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वानर सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग :: बंदरों के सामूहिक निष्कासन पर रवि के पटवा ने जताई आपत्ति, कहा—एक बंदर की गलती की सजा पूरे वानर समाज को देना क्रूरता

बंदर/वानर सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग, मानवीय एवं कानूनी तरीके से हो समस्या का समाधान

वार्ड संख्या 21 में बंदरों को पकड़कर हटाने की कार्रवाई पर जताई आपत्ति; रवि के पटवा ने नगर निगम और प्रशासन से कानूनसम्मत, वैज्ञानिक एवं मानवीय तरीके से समस्या के समाधान की मांग की।

दरभंगा। शहर के वार्ड 21 में बंदरों को पकड़कर हटाने की कथित कार्रवाई को लेकर देशभक्त, फिल्मकार, पर्यावरणविद, इतिहासकार एवं समाज सुधारक तथा प्रेसिडेंट अम्बेडकर वी.के. पटवा सामाजिक न्याय मेमोरियल और चेयरपर्सन MBSVR सनातन धर्म ट्रस्ट के रवि के पटवा ने गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि यदि किसी एक बंदर के व्यवहार से लोगों को परेशानी हो रही है तो उसका समाधान पूरे वानर समाज को दोषी ठहराकर या उन्हें सामूहिक रूप से पकड़कर हटाकर नहीं किया जा सकता। किसी एक जीव के व्यवहार के आधार पर पूरी प्रजाति को दंडित करना न तो मानवीय दृष्टि से उचित है और न ही पर्यावरणीय संतुलन के लिए सही है।

रवि के पटवा ने कहा कि समाज और प्रशासन को किसी भी समस्या के समाधान के लिए संवेदनशील, वैज्ञानिक और कानूनसम्मत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि “यदि किसी एक व्यक्ति के अपराध के लिए उसके पूरे समाज को सजा नहीं दी जा सकती, तो किसी एक बंदर के कथित आक्रामक व्यवहार की वजह से पूरे वानर समाज को क्यों निशाना बनाया जाए?” उन्होंने कहा कि यदि कोई बंदर वास्तव में बीमार, आक्रामक या असामान्य व्यवहार कर रहा है तो उसकी पहचान कर विशेषज्ञों की मदद से सुरक्षित तरीके से उसका उपचार अथवा पुनर्वास किया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि वार्ड संख्या 21 के पार्षद द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर बंदरों को पकड़वाने और हटाने की कार्रवाई कराई जा रही है।

रवि के पटवा ने कहा कि वन्यजीवों से संबंधित किसी भी कार्रवाई को संबंधित नगर निकाय, वन विभाग तथा सक्षम प्रशासनिक तंत्र के समन्वय और लागू कानूनों के अनुसार ही किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत स्तर पर ऐसी कार्रवाई कराने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके लिए विधिसम्मत अनुमति और अधिकृत व्यवस्था मौजूद हो।

 

रवि के पटवा के अनुसार, इस मामले में वार्ड संख्या 21 के पार्षद से उनकी फोन पर बातचीत भी हुई। बातचीत में पार्षद की ओर से एक बंदर के कथित रूप से पागल अथवा आक्रामक होने की बात कही गई। इस पर उन्होंने सवाल उठाया कि यदि समस्या किसी एक बंदर से है तो उसकी वजह से सभी बंदरों को पकड़ने की कार्रवाई क्यों की जा रही है। उन्होंने कहा कि एक समस्या पैदा करने वाले जीव की पहचान कर उसका समाधान करना और पूरी प्रजाति को निशाना बनाने में बड़ा अंतर है।

 

उन्होंने कहा कि पार्षद की ओर से विशेषज्ञ शिकारियों को बुलाए जाने की बात भी कही गई। रवि के पटवा ने कहा कि वन्यजीवों के मामले में प्राथमिकता पशु को नुकसान पहुंचाने की नहीं, बल्कि सुरक्षित पकड़ने, उपचार और पुनर्वास की होनी चाहिए। उन्होंने मांग की कि बंदरों को पकड़ने के लिए केवल प्रशिक्षित, अधिकृत और पशु कल्याण के मानकों का पालन करने वाली एजेंसी अथवा विशेषज्ञों की ही सहायता ली जाए।

