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दरभंगा में अल-मंसूर ट्रस्ट की ‘गुफ़्तगू’, ‘कश्मीर का अधूरा सफर’ पुस्तक का लोकार्पण, साहित्यकारों की समकालीन जिम्मेदारियों पर मंथन

सौरभ शेखर श्रीवास्तव की ब्यूरो रिपोर्ट दरभंगा। शहर के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवेश को नई ऊर्जा प्रदान करते हुए अल-मंसूर ट्रस्ट, दरभंगा के तत्वावधान में साहित्यिक एवं वैचारिक गोष्ठी ‘गुफ़्तगू’ का भव्य आयोजन हकीम दमड़ी मंज़िल, डॉ. आफताब हुसैन कॉम्प्लेक्स, सुभाष चौक, दरभंगा में किया गया। गोष्ठी का मुख्य विषय “साहित्यकारों की समकालीन जिम्मेदारियाँ” था, जिस पर देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण प्रसिद्ध कथाकार एवं साहित्यकार डॉ. मुजीर अहमद आज़ाद की नवीन यात्रा-वृत्तांत पुस्तक ‘कश्मीर का अधूरा सफर (श्रीनगर और पहलगाम की सैर)’ का औपचारिक लोकार्पण रहा।

कार्यक्रम में साहित्य, भाषा, समाज और समकालीन चुनौतियों के बीच साहित्यकारों की भूमिका पर गंभीर विमर्श हुआ। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि बदलते सामाजिक परिवेश में साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने और संवाद स्थापित करने का सशक्त माध्यम है।

इस अवसर पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), वाराणसी के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. आफताब अहमद आफ़ाक़ी मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद आफताब अशरफ़ ने की, जबकि मंच संचालन प्रसिद्ध साहित्यकार अनवर आफ़ाक़ी ने किया।

  • अल-मंसूर ट्रस्ट, दरभंगा के तत्वावधान में साहित्यिक एवं वैचारिक गोष्ठी ‘गुफ़्तगू’ का सफल आयोजन।
  • प्रसिद्ध कथाकार डॉ. मुजीर अहमद आज़ाद की नई पुस्तक ‘कश्मीर का अधूरा सफर’ का हुआ लोकार्पण।
  • साहित्यकारों की समकालीन जिम्मेदारियों, उर्दू भाषा के संरक्षण और पढ़ने की संस्कृति पर हुआ गंभीर विमर्श।
  • बीएचयू के प्रो. आफताब अहमद आफ़ाक़ी ने उर्दू भाषा के संरक्षण और प्रकाशन गतिविधियों के विस्तार पर दिया जोर।
  • दरभंगा टाइम्स पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित पुस्तक की साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने की सराहना।

 

कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्यकार डॉ. एहसान आलम ने डॉ. मुजीर अहमद आज़ाद का विस्तृत परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डॉ. आज़ाद ने कविता, कहानी, आलोचना और पुस्तक समीक्षा जैसी विभिन्न विधाओं में उल्लेखनीय कार्य किया है। हाल के वर्षों में यात्रा-वृत्तांत लेखन के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। उनकी लेखनी में संवेदनशीलता, तथ्यात्मकता और साहित्यिक सौंदर्य का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि लेखक के दोनों यात्रा-वृत्तांत पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय रहे हैं और यह उनकी गहन अवलोकन क्षमता का प्रमाण है।

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अयूब रायीन ने अपने संबोधन में डॉ. मुजीर अहमद आज़ाद के साथ अपने पुराने संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें सदैव नई जगहों की यात्रा करने और विविध संस्कृतियों को निकट से देखने का शौक रहा है। यही कारण है कि उनके यात्रा-वृत्तांत केवल स्थानों का वर्णन नहीं करते, बल्कि वहां की संस्कृति, समाज, प्रकृति और मानवीय अनुभवों को भी जीवंत रूप में पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने दोनों पुस्तकों की सराहना करते हुए कहा कि यात्रा साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय है।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. मोहम्मद आफताब अशरफ़ ने उर्दू साहित्य में यात्रा-वृत्तांत की समृद्ध परंपरा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उर्दू साहित्य में धार्मिक यात्राओं से लेकर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्राओं तक अनेक उत्कृष्ट यात्रा-वृत्तांत लिखे गए हैं, जिन्होंने साहित्य को समृद्ध किया है। उन्होंने ‘कश्मीर का अधूरा सफर’ का विश्लेषण करते हुए इसे एक रोचक, ज्ञानवर्धक और प्रभावशाली कृति बताया। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक पाठकों को कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता, वहां के सामाजिक परिवेश और पर्यटन की उपयोगी जानकारी एक साथ उपलब्ध कराती है। उन्होंने लेखक को इस महत्वपूर्ण कृति के लिए शुभकामनाएं भी दीं।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए अनवर आफ़ाक़ी ने अपनी विशिष्ट शैली में कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। उन्होंने लेखक को इस यात्रा-वृत्तांत को आगे भी जारी रखते हुए कश्मीर के शेष हिस्सों पर विस्तृत लेखन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विविधता और पर्यटन की संभावनाएं इतनी व्यापक हैं कि उन पर और अधिक लेखन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे यात्रा-वृत्तांत पाठकों में पर्यटन के प्रति रुचि उत्पन्न करते हैं तथा उन्हें नए स्थानों को देखने और समझने की प्रेरणा देते हैं।

 

