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रेवाड़ी-बिवाड़ी सीमा पर पुलिस पर गंभीर आरोप, नाबालिग को उठाकर थर्ड डिग्री देने का मामला; SHO समेत चार पर FIR

हरियाणा के रेवाड़ी-बिवाड़ी क्षेत्र में एक नाबालिग के साथ कथित पुलिस अत्याचार का मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने 16 वर्षीय लड़के को घर से उठाकर हिरासत में लिया और उसके साथ बेरहमी से मारपीट की, जिससे उसकी हालत गंभीर हो गई। बढ़ते विरोध और राजनीतिक दबाव के बाद आखिरकार थाना प्रभारी समेत चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। इस पूरे घटनाक्रम ने कानून-व्यवस्था और मानवाधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामले के अनुसार, घटना 21 अप्रैल की दोपहर की बताई जा रही है, जब पुलिसकर्मी कथित तौर पर भिवाड़ी फेस-3 थाना क्षेत्र से नाबालिग के घर पहुंचे और उसे जबरन अपने साथ ले गए। परिजनों का कहना है कि उस समय लड़का पूरी तरह स्वस्थ था और उसे बिना किसी स्पष्ट कारण के उठाकर ले जाया गया। परिवार के मुताबिक, उन्हें न तो गिरफ्तारी की जानकारी दी गई और न ही यह बताया गया कि लड़के को किस मामले में हिरासत में लिया जा रहा है।

परिजनों ने आरोप लगाया कि कुछ ही समय बाद उन्हें एक फोन कॉल आया, जिसमें लड़का रोते हुए मदद की गुहार लगा रहा था। उसने बताया कि पुलिसकर्मी उसे लगातार पीट रहे हैं और उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। इस कॉल के बाद परिवार में घबराहट फैल गई और वे तुरंत थाने की ओर रवाना हुए।

अगले दिन जब परिजन थाने पहुंचे, तो उन्हें नाबालिग से मिलने नहीं दिया गया। परिवार का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें लगातार टालमटोल किया और कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी। इसी बीच दोपहर के समय थाना प्रभारी की ओर से फोन कर बताया गया कि लड़के को एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है और वे तुरंत वहां पहुंचें।

जब परिजन अस्पताल पहुंचे, तो वहां का दृश्य देखकर उनके होश उड़ गए। नाबालिग बेहोशी की हालत में था और उसे वेंटिलेटर पर रखा गया था। डॉक्टरों ने उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे जयपुर के एक बड़े अस्पताल में रेफर कर दिया। परिवार का कहना है कि इस दौरान पुलिसकर्मी लगातार उनके साथ मौजूद रहे और उन्हें मामले से जुड़ी कोई भी जानकारी सार्वजनिक करने से रोकते रहे।

परिजनों का यह भी आरोप है कि जयपुर के अस्पताल में पुलिसकर्मियों ने उन्हें नाबालिग की हालत के फोटो और वीडियो बनाने से रोका। इतना ही नहीं, जो रिकॉर्डिंग उन्होंने की थी, उसे भी दबाव बनाकर डिलीट करवा दिया गया। परिवार का कहना है कि पुलिस इस पूरे मामले को दबाने की कोशिश कर रही थी।

इस घटना के सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया। शुरुआत में जब परिवार ने पुलिस से शिकायत की, तो कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी इस मामले में कूद पड़े। कांग्रेस के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पीड़ित परिवार के समर्थन में धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया।

रविवार शाम को कांग्रेस जिलाध्यक्ष बलराम यादव के नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोग चौपानकी थाने पहुंचे और पुलिस के खिलाफ नारेबाजी की। माहौल उस समय और गरमा गया, जब पूर्व विधायक संदीप यादव और कांग्रेस से जुड़े अन्य नेता भी प्रदर्शन में शामिल हो गए। बढ़ते दबाव के बीच पुलिस प्रशासन को आखिरकार झुकना पड़ा और देर रात एफआईआर दर्ज की गई।

एफआईआर में यूआईटी थाना प्रभारी दारा सिंह मीणा सहित चार पुलिसकर्मियों को नामजद किया गया है। आरोपियों के खिलाफ मारपीट और अनुसूचित जाति एवं जनजाति (SC/ST) अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

उधर, भिवाड़ी के पुलिस अधीक्षक ब्रजेश उपाध्याय ने बताया कि नाबालिग के फेफड़ों में संक्रमण पाया गया है और उसका इलाज जयपुर के निम्स अस्पताल में चल रहा है। उन्होंने कहा कि फिलहाल प्राथमिकता लड़के के इलाज को दी जा रही है। साथ ही मामले की जांच एडिशनल एसपी को सौंपी गई है, जो पूरी घटना की जांच कर रिपोर्ट सौंपेंगे।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि मानवाधिकारों का भी गंभीर हनन है। खासकर एक नाबालिग के साथ इस तरह का व्यवहार समाज के लिए चिंता का विषय है।

विशेषज्ञों का मानना है कि हिरासत में किसी भी व्यक्ति के साथ मारपीट या थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कानूनन अपराध है। इसके बावजूद यदि ऐसे मामले सामने आते हैं, तो यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं सिस्टम में सुधार की आवश्यकता है। पुलिस को कानून का पालन कराने वाली संस्था माना जाता है, ऐसे में यदि वही कानून तोड़ने लगे, तो आम जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है।

फिलहाल सभी की नजर इस मामले की जांच पर टिकी हुई है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच कितनी निष्पक्ष होती है और क्या पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाता है या नहीं। साथ ही यह भी जरूरी है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाएं।

इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए केवल नियम बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना भी जरूरी है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक इस तरह के मामले सामने आते रहेंगे।

अंततः, यह मामला केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है कि न्याय व्यवस्था को और अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाने की जरूरत है।

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