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महाशिवरात्रि पर भोपाल में ऐतिहासिक आयोजन: हिमांगी सखी बनीं पहली किन्नर शंकराचार्य, पुष्कर को मिली नई पीठ की मान्यता

महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर मध्य भारत की राजधानी भोपाल में आयोजित एक विशेष धार्मिक सम्मेलन ने किन्नर समाज के भीतर नई धार्मिक पहचान और नेतृत्व की दिशा तय करने का प्रयास किया। किन्नर वैष्णव अखाड़ा द्वारा आयोजित किन्नर धर्म सम्मेलन में हिमांगी सखी को विधिवत रूप से देश की पहली किन्नर शंकराचार्य के रूप में अभिषिक्त किया गया। इस अवसर पर राजस्थान स्थित पुष्कर को पहली किन्नर शंकराचार्य पीठ घोषित करने की भी घोषणा की गई।

वैदिक विधि से संपन्न हुआ पट्टाभिषेक

महाशिवरात्रि के दिन आयोजित इस समारोह में वैदिक मंत्रोच्चार, संत-महात्माओं की उपस्थिति और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच हिमांगी सखी का पट्टाभिषेक किया गया। आयोजकों के अनुसार, यह कदम किन्नर समाज को धार्मिक नेतृत्व में औपचारिक स्थान देने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है।

हिमांगी सखी पहले से किन्नर समाज में एक प्रमुख धार्मिक चेहरा मानी जाती रही हैं। वे मां वैष्णो किन्नर अखाड़ा की प्रमुख हैं और किन्नर समुदाय की पहली भागवत कथा वाचक के रूप में भी जानी जाती हैं। इससे पहले उन्हें महामंडलेश्वर और जगद्गुरु की उपाधि भी मिल चुकी है। अब शंकराचार्य पद पर अभिषेक के बाद वे नई घोषित पीठ से धार्मिक गतिविधियों का संचालन करेंगी।

नई धार्मिक संरचना का ऐलान

सम्मेलन के दौरान किन्नर परंपरा के अंतर्गत एक व्यापक धार्मिक ढांचे की घोषणा भी की गई। मंच से चार जगद्गुरु और पांच महामंडलेश्वरों की नियुक्ति की घोषणा की गई। कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों और संतों की मौजूदगी में इस नई संरचना को किन्नर समाज की धार्मिक व्यवस्था को संगठित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया।

आयोजन में अखाड़े के संस्थापक ऋषि अजय दास सहित अनेक संत-महात्मा शामिल हुए। आयोजकों का कहना था कि इससे किन्नर समाज के भीतर धार्मिक नेतृत्व की स्पष्टता बढ़ेगी और सामाजिक स्वीकृति को भी बल मिलेगा।

‘घर वापसी’ का दावा

सम्मेलन के दौरान एक और महत्वपूर्ण दावा सामने आया। आयोजकों ने मंच से कहा कि लगभग 60 ऐसे किन्नरों ने पुनः सनातन परंपरा को स्वीकार किया है, जो पहले अन्य धर्मों में चले गए थे। बताया गया कि शुद्धिकरण अनुष्ठान के बाद उन्होंने दोबारा हिंदू धार्मिक परंपरा में आस्था जताई।

हालांकि इस दावे की प्रशासनिक या स्वतंत्र स्तर पर पुष्टि नहीं हो सकी है। फिर भी इस घोषणा ने कार्यक्रम को सामाजिक और धार्मिक हलकों में चर्चा का विषय बना दिया।

बयान से बढ़ी बहस

पट्टाभिषेक के बाद अपने संबोधन में हिमांगी सखी ने किन्नर समाज को संगठित करने और देशभर में नई पीठों की स्थापना की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि यदि शंकराचार्य पद को लेकर किसी को आपत्ति है, तो वे शास्त्रार्थ के लिए तैयार हैं। उनके इस बयान के बाद धार्मिक संगठनों और समाज के विभिन्न वर्गों में बहस तेज हो गई।

कुछ लोगों ने इसे किन्नर समाज के सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया, तो कुछ ने पारंपरिक धार्मिक संरचना में इस तरह के बदलावों पर सवाल भी उठाए।

पृष्ठभूमि में रहे मतभेद

गौरतलब है कि हाल के समय में किन्नर समाज के भीतर धार्मिक पहचान, नेतृत्व और धर्म परिवर्तन के मुद्दों पर मतभेद सामने आए थे। ऐसे माहौल में महाशिवरात्रि पर आयोजित यह सम्मेलन समुदाय के भीतर एकजुटता स्थापित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

धार्मिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह आयोजन केवल धार्मिक पद की घोषणा भर नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और प्रतिनिधित्व की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

सामाजिक विमर्श को मिली नई दिशा

महाशिवरात्रि जैसे बड़े धार्मिक पर्व पर हुए इस आयोजन ने दो स्तरों पर प्रभाव छोड़ा है। एक ओर इसने धार्मिक परंपराओं में नए प्रयोग की चर्चा को जन्म दिया, वहीं दूसरी ओर किन्नर समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श को भी नई दिशा देने की कोशिश की।

आयोजकों का कहना है कि उनका उद्देश्य धार्मिक पदों के माध्यम से समाज में सम्मान और आत्मविश्वास बढ़ाना है। उनका विश्वास है कि धार्मिक मंचों पर प्रतिनिधित्व मिलने से किन्नर समाज की मुख्यधारा में भागीदारी मजबूत होगी।

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