 

रवि के पटवा ने अपने पूर्व प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2025 में नगर निगम बोर्ड में बंदरों से संबंधित कार्रवाई को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया था। इसके बाद उनके नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन नगर निगम आयुक्त राकेश कुमार से मिला था। प्रतिनिधिमंडल ने बंदरों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग करते हुए ज्ञापन भी सौंपा था। उनके अनुसार, तत्कालीन आयुक्त ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।

 

उन्होंने कहा कि इसके बावजूद बंदरों से जुड़ा यह विषय फिर से सामने आना चिंताजनक है। उनका कहना है कि यह किसी व्यक्ति अथवा वार्ड की प्रतिष्ठा का विषय नहीं होना चाहिए। यह शहर, पर्यावरण, वन्यजीव संरक्षण और मानवीय संवेदना से जुड़ा विषय है। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को मिलकर ऐसा समाधान तलाशना चाहिए जिसमें आम नागरिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो और वन्यजीवों के साथ अनावश्यक क्रूरता भी न हो।

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सनातन परंपरा में वानरों का विशेष स्थान

रवि के पटवा ने कहा कि भारतीय सनातन परंपरा में वानरों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान श्रीराम की कथा से लेकर भगवान हनुमान की भक्ति और सेवा तक, वानर भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। रामायण में वानर सेना द्वारा भगवान श्रीराम की सहायता किए जाने का विस्तृत वर्णन मिलता है। हनुमान जी को शक्ति, भक्ति, सेवा, समर्पण और साहस का प्रतीक माना जाता है।

उन्होंने कहा कि किष्किंधा की परंपरा भारतीय धार्मिक इतिहास में विशेष महत्व रखती है। रामायण में बाली, सुग्रीव, हनुमान और अन्य वानर पात्रों का उल्लेख मिलता है। वर्तमान कर्नाटक क्षेत्र से किष्किंधा की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा को जोड़ा जाता है। ऐसे में वानरों को केवल शहर में उत्पन्न होने वाली समस्या के रूप में देखना भारतीय संस्कृति और प्रकृति के बीच के ऐतिहासिक संबंध को नजरअंदाज करना है।

उन्होंने कहा कि देश के अनेक धार्मिक और पर्यटन स्थलों—जैसे अयोध्या, काशी, मथुरा और अन्य स्थानों—पर वानरों की मौजूदगी लंबे समय से देखी जाती रही है। धार्मिक स्थलों पर आने वाले श्रद्धालु भी उन्हें धार्मिक आस्था के साथ देखते हैं। इसलिए प्रशासन को बंदरों से संबंधित समस्या का समाधान करते समय स्थानीय धार्मिक भावनाओं और सांस्कृतिक संवेदनाओं का भी ध्यान रखना चाहिए।

 

मानव-वानर संघर्ष का समाधान जरूरी

रवि के पटवा ने यह भी स्पष्ट किया कि वे आम नागरिकों की सुरक्षा की चिंता को नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी इलाके में बंदरों के कारण लोगों को वास्तविक परेशानी हो रही है, बच्चों अथवा बुजुर्गों की सुरक्षा प्रभावित हो रही है, संपत्ति को नुकसान हो रहा है या किसी व्यक्ति पर हमला हुआ है तो प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन कार्रवाई का तरीका वैज्ञानिक और मानवीय होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मनुष्य और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संघर्ष केवल बंदरों की समस्या नहीं है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, पेड़ों की कटाई, प्राकृतिक आवासों में कमी और भोजन की उपलब्धता में बदलाव के कारण कई वन्यजीव मानव बस्तियों के करीब आ रहे हैं। ऐसे में केवल जानवरों को पकड़कर दूसरे स्थान पर छोड़ देना स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए दीर्घकालिक योजना, कचरा प्रबंधन, प्राकृतिक आवासों का संरक्षण और लोगों में जागरूकता जरूरी है।

