भारत और रूस के बीच दशकों से चली आ रही मजबूत मित्रता अब एक नए और अधिक व्यावहारिक चरण में प्रवेश कर चुकी है। वर्ष 2025 में हुए RELOS (Reciprocal Exchange of Logistics Support) समझौते के प्रभावी होने के साथ ही दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग को नई दिशा मिल गई है। यह समझौता केवल कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ऐसा ढांचा है जो दोनों देशों को वास्तविक ऑपरेशनल स्तर पर एक-दूसरे के साथ जोड़ता है।

इस समझौते के तहत भारत और रूस अब एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, हवाई अड्डों और नौसैनिक ठिकानों का उपयोग कर सकेंगे। खास बात यह है कि दोनों देश एक-दूसरे की धरती पर अधिकतम 3,000 सैनिकों की तैनाती कर सकते हैं। इसके अलावा, पांच युद्धपोत और 10 लड़ाकू विमानों को भी एक-दूसरे के ठिकानों पर तैनात करने की अनुमति दी गई है। यह व्यवस्था न केवल सैन्य समन्वय को बेहतर बनाएगी, बल्कि आपात स्थितियों में तेज प्रतिक्रिया की क्षमता भी बढ़ाएगी।
यह समझौता पांच वर्षों के लिए लागू किया गया है, लेकिन इसकी सफलता को देखते हुए इसे आगे बढ़ाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत-रूस संबंधों को “खरीदार-विक्रेता” मॉडल से आगे ले जाकर “साझेदार” मॉडल में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
RELOS समझौते का सबसे अहम पहलू इसका लॉजिस्टिक सपोर्ट है। इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे को ईंधन, मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स और अन्य आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराएंगे। इससे लंबी दूरी के सैन्य अभियानों में आने वाली चुनौतियां काफी हद तक कम हो जाएंगी। उदाहरण के लिए, अगर भारतीय नौसेना का कोई जहाज दूरस्थ क्षेत्र में तैनात है, तो उसे अब रूस के बंदरगाहों से सीधे सहायता मिल सकेगी।
रणनीतिक रूप से यह समझौता भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर आर्कटिक क्षेत्र के संदर्भ में। रूस के उत्तरी बंदरगाह—मरमांस्क और सेवेरोमोर्स्क—तक पहुंच मिलने से भारत की उपस्थिति इस क्षेत्र में मजबूत होगी। आर्कटिक क्षेत्र तेजी से वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बनता जा रहा है, जहां रूस और चीन अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं।
आर्कटिक में मौजूद प्राकृतिक संसाधन और संभावित नए समुद्री मार्ग इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाते हैं। ऐसे में भारत की भागीदारी उसे भविष्य के ऊर्जा और व्यापारिक अवसरों तक पहुंच दिला सकती है। यह कदम भारत की “एक्ट ईस्ट” और “ग्लोबल आउटरीच” नीति के अनुरूप भी है।
दूसरी ओर, मॉस्को के लिए भी यह समझौता कई फायदे लेकर आया है। रूस हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहता है, और इसके लिए भारत एक स्वाभाविक साझेदार है। भारतीय बंदरगाहों और सुविधाओं तक पहुंच मिलने से रूस अपने जहाजों और विमानों को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित कर सकेगा।
RELOS समझौते की एक और खासियत यह है कि इसमें “वस्तु विनिमय” (barter system) की सुविधा भी शामिल है। यानी, अगर एक देश दूसरे को कोई सेवा या संसाधन प्रदान करता है, तो उसके बदले में समान मूल्य की अन्य सेवाएं दी जा सकती हैं। इससे वित्तीय लेन-देन का बोझ कम होता है और सहयोग अधिक लचीला बनता है।
भारत की विदेश नीति में संतुलन बनाए रखने की रणनीति इस समझौते में साफ झलकती है। भारत ने अमेरिका के साथ भी LEMOA (Logistics Exchange Memorandum of Agreement) किया है, जो इसी तरह का एक लॉजिस्टिक समझौता है। हालांकि, RELOS इससे अलग है क्योंकि इसमें सैनिकों की तैनाती और वस्तु विनिमय जैसी अतिरिक्त सुविधाएं भी शामिल हैं।
रक्षा क्षेत्र में भारत और रूस के संबंध पहले से ही गहरे हैं। स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान (SIPRI) के अनुसार, रूस भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। 2020 से 2024 के बीच भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत रही है।
हाल ही में भारत को रूस से अतिरिक्त S-400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली की मंजूरी भी मिली है। यह अत्याधुनिक प्रणाली लंबी दूरी से आने वाले हवाई खतरों को नष्ट करने में सक्षम है। 2018 के समझौते के तहत भारत को पांच S-400 बैटरियां मिलनी हैं, जिनमें से तीन पहले ही प्राप्त हो चुकी हैं।
हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण कुछ डिलीवरी में देरी हुई है। फिर भी, दोनों देश इस परियोजना को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं और उम्मीद है कि शेष बैटरियां तय समय के भीतर भारत को मिल जाएंगी।
भारत और रूस के संबंध केवल रक्षा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश ऊर्जा, अंतरिक्ष अनुसंधान, विज्ञान और कूटनीति के क्षेत्रों में भी गहरा सहयोग रखते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों जैसे ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और संयुक्त राष्ट्र में भी दोनों देशों की साझेदारी मजबूत रही है।
यह समझौता भारत की बहु-आयामी विदेश नीति का उदाहरण है, जिसमें वह एक साथ कई वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलन बनाए रखता है। इससे भारत को रणनीतिक स्वायत्तता मिलती है और वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय ले सकता है।
कुल मिलाकर, RELOS समझौता भारत-रूस संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाने वाला कदम है। यह न केवल सैन्य सहयोग को मजबूत करेगा, बल्कि दोनों देशों को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रभावशाली बनाने में भी मदद करेगा। आने वाले वर्षों में यह समझौता क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों देश इस सहयोग को किस तरह आगे बढ़ाते हैं और इससे उन्हें सामरिक, आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर कितना लाभ मिलता है।
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