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पश्चिम एशिया संकट का असर: वैश्विक उथल-पुथल से भारत के निर्यात पर दबाव, 8% तक गिरावट की आशंका

पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने अब वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोरना शुरू कर दिया है और इसका सीधा असर भारत के व्यापार पर भी दिखाई देने लगा है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि देश के वस्तु निर्यात में मार्च महीने के दौरान 7 से 8 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई, तो वित्त वर्ष 2025-26 में भी निर्यात में 2 से 3 प्रतिशत तक कमी देखने को मिल सकती है।

यह चिंता भारतीय निर्यात संगठनों का महासंघ (FIEO) के ताजा आकलन में सामने आई है। संगठन के अध्यक्ष एससी रल्हन ने बताया कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों ने भारतीय निर्यातकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने न केवल व्यापार मार्गों को प्रभावित किया है, बल्कि लागत संरचना को भी पूरी तरह बदल दिया है।

28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त हमले के बाद क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ गई। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी, जिसका असर सीधे तौर पर भारत के निर्यात पर पड़ा है। खासतौर पर पश्चिम एशिया के देशों के साथ होने वाला व्यापार प्रभावित हुआ है, जो भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार रहा है।

रल्हन के अनुसार, इस संकट का सबसे बड़ा असर लॉजिस्टिक्स पर पड़ा है। समुद्री माल भाड़ा, हवाई परिवहन लागत और बीमा प्रीमियम में अचानक बढ़ोतरी हुई है। इन बढ़ी हुई लागतों के कारण भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में महंगे हो रहे हैं, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो रही है। निर्यातकों के लिए यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण बन गई है, क्योंकि उन्हें या तो कीमत बढ़ानी पड़ रही है या अपने मुनाफे में कटौती करनी पड़ रही है।

इसके अलावा, पश्चिम एशिया से तेल और गैस की आपूर्ति में आई बाधाओं ने कच्चे माल की कीमतों को भी प्रभावित किया है। इस्पात, प्लास्टिक और रबर जैसे उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल महंगे हो गए हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ गई है। इसका असर केवल निर्यात पर ही नहीं, बल्कि घरेलू उद्योगों पर भी पड़ रहा है।

हालांकि, एक सकारात्मक पहलू यह भी सामने आया है कि वस्तुओं और सेवाओं को मिलाकर भारत के कुल निर्यात में 5 से 6 प्रतिशत की वृद्धि की संभावना जताई जा रही है। इसका मतलब यह है कि सेवा क्षेत्र, खासकर आईटी और डिजिटल सेवाएं, इस संकट के बीच भी अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं और वस्तु निर्यात में आई गिरावट की कुछ हद तक भरपाई कर सकती हैं।

फियो अध्यक्ष ने इस चुनौतीपूर्ण समय में सरकार को कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं। उन्होंने कहा कि उच्च ब्याज दरें निर्यातकों के लिए एक बड़ी समस्या बन रही हैं, इसलिए इन्हें कम करने पर विचार किया जाना चाहिए। इसके अलावा, एडवांस ऑथोराइजेशन योजना के तहत मिलने वाली शुल्क छूट प्रक्रिया को और सरल बनाने की जरूरत है, ताकि निर्यातकों को राहत मिल सके।

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि विदेश व्यापार महानिदेशालय और सीमा शुल्क विभाग के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जाना चाहिए। नामकरण, वर्गीकरण और कोडिंग प्रणाली में एकरूपता लाने से व्यापार प्रक्रियाएं आसान होंगी और अनावश्यक देरी से बचा जा सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है, तो तेल की कीमतों में और उछाल आ सकता है, जिससे परिवहन और उत्पादन लागत में और वृद्धि होगी। इसका असर अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा, जिससे महंगाई बढ़ने की संभावना है।

भारत के लिए पश्चिम एशिया न केवल ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख स्रोत है, बल्कि एक महत्वपूर्ण निर्यात बाजार भी है। ऐसे में वहां की अस्थिरता का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है। सरकार और उद्योग जगत दोनों के लिए यह समय रणनीतिक निर्णय लेने का है, ताकि इस संकट के प्रभाव को कम किया जा सके।

आने वाले दिनों में 15 अप्रैल को जारी होने वाले मार्च के निर्यात आंकड़े इस बात की स्पष्ट तस्वीर पेश करेंगे कि स्थिति कितनी गंभीर है। हालांकि शुरुआती संकेत यही बताते हैं कि चुनौतियां बढ़ रही हैं और निर्यात क्षेत्र को संभालने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

अंततः, यह कहा जा सकता है कि पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। भारत जैसे उभरते हुए आर्थिक देश के लिए यह जरूरी है कि वह समय रहते अपनी रणनीतियों को मजबूत करे, ताकि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अपनी स्थिति को बनाए रख सके।

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