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आंबेडकर जयंती पर बढ़ी सियासी सक्रियता, विचारों से ज्यादा वोट बैंक साधने की कोशिश

उत्तर प्रदेश में डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम इन दिनों एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। आंबेडकर जयंती के मौके पर प्रदेश भर में विभिन्न कार्यक्रमों, रैलियों और आयोजनों की भरमार देखने को मिल रही है। हर राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन अपने-अपने तरीके से बाबा साहब को याद कर रहा है। लेकिन इस बढ़ती सक्रियता के पीछे की मंशा को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में यह साफ हुआ है कि आंबेडकर की विरासत अब केवल सामाजिक न्याय और समानता के प्रतीक तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह एक मजबूत राजनीतिक साधन बन चुकी है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां जातीय समीकरण चुनावी नतीजों को काफी प्रभावित करते हैं, वहां आंबेडकर का नाम राजनीतिक दलों के लिए बेहद अहम हो गया है। यही वजह है कि सभी दल उनके नाम और छवि के जरिए एक बड़े वर्ग को आकर्षित करने की कोशिश में लगे हुए हैं।

भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी—सभी प्रमुख दल आंबेडकर के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताने में पीछे नहीं रहना चाहते। कोई उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर रहा है, तो कोई उनके नाम पर बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। इन आयोजनों में उनके योगदान और विचारों की चर्चा जरूर होती है, लेकिन यह चर्चा अक्सर औपचारिकता तक ही सीमित रह जाती है।

डॉ. आंबेडकर का जीवन समाज में समानता स्थापित करने के लिए समर्पित रहा। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि जब तक समाज में ऊंच-नीच का भेदभाव रहेगा, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं होगा। उनके लिए सामाजिक न्याय केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक लक्ष्य था, जिसे हासिल करना बेहद जरूरी था।

आंबेडकर ने जाति व्यवस्था को भारतीय समाज की सबसे बड़ी समस्या माना था। उनका मानना था कि यह व्यवस्था केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि मानसिकता का हिस्सा बन चुकी है। इसे खत्म करने के लिए उन्होंने कई उपाय सुझाए थे, जिनमें अंतरजातीय विवाह को सबसे प्रभावी माना गया। उनका कहना था कि जब अलग-अलग जातियों के लोग आपस में वैवाहिक संबंध बनाएंगे, तभी समाज में वास्तविक एकता आएगी।

हालांकि, आज के समय में भी यह विचार पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है। कई जगहों पर अंतरजातीय विवाह को लेकर विरोध देखने को मिलता है, और कुछ मामलों में यह हिंसा का कारण भी बन जाता है। इससे यह साफ होता है कि समाज अब भी उस सोच से काफी दूर है, जिसकी कल्पना आंबेडकर ने की थी।

आंबेडकर का यह भी मानना था कि जाति व्यवस्था की जड़ें धर्म और परंपराओं में गहराई तक फैली हुई हैं। उन्होंने कहा था कि जब तक लोग इन मान्यताओं को बिना सवाल किए स्वीकार करते रहेंगे, तब तक इस व्यवस्था को खत्म करना संभव नहीं होगा। यह विचार आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे लेकर समाज में व्यापक स्तर पर बदलाव नहीं आ पाया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आज आंबेडकर को केवल एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि उनके विचारों को सही मायने में अपनाने की जरूरत है। लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर संजय गुप्ता के अनुसार, अगर आंबेडकर के सिद्धांतों को गंभीरता से लागू किया जाता, तो आज समाज में भेदभाव की स्थिति काफी हद तक समाप्त हो चुकी होती।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो आंबेडकर का नाम एक बड़े वोट बैंक तक पहुंचने का माध्यम बन गया है। खासकर दलित और पिछड़े वर्गों को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक दल उनके नाम और छवि का सहारा लेते हैं। चुनावों के नजदीक आते ही यह गतिविधियां और तेज हो जाती हैं, जब हर दल खुद को आंबेडकर का सबसे बड़ा अनुयायी साबित करने की कोशिश करता है।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पहलू नजरअंदाज हो जाता है—आंबेडकर के विचारों का वास्तविक पालन। समाज में आज भी जातिगत भेदभाव, असमानता और सामाजिक विषमताएं मौजूद हैं। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि हम आंबेडकर को याद तो करते हैं, लेकिन उनके बताए रास्ते पर चलने में पीछे रह जाते हैं।

आने वाले समय में, खासकर चुनावों के दौरान, आंबेडकर का नाम और भी ज्यादा सुनाई देगा। राजनीतिक दल उनके नाम पर अपनी रणनीतियां बनाते रहेंगे और कार्यक्रमों के जरिए लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। लेकिन जरूरी यह है कि इस प्रक्रिया के साथ-साथ उनके विचारों को भी व्यवहार में उतारा जाए।

अगर वास्तव में समाज में बदलाव लाना है, तो आंबेडकर के सिद्धांतों को केवल किताबों और भाषणों तक सीमित नहीं रखना होगा। उन्हें जीवन में अपनाना होगा और सामाजिक ढांचे में बदलाव लाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में आंबेडकर के नाम पर चल रही सियासत यह दिखाती है कि उनकी विरासत कितनी प्रभावशाली है। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि इस विरासत का उपयोग केवल राजनीतिक लाभ के लिए न किया जाए, बल्कि समाज में वास्तविक समानता और न्याय स्थापित करने के लिए किया जाए। तभी बाबा साहब के सपनों का भारत साकार हो सकेगा।

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