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कटरिया कांड से बिगड़े समीकरण, सपा अब संभालने में जुटी

गाजीपुर में कटरिया प्रकरण के बाद बदलते राजनीतिक हालात ने समाजवादी पार्टी (सपा) को नई चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के नारे के साथ आगामी विधानसभा चुनाव में मजबूती से उतरने की तैयारी कर रही सपा को इस घटनाक्रम ने बैकफुट पर ला दिया है। पार्टी जिस सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश कर रही थी, उसी में दरार पड़ती नजर आ रही है। ऐसे में अब सपा नेतृत्व पूरी स्थिति को संतुलित करने के प्रयास में जुट गया है।

इसी कड़ी में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष Akhilesh Yadav का 29 अप्रैल को गाजीपुर दौरा बेहद अहम माना जा रहा है। यह दौरा सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हालिया घटनाओं से पैदा हुए असंतोष को कम करने और पार्टी की छवि को सुधारने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व को उम्मीद है कि इस दौरे से कार्यकर्ताओं में ऊर्जा आएगी और विभिन्न वर्गों के बीच संवाद स्थापित करने में मदद मिलेगी।

कटरिया प्रकरण की शुरुआत 15 अप्रैल को हुई, जब एक किशोरी का शव गंगा नदी में मिला। यह घटना पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई। मृतका विश्वकर्मा समाज से थी, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया। परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया और हरिओम पांडेय नामक युवक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

जांच के दौरान कॉल डिटेल में यह बात सामने आई कि मृतका और आरोपी के बीच आपसी संबंध थे। वहीं पोस्टमार्टम रिपोर्ट में न तो किसी तरह के बाहरी चोट के निशान पाए गए और न ही दुष्कर्म की पुष्टि हुई। इसके बावजूद सपा के प्रदेश स्तर से जारी एक पत्र में इस घटना को दुष्कर्म के बाद हत्या बताया गया। इस बयान के सामने आते ही गांव में माहौल तनावपूर्ण हो गया और लोगों में आक्रोश फैल गया।

सपा ने इस मामले को गंभीर अपराध बताते हुए शुरुआत से ही आक्रामक रुख अपनाया। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन किया और इस घटना को कानून-व्यवस्था की विफलता के रूप में प्रस्तुत किया। इसके बाद 22 अप्रैल को सपा का एक प्रतिनिधिमंडल पीड़ित परिवार से मिलने गांव पहुंचा।

हालांकि प्रशासन ने केवल 15 लोगों को ही अनुमति दी थी, लेकिन मौके पर 200 से अधिक लोग पहुंच गए। इस कारण स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई और सपा समर्थकों तथा स्थानीय लोगों के बीच विवाद हो गया। देखते ही देखते यह विवाद हिंसक झड़प में बदल गया और दोनों पक्षों के बीच पथराव शुरू हो गया। इस घटना में कई लोग घायल हो गए, जिनमें पुलिसकर्मी और सपा के कुछ नेता भी शामिल थे।

घटना के बाद पुलिस ने सख्त रुख अपनाते हुए सपा के दो विधायकों—जै किशन साहू और वीरेंद्र यादव—सहित कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। जिलाध्यक्ष गोपाल यादव समेत 46 नामजद और 200 अज्ञात लोगों पर गंभीर धाराओं में मुकदमा कायम किया गया। अब तक 16 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है।

इस पूरे घटनाक्रम का असर सपा की छवि पर साफ दिखाई दे रहा है। पार्टी ने सहानुभूति की राजनीति के जरिए पिछड़े वर्गों को साधने की कोशिश की थी, लेकिन इसके चलते अन्य वर्गों में असंतोष पनप गया है। खासतौर पर हरिओम पांडेय की गिरफ्तारी को लेकर एक वर्ग में नाराजगी देखी जा रही है, जिससे सामाजिक संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है।

सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं और दावे किए जा रहे हैं, जिससे भ्रम की स्थिति और बढ़ गई है। इसने राजनीतिक माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। ऐसे में सपा के लिए हालात को नियंत्रित करना और भी कठिन हो गया है।

सपा के प्रतिनिधिमंडल की संरचना को लेकर भी सवाल उठे हैं। खासकर ब्राह्मण समाज के प्रमुख नेताओं की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी हुई है। इससे यह संदेश गया कि पार्टी एक खास वर्ग पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रही है, जिससे अन्य वर्गों में दूरी बढ़ सकती है।

इस बीच भाजपा ने भी इस मुद्दे को लेकर सपा पर निशाना साधा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता Kalraj Mishra ने सपा और कांग्रेस पर माहौल खराब करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि विपक्ष इस तरह के मामलों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहा है।

सरकार की ओर से भी इस मामले में सक्रियता दिखाई गई है। पिछड़े वर्ग से जुड़े इस प्रकरण को देखते हुए मंत्री ओमप्रकाश राजभर को आगे किया गया। इसके अलावा विश्वकर्मा समाज के नेताओं को भी सामने लाकर पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं, ताकि स्थिति को शांत किया जा सके।

अगर गाजीपुर के राजनीतिक समीकरणों पर नजर डालें तो यहां सपा की स्थिति अब तक मजबूत रही है। पिछली विधानसभा में पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि भाजपा को कोई सफलता नहीं मिली थी। हालांकि, बदलते हालात में यह समीकरण बदल सकते हैं।

भाजपा और सुभासपा के संभावित गठबंधन से आगामी चुनावों में मुकाबला कड़ा होने के संकेत मिल रहे हैं। 2017 में भाजपा-सुभासपा गठबंधन को बढ़त मिली थी, जबकि 2022 में सपा-सुभासपा गठबंधन ने बेहतर प्रदर्शन किया था। अब कटरिया प्रकरण के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल अपनी रणनीति में क्या बदलाव करते हैं।

फिलहाल सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस पूरे मामले से हुए नुकसान की भरपाई कैसे करे। ऐसे में अखिलेश यादव का गाजीपुर दौरा एक अहम कदम माना जा रहा है। यह दौरा न केवल पार्टी के लिए, बल्कि जिले की राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि सपा इस डैमेज कंट्रोल में कितनी सफल हो पाती है।

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