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वैश्विक रोजगार संकट गहराया: 1.2 अरब युवाओं के सामने सीमित अवसर, बढ़ती बेरोजगारी ने बढ़ाई चिंता

दुनिया इस समय एक बड़े रोजगार संकट की ओर बढ़ रही है, जिसने सरकारों, अर्थशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। ताजा वैश्विक आकलनों के अनुसार आने वाले वर्षों में कार्यबल में शामिल होने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ेगी, लेकिन उसके मुकाबले रोजगार के अवसर बहुत कम रह जाएंगे। यह असंतुलन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है, खासकर उन देशों के लिए जो पहले से ही विकास और रोजगार सृजन के मोर्चे पर संघर्ष कर रहे हैं।

World Bank के प्रमुख Ajay Banga ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में लगभग 1.2 अरब लोग वैश्विक कार्यबल का हिस्सा होंगे, लेकिन मौजूदा गति से केवल करीब 40 करोड़ नौकरियां ही सृजित हो पाएंगी। इसका अर्थ यह है कि करोड़ों युवाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाएंगे। यह स्थिति न केवल आर्थिक असंतुलन पैदा करेगी, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता को भी जन्म दे सकती है।

यह संकट विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील देशों के लिए अधिक गंभीर हो सकता है। इन देशों में युवा आबादी तेजी से बढ़ रही है, जिसे अक्सर “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहा जाता है। लेकिन यदि इस युवा शक्ति को रोजगार नहीं मिलता, तो यही लाभ बोझ में बदल सकता है। अनुमान है कि विकासशील देशों में लगभग 80 करोड़ नौकरियों की कमी का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार सृजन की होगी।

इस वैश्विक संकट को और गहरा करने में अंतरराष्ट्रीय तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों का भी बड़ा योगदान है। विशेष रूप से ईरान से जुड़े संभावित संघर्ष का लंबा खिंचना वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर डाल सकता है। युद्ध के कारण व्यापार, निवेश और आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है, जिससे उद्योगों में मंदी आती है और रोजगार के अवसर घटते हैं। Ajay Banga ने स्पष्ट किया कि यदि युद्ध लंबे समय तक चलता है, तो बेरोजगारी की समस्या और भी गंभीर हो सकती है।

इसके अलावा, दुनिया भर में बढ़ती अस्थिरता और विस्थापन भी रोजगार संकट को बढ़ा रहे हैं। United Nations के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 तक 11.7 करोड़ से अधिक लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं। इन लोगों के लिए रोजगार के अवसर सीमित होते हैं, जिससे वे बेहतर जीवन की तलाश में दूसरे देशों की ओर रुख करते हैं। यदि पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं होते, तो अवैध प्रवासन जैसी समस्याएं और बढ़ सकती हैं, जो कई देशों के लिए सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।

इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए विशेषज्ञों ने कई उपाय सुझाए हैं। सबसे पहले, विकासशील देशों में नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है, ताकि रोजगार सृजन को बढ़ावा दिया जा सके। इसमें कारोबार शुरू करने की प्रक्रिया को आसान बनाना, श्रम कानूनों को लचीला बनाना और पारदर्शिता को बढ़ाना शामिल है। इसके साथ ही भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और बेहतर व्यापारिक माहौल तैयार करना भी जरूरी है।

रोजगार सृजन के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश को भी बढ़ावा देना होगा। सड़क, बिजली, जल और डिजिटल नेटवर्क जैसी सुविधाओं के विकास से न केवल अर्थव्यवस्था को गति मिलती है, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा होते हैं। इसके अलावा कृषि, पर्यटन और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाकर भी रोजगार के नए रास्ते खोले जा सकते हैं।

तकनीकी बदलाव भी इस संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू है। जहां एक ओर नई तकनीकें उत्पादकता बढ़ा रही हैं, वहीं दूसरी ओर कई पारंपरिक नौकरियां खत्म भी हो रही हैं। ऐसे में जरूरी है कि युवाओं को नई तकनीकों के अनुरूप कौशल सिखाए जाएं। स्किल डेवलपमेंट और शिक्षा प्रणाली में सुधार करके युवाओं को भविष्य के रोजगार के लिए तैयार करना होगा।

भारत के संदर्भ में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहां हर साल लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। यदि उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, तो बेरोजगारी दर बढ़ सकती है, जिससे सामाजिक असंतोष और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। इसलिए सरकार को ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो उद्योगों को प्रोत्साहित करें और रोजगार सृजन को प्राथमिकता दें।

महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना भी रोजगार संकट का एक प्रभावी समाधान हो सकता है। कई देशों में महिलाएं अभी भी कार्यबल का छोटा हिस्सा हैं। यदि उन्हें शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के समान अवसर मिलते हैं, तो अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिल सकती है और रोजगार की कुल संख्या में भी वृद्धि हो सकती है।

कुल मिलाकर, वैश्विक रोजगार संकट एक बहुआयामी चुनौती है, जिसे केवल एक देश या एक नीति से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए वैश्विक स्तर पर सहयोग, समन्वय और दूरदर्शी नीतियों की आवश्यकता है। सरकारों, निजी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा, ताकि आने वाले वर्षों में रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा किए जा सकें।

यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट न केवल आर्थिक विकास को प्रभावित करेगा, बल्कि सामाजिक स्थिरता और वैश्विक शांति के लिए भी खतरा बन सकता है। इसलिए अब समय आ गया है कि दुनिया इस चुनौती को गंभीरता से ले और मिलकर इसका समाधान तलाशे।

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