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दुर्गापूजा :: मिथिला के ठाढ़ी में पाल टांगने की व्यवस्था, महिलाओं हेतु लाभकारी

डेस्क : मिथिला क्षेत्र बिहार का ही नहीं सम्पूर्ण भारतवर्ष का सांस्कृतिक एवम् वैचारिक केन्द्र रहा है । संस्कृत, संस्कृति एवं दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में इस भूभाग की अप्रतिम देन रही है । विभिन्न दर्शन शास्त्रों के मर्म को जानकर, मर्मज्ञता हासिल कर, उनपर भाष्य टीका लिखने जैसे सारस्वत साहित्यिक अनुष्ठान यहां की शाश्वत् प्रवृत्ति रही है । उसी महान भूखण्ड मिथिला का यह विद्या-व्यसनी ग्राम अंधराठाढ़ी (जिला मधुबनी) विद्या, तपस्या, साधन के लिये मिथिलांचल ही नहीं, पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है । यह ग्राम अपने यशस्वी, कर्त्तव्यपरायणता से लवालब भरे सपूतों के कारण सर्वाधिक प्रसिद्ध गांवों में हैं। 
विद्वत परंपरा के ध्वजवाहक ग्राम की कुछ परंपरा भी दूरदर्शिता पूर्ण हो तथा दशकों से चली आ रही परंपरा की सार्थकता आज के युग में भी हो, ऐसा होना लाजिमी है । इन्हीं परम्पराओं में से एक है – दुर्गापूजा के दौरान ढलती शाम के साथ काली चादरों से सजना प्रारम्भ करती रात रानी की प्रथम यौवन वेला जिसे गोधुलि वेला कहते हैं, यहां से दुर्गास्थान के भव्य प्रांगण में सांस्कृतिक कार्यक्रम की सुरमयी प्रारम्भ की वेला तक पाल (पर्दा) दुर्गा मण्डप पर टांग दी जाती है तथा दुर्गास्थान के मेला बाजार को सिर्फ महिला वर्ग के लिये उपयोग हेतु सुरक्षित घोषित कर दी जाती है । यह अमूनन तीन-चार घण्टे का पर्दा व्यवस्था है जिससे पाल व्यवस्था कहते हैं क्योंकि उद्देश्य महिलावर्ग को पुरूष वर्ग की नजरों से दूर रखना है ।

ऐतिहासिक तथ्य :-
इसे पाल व्यवस्था कहें या पर्दा व्यवस्था यह सदियों से खासकर मध्ययुगीन काल से प्रमुखता पाया है । कमोवेश अधिकांश धार्मिक समुदायों हिन्दु, मुस्लिम व अन्य में जगह पाया है। कारण बहुत सारे हो सकते हैं, परन्तु मेरे विचार से सर्वप्रमुख कारण रहा है – महिला वर्ग की कोमल भावना, संकोचशील स्वभाव को पुरूष वर्ग की उष्ण नजरों से सुरक्षा देना जो अंततः महिलाओं के हितों की ही रक्षा करने में समर्थ रहा है। यही कारण है कि किसी न किसी प्रकार का पर्दा, चाहे वह मिथिलांचल की हिन्दू महिलाओं में घूंघट हो, मुस्लिम महिलाओं में बुर्का हो, या फिर घरों में पर्दे लगे हों, आज भी कमोवेश बदस्तूर है। इसी सामाजिक प्रयोजन के परिप्रेक्ष्य में मेरा मत है कि दुर्गा स्थान का पाल व्यवस्था आज के युग में भी प्रासंगिक व उपयोगी है ।
अब मैं उपर्युक्त प्रयोजन के अतिरिक्त कुछ और भूमिकाओं के बारे में, अपने प्रशासनिक व जीवन अनुभव के आधार पर उल्लेख करना चाहता हूं जो इस प्रकार हैं :-
(क) यह पाल व्यवस्था महिलाओं को सशक्त करती है :-
क्योंकि गा्रम्य-परिवेश की कई बच्चियां, युवतियां, नव-विवाहिता व घूंघटनशी महिलायें पुरूषों को सामने पाकर, श्रद्धा व संकोच वश मन एकाग्र कर न तो दुर्गा मंदिर में पूजा कर पाती हैं, न ही सहेलियों से निश्चिंत भाव से गप्प लड़ा पाती, न हंसी ठिठोली कर पाती और न ही निज-अंग-वस्त्र व श्रृंगार सामाग्री खरीद पाती हैं । परन्तु पाल व्यवस्था इन्हें निश्चिंतता का माहौल बनाकर इन्हें ये सारी आजादी देती है।
(ख) पाल व्यवस्था के तहत पुरूषों का निषेध महिला वर्ग की सुरक्षा की कवच प्रदान करता हैः-
इतिहास गवाह है कि महिला वर्ग के विरूद्ध अधिकतम अपराध पुरूष वर्ग द्वारा किया जाता है । इस सार्थक व्यवस्था, महिलाओं को पुरूष वर्ग से दूर रखकर सुरक्षा प्रदान करने में समर्थ है। यही कारण है कि ठाढ़ी ग्राम में दुर्गापूजा के दौरान इतनी भीड़ होने के बावजूद महिला के विरूद्ध कोई बड़ी घटना आज तक नहीं घटी है ।
(ग) महिलाओं द्वारा अधिक संख्या में मेला आकर वित्तीय संव्यवहार करने से अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव :-
मेला में इस सुरक्षात्मक माहौल के कारण बड़ी संख्या में महिलाओं का शामिल होना तथा इनके द्वारा विभिन्न वस्तुओं यथा – चूड़ी, सिंदूर, टिकली, अन्य श्रृंगार के सामान के क्रय से वित्तीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
(घ) पुरूष वर्ग का महिला वर्ग के प्रति सुरक्षा भावना का प्रदर्शन :-
ठाढ़ी दुर्गा स्थान में मेला के दौरान महिलाओं को सुरक्षा की कवच किसी पुलिस बल के द्वारा नहीं अपितु गांव के युवा वर्ग (पुरूष वर्ग) के द्वारा ही प्रदान की जाती है । जो रेखांकित करता है कि गांव के पुरूष वर्ग महिलाओं की सुरक्षा का कितना खयाल रखते हैं । यह अनुकरणीय है ।
(ड) पुरूष वर्ग का महिला वर्ग के प्रति सहअस्तित्व व सहयोग की भावना का प्रदर्शन :-
तीन-चार घण्टे की पाल व्यवस्था में महिला वर्ग को गांव के युवा वर्ग के द्वारा ही सुरक्षा का माहौल प्रदान की जाती है । इस आशय के साथ कि बच्चियों, युवतियों, महिलाओं को निश्चिंत माहौल में बिना किसी तनाव के पूजा अर्चना व एक दूसरे से मिलने-जुलने का सौहार्दपूर्ण माहौल मिल सके । यह महिला के प्रति सहअस्तित्व व सहयोग की भावना का प्रदर्शन है ।

-: लेखक :-
शंकर झा
एम.एस.सी. (कृषि अर्थशास्त्र), एल.एल.बी.
{छ.ग. राज्य वित्त सेवा}
नियंत्रक (वित्त)
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

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