देश की रक्षा करते हुए एक और वीर सपूत ने अपनी जान न्योछावर कर दी। पंजाब की धरती ने एक बार फिर ऐसा बेटा खो दिया, जिसने आखिरी सांस तक दुश्मनों से लड़ते हुए मातृभूमि की रक्षा की।

भारतीय सेना में तैनात बहादुर सैनिक गुरप्रीत सिंह मणिपुर में एक सैन्य अभियान के दौरान देश-विरोधी तत्वों से हुई मुठभेड़ में शहीद हो गए। जैसे ही उनके बलिदान की खबर गांव पहुंची, पूरे इलाके में मातम छा गया।
गोलियों के बीच दिखाया अदम्य साहस
जानकारी के अनुसार, गुरप्रीत सिंह पिछले 21 वर्षों से सेना में सेवा दे रहे थे। उन्होंने अपने सैन्य जीवन में कई कठिन इलाकों में तैनाती निभाई और हर बार बहादुरी से डटे रहे।
इस बार उनकी तैनाती मणिपुर में थी, जहां सुरक्षा बलों को खुफिया सूचना मिली थी कि कुछ हथियारबंद देश-विरोधी तत्व इलाके में छिपे हुए हैं।
ऑपरेशन के दौरान सेना की टीम ने जैसे ही घेराबंदी की, अचानक फायरिंग शुरू हो गई। गोलियों की बौछार के बीच भी गुरप्रीत सिंह पीछे नहीं हटे। उन्होंने बहादुरी से मुकाबला किया और अपने साथियों की सुरक्षा सुनिश्चित की।
लेकिन इसी दौरान दुश्मनों की एक गोली उन्हें लग गई। घायल होने के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा। वे आखिरी सांस तक लड़ते रहे और अंततः मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
गांव में पसरा सन्नाटा
गुरप्रीत सिंह का संबंध सुनाम के गांव महिलां से था। जैसे ही सेना के अधिकारियों ने परिवार को शहादत की सूचना दी, घर में चीख-पुकार मच गई।
पत्नी की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे। छोटे-छोटे बच्चे यह समझ ही नहीं पा रहे थे कि उनके पिता अब कभी वापस नहीं आएंगे।
कुछ ही देर में पूरे गांव में खबर फैल गई। ग्रामीणों की भीड़ शहीद के घर के बाहर जमा हो गई। हर कोई स्तब्ध था, लेकिन साथ ही गर्व भी महसूस कर रहा था कि उनके गांव का बेटा देश के लिए कुर्बान हुआ है।
21 साल की सेवा, अंत में सर्वोच्च बलिदान
गुरप्रीत सिंह ने अपने जीवन के दो दशक से अधिक समय सेना को समर्पित किए। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य से कभी समझौता नहीं किया।
साथी सैनिक बताते हैं कि वे बेहद अनुशासित, साहसी और देशभक्त थे। जब भी कोई कठिन ऑपरेशन होता, वे सबसे आगे रहने को तैयार रहते थे।
उनका मानना था कि सैनिक का जीवन देश के लिए होता है, और यदि जरूरत पड़े तो जान भी देश पर कुर्बान कर देनी चाहिए।
पत्नी और बच्चों पर टूटा दुखों का पहाड़
शहीद गुरप्रीत सिंह के परिवार में पत्नी, एक बेटा और एक बेटी हैं। घर का सहारा छिन जाने से परिवार पूरी तरह टूट गया है।
पत्नी बार-बार यही कह रही थी कि “उन्होंने हमेशा देश को पहले रखा, हमें बाद में… लेकिन हमें गर्व है कि वे देश के लिए शहीद हुए।”
बच्चे अपने पिता की तस्वीर को देखकर रो रहे थे। गांव की महिलाएं उन्हें संभालने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन माहौल इतना भावुक था कि हर आंख नम हो गई।
नेताओं और ग्रामीणों ने उठाई मांग
नंबरदार यूनियन पंजाब के नेता रण सिंह महिलां ने सरकार से मांग की है कि
शहीद के परिवार को उचित आर्थिक सहायता दी जाए
परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी मिले
गांव में शहीद के नाम पर स्मारक बनाया जाए
उनका कहना है कि देश के लिए जान देने वाले सैनिक के परिवार का सम्मान करना सरकार की जिम्मेदारी है।
पूरे राजकीय सम्मान के साथ होगा अंतिम संस्कार
सेना के अधिकारियों ने बताया कि शहीद गुरप्रीत सिंह का पार्थिव शरीर उनके गांव लाया जाएगा और पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा।
तिरंगे में लिपटा उनका शव जब गांव पहुंचेगा, तब हजारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने उमड़ पड़ेंगे।
यह सिर्फ एक सैनिक की विदाई नहीं होगी, बल्कि एक वीर बेटे को श्रद्धांजलि होगी जिसने देश के लिए अपने प्राण दे दिए।
शहादत जो हमेशा याद रहेगी
गुरप्रीत सिंह का बलिदान सिर्फ उनके परिवार का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे देश की क्षति है।
ऐसे वीर सैनिकों की वजह से ही देश की सीमाएं सुरक्षित हैं और हम चैन की नींद सो पाते हैं।
उनकी शहादत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देगी कि देश सेवा सबसे बड़ा धर्म है।
गांव की जुबां पर एक ही बात
आज गांव में हर व्यक्ति यही कह रहा है —
“हमने बेटा खोया है, लेकिन देश ने एक वीर पाया है।”
गुरप्रीत सिंह अब भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका साहस, उनका त्याग और उनकी देशभक्ति हमेशा याद रखी जाएगी।
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