उन्होंने नागरिकों से भी अपील की कि बंदरों को उकसाने, पत्थर मारने, डंडे से पीटने अथवा उनके साथ छेड़छाड़ करने से बचें। यदि कोई बंदर घर या परिसर में आ जाता है तो घबराने के बजाय सुरक्षित दूरी बनाए रखें और आवश्यक होने पर संबंधित प्रशासनिक या वन्यजीव विभाग को सूचना दें। उन्होंने कहा कि कई बार मनुष्य द्वारा जानवर को उकसाने के बाद होने वाली प्रतिक्रिया को जानवर का स्वभाव मान लिया जाता है।

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कानून के पालन की मांग

रवि के पटवा ने कहा कि भारत में पशुओं और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए विभिन्न कानून और नियम मौजूद हैं। इसलिए किसी भी वन्यजीव को पकड़ने, स्थानांतरित करने अथवा उसके साथ कार्रवाई करने से पहले संबंधित कानूनी प्रावधानों का पालन होना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि इस मामले में स्पष्ट किया जाए कि बंदरों को पकड़ने की कार्रवाई किस विभाग की अनुमति से, किस एजेंसी द्वारा और किन नियमों के तहत की जा रही है।

उन्होंने कहा कि यदि कोई कार्रवाई कानून के विरुद्ध पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जांच करनी चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कार्रवाई के दौरान किसी जानवर को अनावश्यक चोट, यातना या मृत्यु का सामना न करना पड़े।

रवि के पटवा ने कहा कि “वानरों की रक्षा केवल धार्मिक आस्था का प्रश्न नहीं है। यह करुणा, पर्यावरण संरक्षण और जीवों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी प्रश्न है।” उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा ने प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान की भावना को सदियों से महत्व दिया है। इसलिए समाज को आधुनिक शहरी समस्याओं का समाधान करते समय अपनी मानवीय संवेदना को जीवित रखना होगा।

उन्होंने प्रशासन और नगर निगम से मांग की कि बंदरों को पकड़ने अथवा हटाने की किसी भी प्रस्तावित कार्रवाई की तत्काल समीक्षा की जाए। यदि किसी विशेष बंदर से खतरा है तो उसकी पहचान कर विशेषज्ञों की सहायता से सुरक्षित तरीके से कार्रवाई की जाए। पूरे वानर समाज को पकड़ने अथवा हटाने की नीति नहीं अपनाई जाए।

उन्होंने कहा कि “किसी एक बंदर की कथित गलती की सजा पूरे वानर समाज को देना न्याय नहीं है। जिस वानर समाज को हमारी धार्मिक परंपरा भगवान श्रीराम की सहायता करने वाली वानर सेना और पवनसुत हनुमान के माध्यम से सम्मान देती है, उसके प्रति कम-से-कम इतनी संवेदना अवश्य होनी चाहिए कि समस्या का समाधान हिंसा और क्रूरता के बजाय करुणा, विज्ञान और कानून के रास्ते से किया जाए।”

रवि के पटवा ने अंत में कहा कि राष्ट्र, समाज और पृथ्वी का जीवनकाल किसी एक व्यक्ति के जीवनकाल से कहीं बड़ा है। इसलिए तत्कालिक सुविधा अथवा व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के बजाय आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति और जीव-जंतुओं के संरक्षण की सोच विकसित करनी होगी। उन्होंने प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और नागरिक समाज से अपील की कि मानव और वन्यजीवों के बीच संतुलन कायम करने की दिशा में मिलकर काम करें।

पवनसुत हनुमान की जय।

सियापति रामचंद्र की जय।

पार्वतीपति हर-हर महादेव।

 

                जारीकर्ता :- रवि के पटवा

देशभक्त, फिल्मकार, पर्यावरणविद, इतिहासकार एवं समाज सुधारक, प्रेसिडेंट — अम्बेडकर वी.के. पटवा सामाजिक न्याय मेमोरियल, चेयरपर्सन — MBSVR सनातन धर्म ट्रस्ट

 

Note – यह आलेख/खबर/विचार आरोपों पर आधारित है इसमें हमारा या हमारे चैनल की कोई भी निजी राय नहीं है।

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