बदलाव का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं; सवाल यह है कि क्या हम ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो सिर्फ बोलना जानती है या ज़िम्मेदारी उठाना भी?

नीतीश प्रियदर्शी की विशेष रिपोर्ट। आज “जेन ज़ी” शब्द सुनते ही एक सवाल मन में उठता है—क्या यह सिर्फ एक पीढ़ी की पहचान है, या अब इसे हर तरह के गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार का बहाना बना दिया गया है?
हर पीढ़ी के अपने तौर-तरीके होते हैं और हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी से कुछ अलग होती है। लेकिन बदलाव का मतलब यह नहीं कि अनुशासन ही खत्म हो जाए, बदतमीज़ी को आधुनिकता और गैर-ज़िम्मेदारी को आज़ादी समझ लिया जाए।

सवाल जेन ज़ी (GenZ) होने का नहीं है। सवाल है—आपका चरित्र क्या है? आपके संस्कार क्या हैं? आपकी ज़िम्मेदारी क्या है? और देश के प्रति आपकी भूमिका क्या है?
हम भी कभी युवा थे
आज की पीढ़ी को शायद लगता है कि उससे पहले के युवाओं के पास न सवाल थे, न सपने, न व्यवस्था से असहमति और न ही बदलाव की चाह। ऐसा बिल्कुल नहीं है।

हमने भी सरकारों पर सवाल उठाए हैं, व्यवस्था की आलोचना की है और बेहतर शिक्षा, रोज़गार व विकास की मांग की है। फ़र्क सिर्फ इतना था कि हर बात को कैमरे के सामने रिकॉर्ड करके दुनिया को दिखाना ज़रूरी नहीं समझा जाता था।

आज एक मोबाइल कैमरा, कुछ सेकंड की रील और कुछ हज़ार व्यूज (Views) किसी इंसान को यह भ्रम दे सकते हैं कि उसकी आवाज़ ही अंतिम सच है। लेकिन याद रखिए:
- व्यूज (Views) किसी बात का प्रमाण नहीं हैं।
- फॉलोअर्स(Followers) चरित्र का प्रमाण नहीं हैं।
- वायरल (Viral) होना बुद्धिमत्ता का सबूत नहीं है।
- आवाज़ का तेज़ होना सही होने का प्रमाण बिल्कुल नहीं है।

हर मुद्दा ‘कंटेंट'(Content) नहीं होता
आज शिक्षा पर बात हो तो रील, बेरोज़गारी पर बात हो तो रील, राजनीति या किसी सामाजिक मुद्दे पर बात हो तो रील।

किसी गंभीर विवाद पर भी सबसे पहला सवाल यही होता है—“इससे कितने व्यूज आएंगे?”
यहीं से समस्या शुरू होती है। समाज के गंभीर मुद्दे मनोरंजन की सामग्री नहीं हैं:
- शिक्षा सुधार सिर्फ एक हैशटैग नहीं है।
- बेरोज़गारी सिर्फ एक ट्रेंडिंग(Trending) टॉपिक नहीं है।
- किसान, मज़दूर, सैनिक, छात्र और आम नागरिक की समस्याएं किसी क्रिएटर की एंगेजमेंट रणनीति नहीं हैं।
समस्या पर बोलना अच्छी बात है, समस्या को समझना उससे बड़ी बात है, और उसका समाधान देना सबसे बड़ी बात है।

अभिभावकों (माता-पिता) से भी सवाल होना चाहिए ?
हम सिर्फ बच्चों को दोष देकर बच नहीं सकते। जिस बच्चे को बचपन से हर गलती पर कहा गया—“कोई बात नहीं,” “बच्चा है,” “जो करना है करने दो,” “लोग क्या कहेंगे उसकी चिंता मत करो”—वह बच्चा बड़ा होकर ज़िम्मेदारी का मतलब कैसे समझेगा ?

माता-पिता सिर्फ जन्म देने से माता-पिता नहीं बन जाते। परवरिश का मतलब सिर्फ खाना, कपड़े, स्कूल और मोबाइल देना नहीं है। परवरिश का असली मतलब है:
- उसे “ना” सुनना सिखाना।
- उसे अपनी गलती स्वीकार करना सिखाना।
- उसे बड़ों का आदर और छोटों के प्रति संवेदनशीलता सिखाना।
- उसे समझाना कि अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जुड़े होते हैं।
- और सबसे ज़रूरी—उसे यह समझाना कि पूरी दुनिया उसके इर्द-गिर्द नहीं घूमती।
अगर माता-पिता बच्चे की हर गलती पर पर्दा डालते रहेंगे, तो वही बच्चा आगे चलकर वास्तविक दुनिया में अपनी गलतियों की भारी कीमत खुद भी चुकाएगा और दूसरों को भी चुकवाएगा।

