बिहार :: दिखने लगा आसार, बैाद्ध सर्कीट पस्टन मुसहरनिया डीह के दिन बहुरने का ।

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मधुबनी/अंधराठाढी:- शिनाख्त मिटने के कागार पर पहुच चुके पस्टन गांव के मुसहरनिया डीह का दिन बहुरने का आसार दिखने लगा है।बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के निदेशक ने मार्फत पत्र जारी कर जिला पदाधिकारी मधुबनी को टीले की इंट एवं अन्य सामाग्रियो के सहेजने का निर्देश दिया है। मुशहरनिया डीह को सुरक्षित स्मारक घोषित करने के पहल को लेकर यहां के लोगों में खुशी की लहर हैं। अंधराठाढी प्रखंड मुख्यालय से महज चार किलोमीटर की दूरी पर नवटोली पस्टन गांव है।इस गांव के मुशहरनियाॅ डीह पर में बौद्ध बिहार होने के साक्ष्य हैं। दो बडे बडे टीले के अलावे चार छोटे छोटे टीले है। आज भी हल और कुदाल चलते समय इर्द गिर्द बुद्ध आदि की छोटी छोटी मूर्तियां और उपयोग में आने वाली मिटटी के बर्तन आदि मिलती रहती है।कुछ मूर्तियां स्थानीय वाचस्पति संग्रहालय में रखी हुयी है। बौद्ध बिहार की जमीन और टीलें अतिक्रमित हो कर खेत बनते जा रहे है। सुरक्षा और रखरखाव नहीं होने के कारण भग्नावशेष लुप्त होने के कागार पर है।उत्खनन के बाद हीं तत्कालीन समाज और समानो के इतिहास पर सही प्रकाश डाला जा सकता है। भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन बिहार सर्कील के हेड डाॅ पी के झा ने भी पस्टन का सवेक्षण किया था। उनके अनुसार यहाॅ कभी बौद्ध बिहार रहने की बात कही है।इतिहास वताता है कि चीनी और तिब्बत से आने वाले और भारत से तिब्बत एवं चीन जाने बाले यात्रियो का पडाव इस बौद्ध बिहार में होता था।भग्नावशेष बौद्ध बिहार परिसर में बौद्ध साधुओ के ठहरने मठ ,पेय जल के लिये कुअॅा और स्नान करने के लिये पोखर एवं घाट के चिन्ह आज भी विद्यमान दिखते है। एक प्रसिद्ध चीनी यात्री रचित बौद्ध साहित्य में बिहार के पट्टन गांव की चर्चा है। पस्टन का भैागोलिक स्थिति और आश पास के गांव आदि इसी पस्टन गांव से मिलता जुलता है।उस साहित्य में वर्णित इस गांव से जनकपुर की दूरी हू ब हू मिलती है।सामाजिक रीति रिवाज खान पान आदि भी इस पस्टन गंाव से मेल खाता है। विद्वानो का मानना है कि ही पट्टन ही कालान्तर में अपभ्रशित होकर पस्टन हो गया है।कुछ लोगो का मानना है कि पस्टन नवटोली गांव में मौजूद टीले कर्णट बंशीय राजा हरिसिंह देव के राज महल का भग्नावशेष है।यहां उनके नाम पर हरिसिंहदेव संस्कृत मध्य और उच्च विद्यालय है।प्रसिद्ध पुस्तक मिथिला विमर्श तत्व में भी इसकी प्रमुखता से चर्चा की गयी है।अधिकांश विद्वान टीले को बौध बिहार हीं माना है। अंधराठाढी कर्णट वंशीय राजा नान्यदेव की राजधानी थी।इसवंश की राजाओ की राजमहल का पस्टन नवटोली में रहने का कोई औचित्य नहीं है।सहीं है कि मिथिला में पंजी प्रथा का प्रार्दुभाव का कनेक्सन मुक्तेश्वर स्थान देवहार ,पस्टन नवटोली और राजा हरिसिह देव के साथ था। तत्कालीन राज्य मंत्री स्व रामफल चैधरी ने अपने समय में मुसहनिया डीह,कमलादित्य स्थान, वलिराज गढ की खुदाई की योजना स्वीकृत करवाई थी।कमोवेश कहीं कहीं खुदाई भी हुयी । किन्तु पुरी नहीं की जा सकी सतर्कता विभाग से सेवानिवृत डीएसपी इन्द्र नारायण झा ने मिथिला दिगदर्शन में भी पस्टन मुशहरनिया डीह को बौद्ध मठ ही माना है।पुरातत्व विद पंडित सहदेव झा पस्टन मुशहरनिया डीह केा बौद्ध भिक्षुओ के रूकने के जगह माने है।बौद्ध धर्मावलंवियो यहां अध्ययन करने आते थे।मैजूदा समय में इस भूखंड पर हरिसिंह देव संस्कृत मध्यविद्यालय एवं संस्कृत उच्च विद्यालय के अलावे डाॅ जगन्नाथ मिश्र संस्कृत महाविद्यालय अवस्थित है।