देश में गन्ने की भरपूर उपलब्धता और बेहतर पैदावार के चलते चालू चीनी सत्र में उत्पादन ने रफ्तार पकड़ ली है। 2025-26 सत्र में 15 जनवरी तक देश का कुल चीनी उत्पादन सालाना आधार पर 22 प्रतिशत बढ़कर 1.59 करोड़ टन तक पहुंच गया है। बीते साल इसी अवधि में यह आंकड़ा लगभग 1.30 करोड़ टन था। उत्पादन में इस तेज बढ़ोतरी ने जहां आपूर्ति को मजबूत किया है, वहीं घटती कीमतों ने चीनी मिलों और किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
उद्योग संगठन भारतीय चीनी एवं बायो-ऊर्जा विनिर्माता संघ (ISMA) के अनुसार, 15 जनवरी तक देशभर में 518 चीनी मिलें चालू थीं, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 500 मिलें परिचालन में थीं। भारत में चीनी का विपणन सत्र हर साल अक्तूबर से सितंबर तक चलता है।
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो महाराष्ट्र में चीनी उत्पादन में सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राज्य में उत्पादन सालाना आधार पर 42.7 लाख टन से करीब 51 प्रतिशत बढ़कर 64.5 लाख टन तक पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश में उत्पादन 42.8 लाख टन से बढ़कर लगभग 46 लाख टन हो गया है। वहीं कर्नाटक में भी उत्पादन में सुधार देखने को मिला है, जहां यह बढ़कर 31 लाख टन पहुंच गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 27.5 लाख टन का उत्पादन हुआ था।
हालांकि रिकॉर्ड उत्पादन के बीच चीनी की कीमतों में लगातार गिरावट मिलों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। उद्योग संगठन का कहना है कि चीनी का भंडार तेजी से बढ़ रहा है, जिससे बाजार में दबाव बन रहा है। इसके संकेत भी मिलने लगे हैं कि गन्ना किसानों के भुगतान में देरी शुरू हो रही है और यदि मौजूदा हालात बने रहे तो बकाया राशि और बढ़ सकती है।
इसी पृष्ठभूमि में ISMA ने सरकार से चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) में जल्द संशोधन की मांग की है। संगठन का कहना है कि एमएसपी में बढ़ोतरी से न केवल चीनी मिलों की वित्तीय स्थिरता सुधरेगी, बल्कि किसानों को समय पर गन्ना भुगतान सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी।
उद्योग निकाय के मुताबिक, गन्ने की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और दूसरी ओर चीनी के बाजार भाव में गिरावट ने मिलों की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में मिलों से निकलने वाली चीनी की कीमतें घटकर लगभग 3,550 रुपये प्रति क्विंटल तक आ गई हैं, जो मौजूदा उत्पादन लागत से भी कम बताई जा रही हैं। इससे कई मिलों के लिए परिचालन खर्च निकालना मुश्किल होता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द कोई नीतिगत राहत नहीं दी गई, तो इसका सीधा असर किसानों पर पड़ सकता है। समय पर भुगतान न मिलने से किसानों की नकदी स्थिति बिगड़ सकती है, जिसका असर आगामी फसल चक्र पर भी देखने को मिल सकता है।
अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी है कि बढ़ते उत्पादन और गिरती कीमतों के बीच वह एमएसपी में संशोधन कर मिलों और किसानों दोनों को राहत देने की दिशा में क्या फैसला लेती है।
स्वर्णिम टाईम्स : Swarnim Times आपका अपना इंटरनेट अख़बार !