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मुख्य अतिथि प्रो. आफताब अहमद आफ़ाक़ी ने अपने विस्तृत संबोधन में दरभंगा टाइम्स पब्लिकेशंस की प्रकाशन सेवाओं की सराहना की। उन्होंने दो सौ से अधिक पुस्तकों के प्रकाशन को एक बड़ी साहित्यिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि क्षेत्रीय स्तर पर इस प्रकार का निरंतर प्रकाशन साहित्य के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने विशेष रूप से ‘कश्मीर का अधूरा सफर’ के प्रकाशन का स्वागत करते हुए कहा कि इस प्रकार की पुस्तकें साहित्य और पर्यटन दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

उन्होंने कहा कि उर्दू भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोनों स्तरों पर गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है। नई पीढ़ी को उर्दू भाषा के अध्ययन और साहित्य से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि युवाओं को भाषा और साहित्य से जोड़ा जाएगा, तभी इसकी समृद्ध परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकेगी।

प्रो. आफ़ाक़ी ने “साहित्यकारों की समकालीन जिम्मेदारियाँ” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि साहित्यकार का दायित्व केवल लेखन तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की बदलती परिस्थितियों, चुनौतियों और समस्याओं के साथ सार्थक संवाद स्थापित करना भी उसकी जिम्मेदारी है। साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है और यह तभी सार्थक होगा जब वह अपने समय की समस्याओं और संभावनाओं को ईमानदारी से अभिव्यक्त करे।

उन्होंने कहा कि आज पुस्तकों का प्रकाशन तो बढ़ रहा है, लेकिन पाठकों की घटती संख्या चिंता का विषय है। समाज में पढ़ने की संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए साहित्यकारों, शिक्षकों, प्रकाशकों और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर प्रयास करना होगा। उन्होंने इस प्रकार की साहित्यिक गोष्ठियों को अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा कि इनके माध्यम से साहित्य, भाषा और संस्कृति पर स्वस्थ संवाद की परंपरा मजबूत होती है।

प्रो. आफ़ाक़ी ने दरभंगा की साहित्यिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि दरभंगा, दबिस्तान-ए-अज़ीमाबाद की साहित्यिक परंपरा का महत्वपूर्ण विस्तार है। बिहार में साहित्यिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में दरभंगा की पहचान लंबे समय से रही है और यहां की साहित्यिक चेतना आज भी उतनी ही सशक्त है।

 

लोकार्पण समारोह के दौरान अल-मंसूर ट्रस्ट के सचिव डॉ. मंसूर खुश्तर ने पुस्तक के प्रकाशन की पूरी प्रक्रिया पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि डॉ. मुजीर अहमद आज़ाद के यात्रा-वृत्तांत पाठकों को केवल यात्रा का अनुभव नहीं कराते, बल्कि उन्हें पर्यटन के प्रति प्रेरित भी करते हैं। उनकी लेखनी में प्राकृतिक दृश्य, ऐतिहासिक स्थल, स्थानीय संस्कृति और सामाजिक जीवन का अत्यंत आकर्षक एवं जीवंत चित्रण मिलता है।

उन्होंने बताया कि लेखक का पहला यात्रा-वृत्तांत ‘दार्जिलिंग की सैर’ पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय रहा था। इस पुस्तक में साहित्यिक सौंदर्य के साथ-साथ यात्रा की व्यावहारिक जानकारी जैसे आवास, आवागमन, खर्च और प्रमुख पर्यटन स्थलों का विस्तृत विवरण भी दिया गया था, जिससे यह पुस्तक यात्रियों के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुई।

उन्होंने कहा कि इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब ‘कश्मीर का अधूरा सफर (श्रीनगर और पहलगाम की सैर)’ प्रकाशित किया गया है, जिसे दरभंगा टाइम्स पब्लिकेशंस ने प्रकाशित किया है। 48 पृष्ठों की यह पुस्तक आकार में भले ही संक्षिप्त हो, लेकिन इसमें अनुभव, संवेदनाएं, यात्रा विवरण और उपयोगी सूचनाओं का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया गया है। इसकी भाषा अत्यंत सरल, सहज और प्रभावशाली है, जिससे हर वर्ग का पाठक आसानी से जुड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि साहित्य और समाज के बीच संवाद को मजबूत बनाने के उद्देश्य से अल-मंसूर ट्रस्ट निरंतर साहित्यिक और बौद्धिक कार्यक्रम आयोजित करता रहा है और भविष्य में भी ऐसे आयोजन जारी रहेंगे।

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कार्यक्रम के अंत में डॉ. मंसूर खुश्तर ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, साहित्यकारों, शिक्षाविदों और उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि अल-मंसूर ट्रस्ट साहित्य, भाषा और संस्कृति के संरक्षण तथा समाज में बौद्धिक संवाद की परंपरा को मजबूत करने के लिए भविष्य में भी इसी प्रकार की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक गोष्ठियों का आयोजन करता रहेगा।

इस अवसर पर रियाज़ अख्तर शफ़ीक, प्रेमनाथ कुमार, जुनैद आलम अरवी, हामिद अंसारी, जमी़ल अहमद सहित शहर के अनेक साहित्यकार, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता एवं बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। पूरे कार्यक्रम का वातावरण साहित्यिक सौहार्द, वैचारिक संवाद और सांस्कृतिक गरिमा से परिपूर्ण रहा।

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