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महंगे यूरिया की मार: पश्चिम एशिया संकट ने भारत की खेती पर डाला दबाव

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात अब धीरे-धीरे दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करने लगे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। पहले जहां इसका असर कच्चे तेल और गैस की कीमतों पर देखने को मिला, वहीं अब इसका सीधा असर उर्वरक क्षेत्र पर भी साफ दिखाई दे रहा है। खासतौर पर यूरिया, जो भारतीय कृषि का एक अहम हिस्सा है, उसकी कीमतों में अचानक आई भारी बढ़ोतरी ने सरकार और किसानों दोनों की चिंता बढ़ा दी है।

हालात की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए एक ही टेंडर में रिकॉर्ड 25 लाख टन यूरिया आयात करने का निर्णय लिया है। यह मात्रा भारत के कुल वार्षिक आयात का लगभग 25 प्रतिशत मानी जा रही है। लेकिन इस बड़े आयात के साथ एक बड़ी चुनौती भी जुड़ी हुई है—कीमतों में जबरदस्त उछाल। जानकारी के अनुसार, इस बार यूरिया की खरीद लगभग दोगुनी कीमत पर की जा रही है, जो दो महीने पहले के मुकाबले काफी अधिक है।

बताया जा रहा है कि इस आयात में पश्चिमी तट के लिए करीब 15 लाख टन यूरिया 935 डॉलर प्रति टन की दर से खरीदा गया है, जबकि पूर्वी तट के लिए 10 लाख टन यूरिया 959 डॉलर प्रति टन के भाव पर लिया जा रहा है। अगर इन दरों की तुलना पिछले टेंडर से करें, तो फर्क साफ दिखाई देता है। कुछ समय पहले यही यूरिया करीब 508 से 512 डॉलर प्रति टन के आसपास खरीदा गया था। यानी बहुत कम समय में कीमत लगभग दोगुनी हो चुकी है।

इस तेज बढ़ोतरी के पीछे मुख्य वजह पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष है। यह क्षेत्र दुनिया में उर्वरकों के उत्पादन और आपूर्ति का एक बड़ा केंद्र है। जब इस इलाके में अस्थिरता बढ़ती है, तो उत्पादन, निर्यात और परिवहन सभी प्रभावित होते हैं। नतीजतन, वैश्विक बाजार में यूरिया की उपलब्धता घटती है और कीमतें बढ़ जाती हैं।

इस बार के टेंडर में भी स्थिति कुछ ऐसी ही देखने को मिली। इंडियन पोटाश लिमिटेड को कुल 56 लाख टन यूरिया की आपूर्ति के प्रस्ताव मिले, लेकिन इनमें से अधिकतर प्रस्ताव ऊंची कीमतों पर थे। कई सप्लायर्स ने 1,000 डॉलर प्रति टन से ज्यादा की कीमत मांगी, जबकि कुछ प्रस्ताव 1,100 डॉलर से भी ऊपर थे। ऐसे में कंपनी ने सबसे कम बोली के आसपास के दाम पर 25 लाख टन यूरिया खरीदने का फैसला किया।

यह कदम एक तरफ जहां देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी था, वहीं दूसरी तरफ इसने वैश्विक बाजार में नई चुनौतियां भी पैदा कर दी हैं। इतनी बड़ी मात्रा में एक साथ खरीदारी करने से अन्य देशों के लिए यूरिया की उपलब्धता और कम हो सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में और बढ़ोतरी होने की संभावना जताई जा रही है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि महंगे आयात का असर घरेलू स्तर पर भी देखने को मिल सकता है। सरकार फिलहाल किसानों को सब्सिडी के जरिए राहत देती है, लेकिन जब आयात की लागत बढ़ती है, तो सब्सिडी का बोझ भी बढ़ जाता है। यदि यह बोझ बहुत ज्यादा बढ़ता है, तो सरकार को या तो कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं या फिर अन्य खर्चों में कटौती करनी पड़ सकती है।

किसानों के नजरिए से देखें तो यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। यूरिया खेती के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला उर्वरक है। यदि इसकी कीमत बढ़ती है, तो खेती की लागत भी बढ़ेगी। इससे किसानों का मुनाफा कम हो सकता है और कई मामलों में उन्हें नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। खासतौर पर छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो सकती है।

इसके अलावा, यदि उर्वरकों की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, तो इसका असर फसल उत्पादन पर भी पड़ सकता है। किसान लागत बचाने के लिए उर्वरकों का कम उपयोग कर सकते हैं, जिससे उत्पादन घट सकता है। इसका सीधा असर खाद्य आपूर्ति और महंगाई पर पड़ सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारत को उर्वरकों के लिए आयात पर इतनी निर्भरता क्यों रखनी पड़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि देश को इस दिशा में आत्मनिर्भर बनने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। घरेलू उत्पादन बढ़ाना, नई तकनीकों को अपनाना और वैकल्पिक उर्वरकों को बढ़ावा देना इस दिशा में अहम कदम हो सकते हैं।

जैविक खेती और प्राकृतिक उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देना भी एक दीर्घकालिक समाधान हो सकता है। इससे न केवल आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर होगी और पर्यावरण को भी नुकसान कम पहुंचेगा।

सरकार के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह किसानों को राहत देते हुए आर्थिक संतुलन कैसे बनाए रखे। इसके लिए जरूरी है कि नीतिगत स्तर पर तेजी से निर्णय लिए जाएं और दीर्घकालिक योजनाओं को लागू किया जाए।

अंत में, यह कहा जा सकता है कि पश्चिम एशिया में जारी संकट ने भारत के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। यह केवल एक अस्थायी समस्या नहीं है, बल्कि यह एक संकेत है कि वैश्विक अस्थिरता का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर कितना गहरा हो सकता है।

यदि भारत को भविष्य में ऐसे संकटों से बचना है, तो उसे अपनी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना होगा और आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने होंगे। तभी देश अपनी कृषि और अर्थव्यवस्था को स्थिर और सुरक्षित रख पाएगा।

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