Breaking News
Home / एन.सी.आर. / सोवा-रिग्पा को मिली नई पहचान, डॉ. पद्मा गुरमेट के प्रयासों की देशभर में सराहना

सोवा-रिग्पा को मिली नई पहचान, डॉ. पद्मा गुरमेट के प्रयासों की देशभर में सराहना

पद्म श्री से सम्मानित डॉ. पद्मा गुरमेट ने सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति को दिलाई नई पहचान, संरक्षण और विकास में निभाई अग्रणी भूमिका

नई दिल्ली/लेह। भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली पद्म श्री सम्मानित डॉ. पद्मा गुरमेट का नाम आज सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति के विकास और वैश्विक पहचान से जुड़ा हुआ माना जाता है। पारंपरिक तिब्बती चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में उनके दीर्घकालिक योगदान, शोध कार्यों और संस्थागत विकास के प्रयासों ने इस प्राचीन चिकित्सा प्रणाली को नई दिशा प्रदान की है। स्वास्थ्य, शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय कार्यों के कारण उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में शामिल पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

Advertisement

 

डॉ. पद्मा गुरमेट ने अपने व्यावसायिक जीवन का बड़ा हिस्सा सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति के संरक्षण, प्रोत्साहन और वैज्ञानिक विकास के लिए समर्पित किया। उन्होंने लेह स्थित राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा) के निदेशक के रूप में कार्य करते हुए इस चिकित्सा प्रणाली को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने तथा इसे आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ जोड़ने के लिए व्यापक प्रयास किए। उनके नेतृत्व में संस्थान ने शिक्षा, अनुसंधान, औषध निर्माण, दस्तावेजीकरण और जनजागरूकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं।

 

सोवा-रिग्पा हिमालयी क्षेत्र में सदियों से प्रचलित एक पारंपरिक चिकित्सा पद्धति है, जिसकी जड़ें तिब्बती चिकित्सा ज्ञान, भारतीय आयुर्वेद, यूनानी चिकित्सा और स्थानीय पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से जुड़ी हुई हैं। यह चिकित्सा प्रणाली मानव शरीर, प्रकृति और जीवनशैली के बीच संतुलन को स्वास्थ्य का आधार मानती है। लंबे समय तक यह पद्धति सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक ही केंद्रित रही, लेकिन डॉ. गुरमेट के प्रयासों ने इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आयुष मंत्रालय के अंतर्गत सोवा-रिग्पा को औपचारिक मान्यता दिलाने की दिशा में डॉ. गुरमेट का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। उन्होंने न केवल इस चिकित्सा प्रणाली की वैज्ञानिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं को रेखांकित किया, बल्कि इसके लिए आवश्यक नीतिगत ढांचे के निर्माण, शैक्षणिक मानकों की स्थापना और नियामक व्यवस्थाओं को विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से सोवा-रिग्पा को भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की मुख्यधारा में स्थान मिला और इसके अध्ययन तथा अभ्यास के लिए संस्थागत व्यवस्था मजबूत हुई।

विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली के संरक्षण के लिए उसका दस्तावेजीकरण और शोध अत्यंत आवश्यक होता है। इस दिशा में डॉ. गुरमेट का कार्य असाधारण माना जाता है। उन्होंने 1,500 से अधिक दुर्लभ ग्रंथों का व्यवस्थित सूचीकरण करवाया, जिससे वर्षों से बिखरी हुई पारंपरिक चिकित्सा संबंधी जानकारी को संरक्षित करने में सहायता मिली। इन ग्रंथों में चिकित्सा विज्ञान, औषध निर्माण, रोग निदान और उपचार पद्धतियों से संबंधित बहुमूल्य ज्ञान संकलित है।

इसके साथ ही उन्होंने 525 औषधीय पौधों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण सुनिश्चित कराया। इन पौधों का उपयोग सोवा-रिग्पा चिकित्सा प्रणाली में विभिन्न रोगों के उपचार के लिए किया जाता है। औषधीय वनस्पतियों की पहचान, संरक्षण और उपयोग संबंधी जानकारी को व्यवस्थित रूप से संकलित करने से शोधकर्ताओं, चिकित्सकों और विद्यार्थियों को महत्वपूर्ण आधार सामग्री उपलब्ध हुई है। यह कार्य जैव विविधता संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

