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फर्जी डॉक्टर का जाल: ‘कार्डियो फाउंडेशन’ के नाम पर चल रहा था बड़ा नेटवर्क

लखनऊ में केजीएमयू से पकड़े गए कथित फर्जी डॉक्टर हस्साम के मामले ने अब एक बड़े संगठित नेटवर्क का रूप ले लिया है। जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे नए चौंकाने वाले खुलासे सामने आ रहे हैं। शुरुआती तौर पर यह मामला एक व्यक्ति की धोखाधड़ी का लग रहा था, लेकिन अब इसमें कई डॉक्टरों, अस्पतालों और बिचौलियों की संलिप्तता के संकेत मिल रहे हैं।

पुलिस और खुफिया एजेंसियों की जांच में सामने आया है कि हस्साम ‘कार्डियो फाउंडेशन’ नाम की एक संस्था चलाता था। यह संस्था देखने में सामाजिक सेवा और स्वास्थ्य जागरूकता से जुड़ी लगती थी, लेकिन इसके पीछे एक सुनियोजित नेटवर्क काम कर रहा था। इस संस्था को कई निजी डॉक्टरों और अस्पतालों से फंडिंग मिलती थी, जिससे इसके कार्यक्रमों और गतिविधियों को अंजाम दिया जाता था।

बताया जा रहा है कि इस फाउंडेशन के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों, खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में स्वास्थ्य शिविर लगाए जाते थे। इन शिविरों में लोगों को मुफ्त जांच और इलाज का लालच दिया जाता था। लेकिन जांच में यह बात सामने आई है कि इन शिविरों का असली मकसद मरीजों को अपने नेटवर्क में फंसाना था।

इस पूरे नेटवर्क में बिचौलियों की भूमिका बेहद अहम थी। ये लोग पहले इलाके में ऐसे मरीजों की पहचान करते थे, जो आर्थिक रूप से कमजोर हों या जिन्हें गंभीर बीमारी का डर दिखाया जा सके। इसके बाद उन्हें स्वास्थ्य शिविरों में लाया जाता और वहां से उन्हें नेटवर्क से जुड़े अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता था।

मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के बदले इन बिचौलियों को कमीशन मिलता था। इस तरह यह पूरा सिस्टम एक कमाई के साधन के रूप में काम कर रहा था। मरीजों की मजबूरी और जानकारी की कमी का फायदा उठाकर उन्हें ऐसे अस्पतालों में भर्ती कराया जाता, जहां से इस नेटवर्क को आर्थिक लाभ होता था।

जांच एजेंसियों के अनुसार, इस मामले में चार संदिग्ध डॉक्टरों की पहचान की गई है, जो इस नेटवर्क से जुड़े हो सकते हैं। फिलहाल उनके खिलाफ साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि जैसे ही पर्याप्त सबूत मिलेंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, जिसमें गिरफ्तारी भी शामिल हो सकती है।

इस नेटवर्क का विस्तार सिर्फ लखनऊ तक सीमित नहीं था। जांच में यह भी सामने आया है कि यह गाजियाबाद, मेरठ और आसपास के अन्य जिलों तक फैला हुआ था। हर जिले में हस्साम के लोग तैनात थे, जो स्थानीय स्तर पर इस नेटवर्क को संचालित करते थे। इनकी जिम्मेदारी मरीजों को ढूंढना, उन्हें समझाना और फिर अस्पतालों तक पहुंचाना होती थी।

हस्साम ने अपने नेटवर्क को मजबूत और संगठित बनाए रखने के लिए आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया। उसने व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए अपने सहयोगियों को एक साथ जोड़े रखा था। इसी प्लेटफॉर्म के जरिए वह निर्देश देता था, जानकारी साझा करता था और पैसों के लेनदेन का हिसाब-किताब रखता था।

पुलिस अब इस पूरे मामले में आर्थिक लेनदेन की जांच कर रही है। हस्साम और उसके सहयोगियों के बैंक खातों को खंगाला जा रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस नेटवर्क के जरिए कितनी रकम का लेनदेन हुआ। इसके अलावा, कुछ संदिग्ध डॉक्टरों और एक टेक्नीशियन की तलाश भी जारी है, जो फिलहाल फरार हैं और अपने मोबाइल फोन बंद कर चुके हैं।

हस्साम सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय था। वह खुद को एक प्रभावशाली और समाजसेवी व्यक्ति के रूप में पेश करता था, जिससे लोगों का भरोसा जीत सके। सोशल मीडिया के जरिए वह अपनी संस्था और गतिविधियों का प्रचार करता था, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उसके संपर्क में आ सकें। अब पुलिस उसके ऑनलाइन नेटवर्क की भी जांच कर रही है।

यह मामला स्वास्थ्य क्षेत्र में पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अगर इसमें डॉक्टरों और अस्पतालों की संलिप्तता साबित होती है, तो यह बेहद गंभीर मामला होगा। इससे आम लोगों का भरोसा चिकित्सा व्यवस्था पर कमजोर हो सकता है।

फिलहाल पुलिस और खुफिया एजेंसियां इस पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह एक बड़े स्तर का संगठित फर्जीवाड़ा हो सकता है, जिसमें और भी कई लोग शामिल हो सकते हैं। आने वाले समय में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना है।

यह घटना आम लोगों के लिए एक चेतावनी भी है कि किसी भी संस्था या स्वास्थ्य सेवा पर आंख मूंदकर भरोसा न करें। साथ ही प्रशासन के लिए भी यह जरूरी हो जाता है कि ऐसे मामलों में सख्ती बरती जाए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।

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