद्योग एवम् निमार्ण क्षेत्रः- राज्य के स.रा.घ.उ.में 18 प्रतिशत का योगदान तथा राज्य के लगभग 24 प्रतिशत लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता हैं।
(ग) सेवा क्षेत्रः-राज्य के स.रा.घ.उ.में 62 प्रतिशत का योगदान परन्तु राज्य के लगभग 22 प्रतिशत लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है। इसमें मुख्य रूप से सूचना प्रौद्योगिकी बैंकिंग व व्यापार आते हैं।
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट हैं किः- तीनों क्षेत्रों का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) में योगदान और उनकी रोजगार सृजन क्षमता के बीच एक बड़ा असंतुलन देखने को मिलता है। यही कारण है कि ऊंची विकास दर (13.1 प्रतिशत वर्तमान मूल्य पर होने के वावजूद राज्य में प्रति व्यक्ति आय का स्तर (₹76490 प्रति व्यक्ति, वर्तमान मूल्यों पर) अपेक्षाकृत राष्ट्रीय स्तर (₹2,20,000 प्रति व्यक्ति, वर्तमान मूल्यों पर) से कम बना हुआ है।
तीन क्षेत्रों का आर्थिक विश्लेषणः-
(क) कृषि एवम् संबद्ध क्षेत्रः– GSDP में 20 प्रतिशत का योगदान परन्तु राज्य के वर्क फोर्स का लगभग 54 प्रतिशत आबादी रोजगार हेतु निर्भर।
अतः प्रति व्यक्ति आय में भारी कमी । “प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) अधिक है। अर्थात कृषि में जरूरत से ज्यादा लोग निर्भर हैं। अगर कृषि के अतिरिक्त मछली पालन, मखाना उत्पादन, हार्टिकल्चर और डेयरी पशुपालन को बढ़ावा दिया जाय तो आय बढ़ाया का सकता है
(ख) औद्योगिक और निर्माण क्षेत्रः- GSDP में 18 प्रतिशत का योगदान परन्तु राज्य के वर्क फोर्स का लुगभग 24 प्रतिशत आबादी रोजगार हेतु निर्भर।
बड़े उद्योगों की कमी (बेगूसराय जिला को छोड़कर) के कारण यह क्षेत्र योगदान में काफी पिछड़ा है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) और इथेनॉल प्लॉट (पूर्णिया, मधुबनी) के माध्यम से इनका योगदान और रोजगार संभावनाएँ बढ़ायी जा सकती है।
(ग) सेवा क्षेत्रः– GSDP में 62 प्रतिशत का योगदान परन्तु राज्य के वर्क फोर्स का लगभग 22 प्रतिशत आबादी रोजगार हेतु निर्भर। पिहले कुछ वर्षों में बिहार की विकास दर को इसी क्षेत्र ने गति दी है। व्यापार, मशीन वाहन मरम्मत सेवा, और दूर-संचार प्रौद्योगिकी में सबसे तेज वृद्धि हुई है। यह क्षेत्र उच्च कौशल रोजगार (High skilled employment) तो पैदा कर रहा है, लेकिन अकुशल श्रमिकों (जिनकी बहुतायत है), के लिए इस क्षेत्र में अवसर सीमित हैं। अतः इन श्रमिकों के कौशल विकास हेतु ट्रेनिंग देने की सख्त आवश्यकता हैं।
निष्कर्षः- बिहार की चुनौती है कि वह अपनी 54 प्रतिशत कार्य-बल (Work force) को, जो केवल 20 प्रतिशत आय पैदा कर रही है, इसे कैसे प्रशिक्षण देकर द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र में स्थानान्तरित करे।
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्ष 2024-25 में राज्य, अर्थ-व्यवस्था (GSDP) का आकर्षक वृद्धि दर के बावजूद, राज्य की जनता का प्रति व्यक्ति औसत आय ₹76490 राष्ट्रीय औसत प्रति व्यक्ति आय (₹2,20,000) से काफी कम हैं।
अब हम देखते हैं मिथिला क्षेत्र के जिलों की प्रति व्यक्ति आय कम होने के कारण तथा आय संवर्द्धन हेतु कुटीर उधोग व सांस्कृतिक पर्यटन की सभावना व उनमें सुधार की जरूरत कोः-
मिथिला में प्रति व्यक्ति आय, जो बिहार के अन्य आर्थिक क्षेत्रों से कम है, को बढ़ाने कुटीर उद्योग और सांस्कृतिक पर्यटनः-
मिथिला, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सुविख्यात विद्वता और अद्वितीय कला परंपरा के लिए विश्वभर में जानी जाती है, आज एक विरोधाभासी स्थिति से गुजर रही है। एक ओर जहाँ इसकी सांस्कृतिक पहचान अत्यंत सुदृढ़ है, वहीं दूसरी ओर आर्थिक मोर्चे पर यह क्षेत्र विहार के अन्य हिस्सों की तुलना में पिछड़ गया है। प्रति व्यक्ति आय में इस गिरावट को रोकने और क्षेत्रीय विकास को गति देने के लिए कुटीर उद्योगों का पुनरुद्धार और सांस्कृति पर्यटन का विस्तार ही एकमात्र टिकाऊ समाधान प्रतीत होता है।
कुटीर उद्योगः स्वावलंबन का आधार
मिथिला की अर्थव्यवस्था का पारंपरिक ढांचा हमेशा से कृषि और स्थानीय शिल्प पर आधारित रहा है। आज के समय में, जब बड़े उद्योगों की स्थापना में भूमि और निवेश की बाधाएं हैं, कुटीर उद्योग एक गेम चेंजर साबित हो सकते हैं।

