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तीन साल से सुलग रहा मणिपुर: 58 हजार से ज्यादा लोग बेघर, 217 मौतें; विधायक की मौत पर चुराचांदपुर ठप

मणिपुर में मई 2023 में भड़की जातीय हिंसा का असर आज भी थमता नजर नहीं आ रहा है। करीब तीन साल बीत जाने के बावजूद हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो सके हैं। इस लंबे दौर में हजारों परिवारों की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हुई है। ताजा जानकारी के अनुसार, राज्य में अब तक 58 हजार से अधिक लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं, जबकि 200 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। यह आंकड़े मणिपुर सरकार के गृह विभाग द्वारा एक आरटीआई के जवाब में सामने आए हैं, जो इस त्रासदी की गंभीरता को साफ दर्शाते हैं।

विस्थापन का दर्द: घर छूटा, जिंदगी बिखरी

मणिपुर की हिंसा ने सिर्फ जान-माल का नुकसान ही नहीं किया, बल्कि हजारों परिवारों को बेघर भी कर दिया। 3 मई 2023 से लेकर 30 मार्च 2026 तक की अवधि में कुल 58,821 लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। ये लोग अब राहत शिविरों या अस्थायी ठिकानों पर रहने को विवश हैं।

विस्थापन का दर्द केवल छत खोने तक सीमित नहीं होता। इसके साथ जुड़ा होता है रोजमर्रा की जिंदगी का संघर्ष—रोजगार की कमी, बच्चों की पढ़ाई में रुकावट और भविष्य को लेकर अनिश्चितता। जिन लोगों ने वर्षों की मेहनत से अपना घर बसाया था, वे आज फिर से शून्य से शुरुआत करने को मजबूर हैं।

मौत का आंकड़ा 217 के पार

हिंसा की इस आग में अब तक 217 लोगों की जान जा चुकी है। इन मौतों ने न जाने कितने परिवारों को हमेशा के लिए तोड़ दिया। सरकार ने मृतकों के परिजनों को अनुग्रह राशि देने की बात कही है, लेकिन किसी अपने को खोने का दर्द किसी आर्थिक सहायता से पूरा नहीं हो सकता।

इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए हैं, जिनमें कई अब भी शारीरिक और मानसिक आघात से उबर नहीं पाए हैं। यह हिंसा केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे हजारों टूटे हुए सपने और बिखरी हुई जिंदगियां हैं।

राहत शिविरों में जिंदगी

राज्य सरकार के अनुसार, 10 मार्च 2026 तक मणिपुर में कुल 174 राहत शिविर संचालित किए जा रहे हैं। इन शिविरों में विस्थापित लोगों को रहने, खाने और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।

हालांकि, राहत शिविरों में जीवन आसान नहीं होता। सीमित संसाधनों, भीड़भाड़ और अस्थायी व्यवस्था के बीच लोगों को दिन गुजारना पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और कई लोग रोजगार के अभाव में आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं।

पुनर्वास की कोशिशें

सरकार की ओर से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए कदम उठाए गए हैं। मणिपुर पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा करीब 3,000 प्री-फैब्रिकेटेड घर बनाए गए हैं, ताकि बेघर हुए लोगों को स्थायी आश्रय मिल सके।

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल घर बनाना ही पर्याप्त नहीं है। लोगों को उनके मूल स्थानों पर सुरक्षित तरीके से वापस बसाना, रोजगार के अवसर देना और सामाजिक समरसता बहाल करना भी उतना ही जरूरी है।

भारी संपत्ति का नुकसान

हिंसा के दौरान बड़े पैमाने पर संपत्ति का भी नुकसान हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक 7,894 स्थायी घर पूरी तरह नष्ट हो गए, जबकि 2,646 घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं।

इसके अलावा दुकानों, वाहनों और अन्य संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचा है। इस नुकसान ने लोगों की आर्थिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे उबरना आसान नहीं होगा।

आरटीआई से सामने आई सच्चाई

यह पूरी जानकारी एक आरटीआई के जरिए सामने आई है, जिसे कांग्रेस नेता हरेश्वर गोस्वामी ने दायर किया था। उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि इस जानकारी को हासिल करने में उन्हें करीब सात महीने का समय लगा।

यह तथ्य इस बात की ओर इशारा करता है कि इस मुद्दे पर पारदर्शिता और जानकारी की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

विधायक की मौत पर उबाल

इसी बीच मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में भाजपा विधायक वुंगजागिन वाल्टे की मौत को लेकर लोगों में आक्रोश देखने को मिला। न्याय की मांग को लेकर बुधवार को जिले में 13 घंटे का पूर्ण बंद रखा गया।

यह बंद सुबह 5 बजे से शाम 6 बजे तक चला, जिसके दौरान बाजार, स्कूल, सरकारी दफ्तर और सार्वजनिक परिवहन पूरी तरह बंद रहे। सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा और आम जनजीवन ठप हो गया।

कौन थे वुंगजागिन वाल्टे?

वुंगजागिन वाल्टे मणिपुर के एक सक्रिय भाजपा विधायक थे, जो मई 2023 में हिंसा के दौरान भीड़ के हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। लंबे समय तक इलाज के बाद 20 फरवरी 2026 को गुरुग्राम के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया।

उनकी मौत के बाद से ही स्थानीय संगठनों और समुदायों में नाराजगी देखी जा रही है। लोग आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

संगठनों का समर्थन और चेतावनी

जोमी समूहों द्वारा बुलाए गए इस बंद को कुकी और हमार संगठनों का भी समर्थन मिला। जोमी समन्वय समिति का कहना है कि वाल्टे की मौत को 60 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

आयोजकों ने साफ चेतावनी दी है कि जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलेगा, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। हालांकि बंद के दौरान शांति बनी रही और किसी प्रकार की हिंसा की खबर नहीं आई। केवल एम्बुलेंस और अन्य आपातकालीन सेवाओं को छूट दी गई थी।

अब आगे क्या?

मणिपुर में शांति बहाली की प्रक्रिया अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। सरकार और प्रशासन लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन जमीन पर हालात पूरी तरह सामान्य होने में समय लग सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल प्रशासनिक कदमों से नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और आपसी विश्वास बहाली से ही संभव है।

निष्कर्ष

मणिपुर की यह कहानी केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि मानवीय पीड़ा की कहानी है। हजारों लोग आज भी अपने घरों से दूर हैं, कई परिवार अपने प्रियजनों को खो चुके हैं और पूरा राज्य एक लंबे संकट से गुजर रहा है।

विधायक वुंगजागिन वाल्टे की मौत और उस पर उठता आक्रोश यह दर्शाता है कि लोगों के मन में अभी भी असंतोष और पीड़ा है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार और समाज मिलकर इस घाव को भरने की कोशिश करें, ताकि मणिपुर एक बार फिर शांति और स्थिरता की ओर लौट सके।

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