बिहार के दरभंगा से आई यह खबर उस सच्चाई को उजागर करती है, जो आज हजारों पढ़े-लिखे युवाओं की चुप पीड़ा बन चुकी है। लहेरियासराय थाना क्षेत्र के मदारपुर मोहल्ले में 26 वर्षीय MBA पास युवक ने अपने ही घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। वजह—तीन साल से नौकरी न मिलना और उससे उपजा गहरा मानसिक तनाव।

घर में पसरा मातम, मोहल्ले में सन्नाटा
मृतक की पहचान अभिषेक कुमार राय के रूप में हुई है। घटना के बाद पूरे मोहल्ले में शोक और सन्नाटे का माहौल है। कोई यह समझ नहीं पा रहा कि जिस युवक ने उच्च शिक्षा हासिल की, वही उम्मीद हारकर जिंदगी से इतना बड़ा कदम कैसे उठा गया।
पढ़ाई पूरी, लेकिन भविष्य अधूरा
अभिषेक के पिता रमन राय एक बैंक अधिकारी हैं। परिवार आर्थिक रूप से स्थिर था और अभिषेक पर किसी तरह का पारिवारिक दबाव भी नहीं था। इसके बावजूद नौकरी न मिलने का बोझ उसके मन पर लगातार भारी होता चला गया।
परिवार वालों के मुताबिक, अभिषेक ने MBA की पढ़ाई पूरी करने के बाद कई जगह आवेदन किए, इंटरव्यू भी दिए, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी। बीते तीन वर्षों से वह बेरोजगारी से जूझ रहा था।
छोटा भाई सरकारी नौकरी में, खुद टूटता चला गया
परिजनों का कहना है कि अभिषेक का छोटा भाई BPSC परीक्षा पास कर सरकारी शिक्षक बन चुका है। परिवार में खुशी का माहौल था, लेकिन इसी तुलना ने अभिषेक को भीतर-ही-भीतर तोड़ दिया।
उसके चाचा रामप्रीत राय बताते हैं,
“कोई उसे ताना नहीं देता था, लेकिन वह खुद ही खुद को कमजोर समझने लगा था। कहता था—MBA करके भी कुछ नहीं कर पाया।”
दूसरी मंजिल के कमरे में मिली खामोश मौत
अभिषेक घर की दूसरी मंजिल पर बने कमरे में अकेले रहता था। बीती रात जब वह देर तक खाना खाने नीचे नहीं आया और फोन भी नहीं उठा रहा था, तो परिजनों को अनहोनी की आशंका हुई।
जब वे ऊपर पहुंचे तो कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था। आवाज देने पर भी कोई जवाब नहीं मिला। दरवाजा तोड़ा गया तो अंदर का दृश्य देख सबकी सांसें थम गईं—अभिषेक का शव मफलर के सहारे पंखे से लटका हुआ था।
पुलिस जांच में जुटी
सूचना मिलते ही लहेरियासराय थाना पुलिस मौके पर पहुंची। शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।
थानाध्यक्ष अमित कुमार ने बताया,
“प्रथम दृष्टया मामला आत्महत्या का है। परिजनों ने किसी तरह के दबाव या विवाद की बात नहीं कही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।”
बेरोजगारी की चुप चीख
अभिषेक की मौत ने एक बार फिर बेरोजगारी और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पढ़ाई के बाद भी जब मेहनत का फल नहीं मिलता, तो कई युवा खुद को अकेला और असफल मानने लगते हैं।
मोहल्ले के लोगों का कहना है कि अभिषेक शांत स्वभाव का था, किसी से ज्यादा बात नहीं करता था। शायद भीतर ही भीतर वह उस लड़ाई को हार चुका था, जिसकी आवाज किसी ने सुनी ही नहीं।
एक सवाल, जो रह गया
आज परिवार सिर्फ बेटे को नहीं, बल्कि अपने सपनों को भी खो चुका है। मां की आंखें बेटे के कमरे की ओर टिकी हैं, जहां अब सिर्फ खामोशी बची है।
यह घटना एक सवाल छोड़ जाती है—
क्या डिग्री और काबिलियत ही काफी है, या सिस्टम की बेरुखी युवा सपनों को ऐसे ही निगलती रहेगी?
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