हिमाचल प्रदेश सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। Shimla से मिली जानकारी के अनुसार, राज्य के Central Board of Secondary Education (CBSE) से संबद्ध सरकारी स्कूलों में गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्ति अब पारंपरिक भर्ती प्रक्रिया के जरिए नहीं होगी। इसके बजाय विभाग ने मौजूदा कर्मचारियों के पुनर्गठन (युक्तीकरण) और पदोन्नति के माध्यम से इन पदों को भरने की योजना बनाई है।

स्कूल शिक्षा विभाग के निदेशक आशीष कोहली ने इस संबंध में एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर शिक्षा सचिव राकेश कंवर को भेजा है। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद राज्य के 151 सीबीएसई स्कूलों में गैर-शिक्षक स्टाफ की तैनाती शुरू कर दी जाएगी। इस योजना के तहत पहले चरण में कुल 604 मिनिस्ट्रियल पदों को भरने का लक्ष्य रखा गया है।
इस योजना का मुख्य उद्देश्य स्कूलों में प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करना है। प्रस्ताव के अनुसार, प्रत्येक स्कूल में अधीक्षक ग्रेड-1, अधीक्षक ग्रेड-2 और एक वरिष्ठ सहायक का एक-एक पद भरा जाएगा। इसके अलावा, लिपिक सह जेओए (आईटी) के चार पद भी प्रत्येक स्कूल में नियुक्त किए जाएंगे। इससे स्कूलों में फाइलों का काम, रिकॉर्ड प्रबंधन और अन्य प्रशासनिक कार्य बेहतर तरीके से हो सकेंगे।
दरअसल, अभी तक कई स्कूलों में गैर-शिक्षक स्टाफ की कमी के कारण शिक्षकों को भी प्रशासनिक कार्यों में लगाया जाता था। इससे उनकी पढ़ाने की क्षमता प्रभावित होती थी। सरकार का मानना है कि यदि गैर-शिक्षक कर्मचारियों की संख्या पर्याप्त होगी, तो शिक्षक केवल शिक्षण कार्य पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे और इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा।
हालांकि, इस फैसले को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि जब राज्य में पहले से ही बड़ी संख्या में पद खाली हैं, तो नई भर्ती क्यों नहीं की जा रही। शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, विभिन्न खंड प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी (BEEO) कार्यालयों में कुल 2105 मिनिस्ट्रियल पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 402 वरिष्ठ सहायक और 886 लिपिक के पद अभी भी खाली हैं।
विभाग का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा प्रणाली में कई बदलाव हुए हैं। क्लस्टर प्रणाली लागू होने से कई कार्यालयों में काम का बोझ कम हुआ है। इसके अलावा, छात्र संख्या में कमी और डिजिटल प्रक्रियाओं के बढ़ते उपयोग के कारण कर्मचारियों की जरूरत भी पहले की तुलना में घट गई है। ऐसे में नए कर्मचारियों की भर्ती करने के बजाय मौजूदा स्टाफ का बेहतर उपयोग करना अधिक व्यावहारिक माना गया है।
प्रस्ताव के तहत जिन BEEO कार्यालयों में वरिष्ठ सहायक के पांच पद स्वीकृत हैं, वहां से दो पदों को अपग्रेड कर अधीक्षक ग्रेड-1 बनाया जाएगा। वहीं, जिन कार्यालयों में छह या उससे अधिक क्लर्क पद खाली हैं, वहां से अतिरिक्त लिपिक या जेओए (आईटी) को सीबीएसई स्कूलों में स्थानांतरित किया जाएगा।
इस प्रक्रिया का एक बड़ा फायदा यह है कि इससे सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ कम पड़ेगा। विभाग के अनुसार, 151 वरिष्ठ सहायकों को अधीक्षक ग्रेड-1 में पदोन्नत करने पर करीब 2.81 करोड़ रुपये का वार्षिक खर्च आएगा। वहीं, क्लर्क और जेओए (आईटी) पदों का पुनर्संयोजन केवल स्थानांतरण के जरिए होगा, जिससे कोई अतिरिक्त खर्च नहीं बढ़ेगा।
सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में शिक्षकों को किसी भी गैर-शैक्षणिक कार्य में नहीं लगाया जाएगा। इसका सीधा लाभ छात्रों को मिलेगा, क्योंकि शिक्षक पूरी तरह से पढ़ाई पर ध्यान दे सकेंगे। इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होने की उम्मीद है।
इसके साथ ही, राज्य सरकार ने शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाया है। सीबीएसई स्कूलों के लिए एक अलग सब-कैडर बनाया गया है। इस कैडर में शामिल होने के लिए शिक्षकों को पहले एक विशेष परीक्षा पास करनी होगी। इसके बाद ही उनकी नियुक्ति इन स्कूलों में की जाएगी। कुछ पदों को सीधे भर्ती के माध्यम से भी भरा जा रहा है।
इस योजना को लेकर लोगों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली हैं। कुछ लोग मानते हैं कि नई भर्ती न होने से युवाओं को रोजगार के अवसर नहीं मिलेंगे। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संसाधनों का बेहतर उपयोग करना भी उतना ही जरूरी है, ताकि सरकारी खर्च को नियंत्रित रखा जा सके।
कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश सरकार की यह पहल शिक्षा व्यवस्था को अधिक कुशल और व्यवस्थित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यदि यह योजना सफल होती है, तो इससे स्कूलों में प्रशासनिक कार्य बेहतर होंगे और शिक्षक पूरी तरह से अपने मूल कार्य यानी शिक्षण पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि प्रस्ताव को कब मंजूरी मिलती है और इसके लागू होने के बाद यह योजना जमीनी स्तर पर कितनी सफल साबित होती है। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो अन्य राज्यों के लिए भी यह एक उदाहरण बन सकता है।
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