आज़ादी का मतलब मनमानी नहीं है
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) लोकतंत्र की ताकत है। सरकार से सवाल पूछिए, नीतियों की आलोचना कीजिए, व्यवस्था की कमियां उजागर कीजिए और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाइए।

लेकिन यह मत भूलिए कि आपकी आज़ादी वहीं खत्म होती है, जहाँ से दूसरे व्यक्ति के अधिकार शुरू होते हैं।
- बोलने की आज़ादी का मतलब ज़िम्मेदारी से मुक्ति नहीं है।
- आपको बोलने का हक है, तो दूसरे को आपसे असहमत होने का भी हक है।
- आपको अपनी राय रखने का अधिकार है, तो दूसरे को आपकी राय को गलत कहने का भी अधिकार है।
- लोकतंत्र सिर्फ बोलने की आज़ादी नहीं, बल्कि असहमति को सहन करने का धैर्य भी है।
सबसे खतरनाक बात है—आलोचना से नफ़रत। यदि कोई युवा सरकार की आलोचना करता है, तो उसे देशद्रोही कहना गलत है। लेकिन यदि कोई युवा सरकार की आलोचना करने वाले हर व्यक्ति को शत्रु मान लेता है, तो यह भी लोकतांत्रिक सोच नहीं है। इसी तरह यदि कोई सरकार के समर्थन में है, तो उसे आंख मूंदकर कोई लेबल दे देना भी गलत है।
देश किसी एक विचारधारा, पार्टी या पीढ़ी की जागीर नहीं है। देश हम सबका है, इसलिए सवाल करने का अधिकार और ज़िम्मेदारी भी हम सबकी है।

पूरी जेन ज़ी (GenZ) खराब नहीं है
पूरी जेन ज़ी को एक ही तराजू में तौलना समझदारी नहीं होगी। इसी पीढ़ी में:
- मेधावी छात्र और छात्राएं हैं।
- नए उद्यमी (Entrepreneurs) और भविष्य के वैज्ञानिक हैं।
- सेना में भर्ती होने का जज़्बा रखने वाले नौजवान हैं।
- किसानों के वे बेटे-बेटियां हैं जो नई तकनीक से खेती को बदलना चाहते हैं।
- ऐसे युवा हैं जो नए स्टार्टअप्स बना रहे हैं, रिसर्च कर रहे हैं और विश्व पटल पर भारत का मान बढ़ा रहे हैं।

इसलिए समस्या पूरी पीढ़ी से नहीं, उस मानसिकता से है जहाँ वायरल होना उपलब्धि बन जाता है, विवाद साहस लगने लगता है, फॉलोअर्स को प्रभाव मान लिया जाता है और अज्ञानता को राय का नाम दे दिया जाता है।

देश रील से नहीं बनता
यह बात शायद कड़वी लगे, लेकिन देश सिर्फ हैशटैग, सोशल मीडिया के आक्रोश या सतही टिप्पणियों से नहीं बदलता। देश के निर्माण के लिए चाहिए:
- शिक्षा और अनुशासन
- कड़ा परिश्रम और ईमानदारी
- कौशल (Skills) और ज़िम्मेदारी
- दृढ़ चरित्र
जो युवा आज व्यवस्था बदलने की बात कर रहा है, उससे सीधा सवाल है—कल जब व्यवस्था की बागडोर तुम्हारे हाथ में होगी, तब तुम क्या बदलोगे? सिर्फ रील बनाओगे, या ज़मीन पर कुछ बनाकर दिखाओगे?

