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सलाखों के साए में सिमटती ज़िंदगियां: चिड़ियाघरों में बढ़ती वन्यजीव मौतें संरक्षण मॉडल पर खड़े कर रहीं सवाल

लोहे की सलाखों के पीछे सिमटी दुनिया, सीमित हरियाली, कृत्रिम तालाब और दर्शकों की लगातार मौजूदगी—क्या यही है वह जीवन, जिसे हम “संरक्षण” का नाम देते हैं? देश के चिड़ियाघरों में बीते वर्षों में हुई वन्यजीवों की मौतों के आंकड़े एक असहज सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या कैद में रखा जाना सचमुच संरक्षण है, या फिर यह केवल जीवित होने का भ्रम भर है?
केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 1 अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 के बीच देश के विभिन्न चिड़ियाघरों में 127 वन्यजीवों की मौत दर्ज की गई। इनमें चिंकारा, काला हिरण, बारहसिंगा, नीलगाय, भारतीय हॉग हिरण और चीतल जैसी प्रजातियां शामिल हैं। इससे पहले 2023-24 में 148 और 2022-23 में 125 जानवरों की मौत हुई थी। आंकड़ों का यह क्रम पिछले कई वर्षों से जारी है।


सदमे और तनाव बन रहे प्रमुख कारण
रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में 35 जानवरों की मौत “सदमे” (शॉक) से और 25 की मृत्यु शारीरिक या मानसिक तनाव के कारण हुई। 2023-24 में भी 37 मौतें शॉक और 32 तनाव से जुड़ी थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये आंकड़े केवल बीमारी या उम्र का परिणाम नहीं हैं, बल्कि कैद के माहौल में पनप रहे मानसिक दबाव की ओर संकेत करते हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक, जंगल में खुले वातावरण के आदी जानवर जब सीमित दायरे में रह जाते हैं, तो उनके व्यवहार और स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। विशेषकर शाकाहारी और संवेदनशील प्रजातियां, जैसे काला हिरण और चीतल, हल्की आवाज या अचानक हरकत से भी घबरा जाते हैं। इस भय की शारीरिक प्रतिक्रिया कई बार घातक साबित होती है।
कैप्चर मायोपैथी और पर्यावरणीय बदलाव
विशेषज्ञ “कैप्चर मायोपैथी” को भी एक बड़ी वजह मानते हैं। यह ऐसी स्थिति है जिसमें पकड़े जाने या स्थानांतरण के दौरान जानवर अत्यधिक तनाव में आ जाते हैं, जिससे उनके शरीर की मांसपेशियों और आंतरिक अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार इसके लक्षण तुरंत सामने नहीं आते, लेकिन कुछ समय बाद यह जानलेवा साबित हो सकता है।
इसके अलावा, बाड़ों में सीमित जगह, आपसी झगड़े, तापमान में बदलाव, ट्रैफिक का शोर और दर्शकों की छेड़छाड़ जैसे कारक भी वन्यजीवों के मानसिक संतुलन को प्रभावित करते हैं। लगातार भीड़ और कैमरों की चमक भी उनके स्वाभाविक व्यवहार को बाधित करती है।
2017 से अब तक 1,000 से अधिक मौतें
रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 से 2025 के बीच देश के चिड़ियाघरों में 1,000 से अधिक वन्यजीवों की मौत हो चुकी है। 2016-17 में 325, 2018-19 में 188 और 2019-20 में 172 मौतें दर्ज की गई थीं। इन वर्षों में भी सदमा और तनाव प्रमुख कारणों में शामिल रहे।
पशु कल्याण से जुड़े संगठनों का कहना है कि यह स्थिति केवल आंकड़ों का मामला नहीं है, बल्कि संरक्षण नीति की पुनर्समीक्षा की मांग करती है। “मर्सी फॉर एनिमल” से जुड़ी शिवांगी का मानना है कि जानवरों की मौत के पीछे कई कारक हो सकते हैं—अत्यधिक गर्मी, सर्दी, शोर, कैद में जीवन और मानवीय हस्तक्षेप। उनका कहना है कि जो संसाधन चिड़ियाघरों पर खर्च किए जा रहे हैं, उनका बड़ा हिस्सा प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा और जंगलों में रहने वाले वन्यजीवों की रक्षा पर लगाया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों की चेतावनी
चांदनी चौक स्थित श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर के पक्षी धर्मार्थ चिकित्सालय के डॉ. हरवतार सिंह का कहना है कि जानवरों का वास्तविक घर जंगल है। कृत्रिम माहौल में उन्हें भोजन और देखभाल भले मिल जाए, लेकिन प्राकृतिक स्वतंत्रता नहीं मिलती। इससे उनकी मानसिक स्थिति पर असर पड़ता है और वे उदासी या तनाव का शिकार हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चिड़ियाघरों में रहने की परिस्थितियों में व्यापक सुधार नहीं किया गया, तो भविष्य में मौतों की संख्या और बढ़ सकती है। बड़े और प्राकृतिक जैसे बाड़े, मानसिक उत्तेजना के साधन, शांत वातावरण और प्रशिक्षित स्टाफ की उपलब्धता बेहद जरूरी है।
संरक्षण या प्रदर्शन?
चिड़ियाघरों का मूल उद्देश्य लुप्तप्राय प्रजातियों का संरक्षण और आम लोगों में जागरूकता फैलाना है। कई मामलों में यह उद्देश्य सफल भी रहा है। लेकिन बढ़ती मौतें यह संकेत देती हैं कि संरक्षण और प्रदर्शन के बीच संतुलन साधना आसान नहीं है।
सवाल यह नहीं है कि चिड़ियाघर पूरी तरह बंद कर दिए जाएं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उनकी संरचना और प्रबंधन वर्तमान जरूरतों के अनुरूप है? क्या जानवरों के मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही प्राथमिकता दी जा रही है जितनी उनके शारीरिक उपचार को?
आगे की राह
विशेषज्ञों और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का सुझाव है कि चिड़ियाघरों को “ओपन और नेचुरल हैबिटेट मॉडल” की ओर बढ़ना चाहिए, जहां जानवरों को अधिक प्राकृतिक माहौल मिले। साथ ही, दर्शकों के व्यवहार पर सख्त नियम और निगरानी भी जरूरी है।
वन्यजीवों की बढ़ती मौतें केवल आंकड़े नहीं, बल्कि एक चेतावनी हैं। यदि हम सच में संरक्षण की बात करते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कैद में रह रहे जीव केवल सांस न लें, बल्कि स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन जी सकें। जंगल उनका असली घर है—और यदि उन्हें वहां नहीं रखा जा सकता, तो कम से कम कैद का माहौल ऐसा हो जो उनके स्वभाव और जरूरतों के करीब हो।

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