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घाटे से उबरने की राह पर डीटीसी: टिकट से आगे बढ़कर नए कमाई स्रोतों पर जोर, बदल रहा राजस्व ढांचा

दिल्ली की जीवनरेखा मानी जाने वाली दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) अब अपने आर्थिक ढांचे में बड़ा बदलाव करते हुए एक नई दिशा में आगे बढ़ रही है। वर्षों से घाटे का सामना कर रही यह सार्वजनिक परिवहन संस्था अब केवल यात्रियों के किराए पर निर्भर रहने के बजाय मल्टी-सोर्स रेवेन्यू मॉडल अपनाने की ओर अग्रसर है। इस नई रणनीति का उद्देश्य आय के विभिन्न स्रोतों को मजबूत कर निगम को वित्तीय रूप से स्थिर बनाना है।

हालिया वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में 26 मार्च तक डीटीसी की कुल आय 995.55 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। यह पिछले वर्ष की 822.53 करोड़ रुपये की आय की तुलना में करीब 173 करोड़ रुपये की उल्लेखनीय वृद्धि है। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि डीटीसी ने अपने पारंपरिक मॉडल से आगे बढ़कर नई संभावनाओं की तलाश शुरू कर दी है।

टिकट बिक्री से होने वाली आय में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस वर्ष किराए से करीब 52.54 करोड़ रुपये अधिक प्राप्त हुए हैं। हालांकि, इस बढ़ोतरी से भी अधिक महत्वपूर्ण है ‘मिसलेनियस’ श्रेणी से प्राप्त आय, जिसमें 103.92 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है। यह स्पष्ट करता है कि डीटीसी अब गैर-पारंपरिक स्रोतों को प्राथमिकता दे रही है।

मिसलेनियस आय में विज्ञापन, बसों और डिपो की जगह का व्यावसायिक उपयोग, जुर्माने और अन्य सेवाओं से प्राप्त राजस्व शामिल है। इसके अलावा, स्पेशल हायर सेवाओं से भी आय में वृद्धि हुई है, जो 82.65 करोड़ रुपये से बढ़कर 99.21 करोड़ रुपये हो गई है। यह दर्शाता है कि डीटीसी अपनी सेवाओं का व्यावसायिक उपयोग बढ़ाने पर जोर दे रही है।

डीटीसी की औसत मासिक आय में भी सुधार हुआ है। यह पहले 68.54 करोड़ रुपये थी, जो अब बढ़कर 82.96 करोड़ रुपये हो गई है। यह सुधार केवल आय बढ़ने का ही परिणाम नहीं है, बल्कि बेहतर संचालन और संसाधनों के कुशल प्रबंधन का भी संकेत देता है।

परिवहन मंत्री डॉ. पंकज सिंह ने इस बदलाव को सकारात्मक बताते हुए कहा है कि डीटीसी अब अपने राजस्व स्रोतों का विस्तार कर रही है, जिससे भविष्य में उसकी आर्थिक स्थिति और मजबूत होगी। उनका मानना है कि यह रणनीति लंबे समय तक टिकाऊ साबित हो सकती है।

हालांकि, डीटीसी के सामने अभी भी कई बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में निगम की वित्तीय स्थिति को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई थीं। रिपोर्ट के अनुसार, 2015-16 में डीटीसी का कुल घाटा 28,263 करोड़ रुपये था, जो 2021-22 तक बढ़कर 65,274 करोड़ रुपये हो गया।

इस दौरान परिचालन घाटा भी 14,000 करोड़ रुपये से अधिक रहा। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि परिचालन खर्च कम होने के बजाय बढ़ते गए, जिससे निगम पर वित्तीय दबाव और बढ़ गया। यह स्थिति इस बात को दर्शाती है कि केवल आय बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि खर्चों पर नियंत्रण भी जरूरी है।

बसों की संख्या में कमी भी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है। वर्ष 2015 में डीटीसी के पास 4,344 बसें थीं, जो 2023 तक घटकर 3,937 रह गईं। यह कमी यात्रियों की बढ़ती संख्या के मुकाबले अपर्याप्त मानी जा रही है।

इलेक्ट्रिक बसों की खरीद को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पर्याप्त बजट होने के बावजूद 2021-22 और 2022-23 में केवल 300 ई-बसें ही खरीदी गईं। इसके अलावा, बस ऑपरेटरों पर लगाए गए जुर्माने की वसूली में भी लापरवाही सामने आई है।

इन सभी चुनौतियों के बावजूद डीटीसी का मल्टी-सोर्स रेवेन्यू मॉडल एक उम्मीद की किरण के रूप में उभर रहा है। यह मॉडल न केवल आय के नए रास्ते खोलता है, बल्कि निगम को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाने में भी मदद कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डीटीसी अपने इस नए मॉडल को प्रभावी ढंग से लागू करती है और साथ ही अपने खर्चों पर नियंत्रण रखती है, तो वह भविष्य में घाटे को काफी हद तक कम कर सकती है। इसके लिए जरूरी है कि निगम पारदर्शिता बनाए रखे, तकनीकी सुधारों को अपनाए और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करे।

इसके अलावा, यात्रियों को बेहतर सुविधाएं प्रदान करना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे टिकट बिक्री में भी वृद्धि हो सकती है। यदि डीटीसी अपने नए और पुराने दोनों आय स्रोतों के बीच संतुलन बनाए रखती है, तो वह एक मजबूत और टिकाऊ परिवहन प्रणाली विकसित कर सकती है।

अंततः, डीटीसी का यह बदलाव केवल एक आर्थिक रणनीति नहीं, बल्कि एक व्यापक सुधार प्रक्रिया का हिस्सा है। यह कदम न केवल निगम को घाटे से उबारने में मदद करेगा, बल्कि दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन को भी अधिक आधुनिक, कुशल और टिकाऊ बना सकता है।

अब यह देखना बाकी है कि यह नया मॉडल आने वाले समय में कितना सफल साबित होता है और क्या डीटीसी वास्तव में अपनी वित्तीय चुनौतियों को पीछे छोड़कर एक मजबूत संस्था के रूप में उभर पाती है।

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