मिथिला पेंटिंग का व्यवसायीकरणः मधुबनी पेंटिंग अब केवल दीवारों तक सीमित नहीं है। इसे वस्त्रों (साड़ी, कुर्ता), घरेलू सजावट के सामान और स्टेशनरी से जोड़कर एक वैश्विक ब्रांड बनाया जा सकता है। यदि प्रत्येक गांव में प्रशिक्षण और विपणन केंद्र (Training and Marketing Hubs) हों, तो हजारों महिलाओं को घर बैठे रोजगार मिल सकता है।
मखाना प्रसंस्करणः विश्व के कुल मखाना उत्पादन का लगभग 80-90 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। कच्चे मखाने के बजाय ‘रोस्टेड’ और ‘फ्लेवर्ड’ मखाना के कुटीर उद्योग लगाकर मूल्यवर्धन (Value Addition) किया जाए, तो किसानों और स्थानीय युवाओं की आय में कई गुना वृद्धि संभव है।

सिक्की (Sikki Grass Craft) और सुजनी कढ़ाई कला (Sujani Embroidery Craft): घास से बनी ‘सिक्की’ की वस्तुएं और “सुजनी कढ़ाई” में निर्यात की अपार संभावनाएं हैं। इन उत्पादों को आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़कर ई-कामर्स प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध कराना आवश्यक है।

सांस्कृतिक पर्यटन : अर्थव्यवस्था का नया इंजन
मिथिला केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक ‘अनुभव’ है। रामायण सर्किट से लेकर शक्तिपीठों तक, यहाँ पर्यटन की ऐसी असीम संभावनाएं हैं जिन्हें अब तक पूरी तरह नहीं भुनाया गया है।
1. धार्मिक और ऐतिहासिक पर्यटनः जनकपुर (नेपाल), अहिल्या स्थान, चामुंडा स्थान, उच्चैठ भगवती स्थान, भद्रकाली व ठाढ़ी परमेश्वरी स्थान जैसे स्थलों को बेहतर सड़क सुविधाओं और अन्य सुविधाओं से जोड़कर ‘धार्मिक कारिडोर’ के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इससे होटल, परिवहन और गाइड सेवाओं जैसे क्षेत्रों में रोजगार सृजित होंगे।

2. अनुभव-आधारित पर्यटन (Experiential Tourism): विदेशी और शहरी पर्यटक आज ग्रामीण जीवन का अनुभव करना चाहते हैं। मिथिला के गाँवों में ‘होम-स्टे’ (Home stay) की सुविधा विकसित कर पर्यटकों को ‘पाग-दही-मछली’ की संस्कृति, तालाबों की शांति और लोकगीतों से रूबरू कराया जा सकता है।
3. सांस्कृतिक महोत्सवः कोजागरा, सामा चकेवा, जितिया और मधुश्रावणी जैसे अनूठे पर्वो को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट कर पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है।
बुनियादी ढांचे और शिक्षा की भूमिका
आर्थिक विकास के इन दोनों स्तंभों को मजबूती देने के लिए बिजली की निर्बाध आपूर्ति, बेहतर डिजिटल कनेक्टिविटी और ‘स्किल डेवलपमेंट’ अनिवार्य है। जुब स्थानीय युवाओं को अपनी कला और उत्पादों के लिए उचित बाजार (Market Linkage) मिलेगा, तो पलायन की समस्या स्वतः कम होगी और प्रति व्यक्ति आय में सुधार होगा।
निष्कर्ष : मिथिला की गरीबी का समाधान बाहरी सहायता के बजाय उसके भीतरी संसाधनों में छिपा है। कुटीर उद्योगों के माध्यम से उत्पादन और सांस्कृतिक पर्यटन के माध्यम से सेवा क्षेत्र को मजबूती देकर हम एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बना सकते हैं, जहाँ परंपरा और प्रगति साथ-साथ चलें। यदि सरकार, निजी क्षेत्र और स्थानीय समाज मिलकर प्रयास करें, तो वह दिन दूर नहीं जब मिथिला बिहार ही नहीं, बल्कि देश के संपन्नतम क्षेत्रों में गिना जाएगा, जरूरत है आय संवर्द्धन हेतु कुटीर उद्योग/सांस्कृतिक पर्यटन में सुधार की।

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