हमने जब बदलाव की मांग की थी, तो मकसद सिर्फ सत्ता बदलना नहीं था। हम चाहते थे कि आने वाली पीढ़ी को बेहतर शिक्षा, सुरक्षित समाज, रोज़गार और असीम अवसर मिलें। लेकिन कभी-कभी लगता है कि जिस भविष्य की हमने कल्पना की थी, उसका एक हिस्सा व्यवस्था को समझने से पहले उसे केवल ‘कंटेंट’ समझ रहा है। इसका हल नई पीढ़ी से नफ़रत करना नहीं, बल्कि उसे ज़िम्मेदारी का अहसास कराना है।
अभिभावकों की सक्रिय भूमिका
यदि आपका बच्चा दिन-रात मोबाइल में लगा है, तो सिर्फ यह मत देखिए कि वह क्या देख रहा है; यह परखिए कि:
- वह क्या सीख रहा है और किससे प्रभावित हो रहा है?
- वह किस तरह के विचारों और लोगों को अपना आदर्श मान रहा है?
- उसकी भाषा और व्यवहार कैसा है?
- क्या वह असल ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियां उठाने के लिए तैयार हो रहा है?
बच्चे को केवल इंटरनेट थमा देना आधुनिक परवरिश नहीं है। सही और गलत का अंतर समझाना ही सच्ची परवरिश है।
- सवाल पूछो, लेकिन पहले पढ़कर और समझकर पूछो।
- विरोध करो, लेकिन तथ्यों और तर्कों के साथ करो।
- सरकार से जवाब मांगो, लेकिन साथ में समाधान भी सुझाओ।
- सिस्टम बदलने की बात करो, लेकिन पहले खुद एक ज़िम्मेदार नागरिक बनो।
- आज़ादी की मांग करो, लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी भी स्वीकार करो।
- तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करो, लेकिन तकनीक को अपनी सोच का मालिक मत बनने दो।
- और अगर तुम्हें लगता है कि पिछली पीढ़ी गलत थी, तो सिर्फ उसे गलत ठहराने के बजाय उससे बेहतर करके दिखाओ। यही सबसे बड़ा जवाब होगा।
कल जब यही पीढ़ी देश के संस्थानों, कंपनियों, स्कूलों, अस्पतालों, अदालतों, प्रशासन और राजनीति को संभालेगी, तब सवाल यह नहीं होगा कि वे कितने वायरल थे।
सवाल यह होगा:
- क्या वे भरोसे के लायक थे?
- क्या उनमें सही निर्णय लेने की क्षमता थी?
- क्या उनमें असहमति सुनने का धैर्य था?
- क्या उनमें अधिकारों के साथ कर्तव्यों को निभाने का साहस था?
- क्या गलती होने पर उसे स्वीकार करने का चरित्र था?
- क्या उन्होंने सिर्फ आलोचना की, या कुछ ठोस निर्माण भी किया?
- और क्या उन्होंने देश का अपने लिए इस्तेमाल किया, या खुद को देश के लिए उपयोगी बनाया?
जेन ज़ी (GenZ) कोई विरोधी नहीं है, लेकिन इसके नाम पर गैर-ज़िम्मेदारी को बढ़ावा देना भी सही नहीं है। उम्र किसी को महान नहीं बनाती, चरित्र बनाता है। फॉलोअर्स किसी को प्रभावशाली नहीं बनाते, काम बनाता है। वायरल होना किसी को सक्षम नहीं बनाता, क्षमता बनाती है। और आज़ादी किसी को महान नहीं बनाती, उस आज़ादी का ज़िम्मेदारी से उपयोग करना इंसान को महान बनाता है।
सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो सिर्फ बोलना जानती है, या ऐसी पीढ़ी जो ज़िम्मेदारी उठाना भी जानती है? आने वाला भारत सिर्फ बातों से नहीं, बल्कि इस बात से बनेगा कि हमारे बाद आने वाली पीढ़ी ज़मीन पर क्या काम करती है।

नई पीढ़ी के सामने स्पष्ट चुनौती:
1. अध्ययन करें: सवाल पूछें, लेकिन पर्याप्त अध्ययन और तथ्यों के साथ।
2. समाधान दें: नीतियों की आलोचना करें, लेकिन व्यावहारिक विकल्प भी सुझाएं।
3. ज़िम्मेदारी लें: व्यवस्था बदलने की बात करने से पहले स्वयं एक ज़िम्मेदार नागरिक बनें।
4. श्रेष्ठ साबित हों: पिछली पीढ़ी को केवल गलत ठहराने के बजाय अपने काम से बेहतर करके दिखाएं।
अंतिम मूल्यांकन
कल जब यही पीढ़ी देश की न्यायपालिका, प्रशासन, संसद, अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों की बागडोर संभालेगी, तब मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होगा कि वे इंटरनेट पर कितने लोकप्रिय थे।
मूल्यांकन इस बात से होगा कि क्या उनमें ठोस निर्णय लेने की क्षमता, असहमति को सुनने का धैर्य, गलतियों को स्वीकारने की ईमानदारी और देश के लिए उपयोगी बनने का जज़्बा था या नहीं। आने वाले भारत का भविष्य खोखले नारों से नहीं, बल्कि ज़मीनी ज़िम्मेदारी और निर्माण से तय होगा।
आने वाला भारत केवल हमारी बातों से नहीं बनेगा।
वह इस बात से बनेगा कि आने वाली पीढ़ी अपने हाथों में मिली आजादी, तकनीक और अवसरों का इस्तेमाल किस तरह करती है।
और शायद यही आज की सबसे जरूरी बहस है।

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