Advertisement

डॉ. गुरमेट के नेतृत्व में 1,200 से अधिक औषधीय सूत्रों का भी व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया गया। इन सूत्रों में विभिन्न रोगों के उपचार हेतु प्रयुक्त पारंपरिक औषध संयोजनों की जानकारी शामिल है। यह प्रयास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक समय में पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान के लुप्त होने की आशंका लगातार बढ़ रही है। दस्तावेजीकरण के माध्यम से इस ज्ञान को सुरक्षित रखने और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त हुई।

डिजिटल युग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए डॉ. गुरमेट ने अनेक दुर्लभ और ऐतिहासिक पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण की पहल भी की। इस परियोजना के अंतर्गत वर्षों पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियों और ग्रंथों को डिजिटल स्वरूप में सुरक्षित किया गया। इससे न केवल इन अमूल्य दस्तावेजों को क्षति से बचाया जा सका, बल्कि शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए इन तक पहुंच भी आसान हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान संरक्षण का एक महत्वपूर्ण मॉडल प्रस्तुत करता है।

शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी डॉ. गुरमेट का योगदान उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने सोवा-रिग्पा चिकित्सा शिक्षा को व्यवस्थित और मानकीकृत बनाने के लिए कई पहल कीं। उनके प्रयासों से विद्यार्थियों के लिए बेहतर शैक्षणिक वातावरण तैयार हुआ तथा आधुनिक अनुसंधान पद्धतियों और पारंपरिक ज्ञान के बीच समन्वय स्थापित करने की दिशा में सकारात्मक परिणाम सामने आए। इससे नई पीढ़ी के चिकित्सकों और शोधकर्ताओं को इस क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रोत्साहन मिला।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में सोवा-रिग्पा चिकित्सा प्रणाली की उपयोगिता को बढ़ावा देने के लिए भी उन्होंने विभिन्न स्तरों पर कार्य किया। उनके मार्गदर्शन में उपचार पद्धतियों, औषध निर्माण प्रक्रियाओं और गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़े कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। इससे पारंपरिक चिकित्सा सेवाओं की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को मजबूती मिली तथा आम लोगों के बीच इस चिकित्सा प्रणाली के प्रति विश्वास बढ़ा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी डॉ. पद्मा गुरमेट ने सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति की पहचान स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और वैश्विक मंचों पर इस चिकित्सा प्रणाली की वैज्ञानिकता, उपयोगिता और सांस्कृतिक महत्व को प्रस्तुत किया। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप विश्व के अनेक शोध संस्थानों और चिकित्सा विशेषज्ञों का ध्यान इस पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली की ओर आकर्षित हुआ। इससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शोध गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पारंपरिक चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि डॉ. गुरमेट का कार्य केवल चिकित्सा प्रणाली के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का भी महत्वपूर्ण उदाहरण है। उन्होंने यह साबित किया कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच संतुलन स्थापित कर स्वास्थ्य क्षेत्र में नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं।

पद्म श्री सम्मान डॉ. पद्मा गुरमेट के दशकों लंबे समर्पण, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रहित में किए गए योगदान की औपचारिक मान्यता है। यह सम्मान उन सभी व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है जो भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के संरक्षण, अनुसंधान और प्रसार के लिए कार्य कर रहे हैं।

आज जब दुनिया वैकल्पिक और समग्र स्वास्थ्य प्रणालियों की ओर बढ़ रही है, ऐसे समय में डॉ. पद्मा गुरमेट का योगदान और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। उनके प्रयासों ने न केवल सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति को मजबूत आधार प्रदान किया है, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया है कि सदियों पुराना पारंपरिक ज्ञान आधुनिक युग में भी प्रासंगिक बना रहे। पारंपरिक चिकित्सा, अनुसंधान, शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में उनके कार्य आने वाले वर्षों तक प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बने रहेंगे।

Check Also

अंबाला में पशुधन को सुरक्षित रखने के लिए मेगा टीकाकरण अभियान की शुरुआत, हजारों पशुओं को मिलेगा लाभ

अंबाला जिले में पशुपालन को मजबूत बनाने और पशुओं को खतरनाक बीमारियों से बचाने के …

रफ्तार की मार: अंबाला सड़क हादसे में पिता की मौत, बेटे की बची जान, परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

हरियाणा के अंबाला शहर में एक दर्दनाक सड़क हादसे ने एक परिवार की खुशियों को …

फरीदाबाद में सफाई कर्मचारियों का बढ़ता आक्रोश, नगर निगम मुख्यालय के बाहर कूड़ा डालकर किया विरोध प्रदर्शन

फरीदाबाद शहर में पिछले एक महीने से जारी सफाई कर्मचारियों की हड़ताल अब एक नए …