दिल्ली में किशोरों से जुड़े अपराधों के ताजा आंकड़े एक गहरी सामाजिक चिंता को सामने ला रहे हैं। खासकर दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों में नाबालिगों की संलिप्तता में 121.21 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने कानून व्यवस्था, पारिवारिक संरचना और सामाजिक निगरानी—तीनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पुलिस के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में दुष्कर्म के आरोप में 66 नाबालिगों को पकड़ा गया था, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 146 हो गई। यह वृद्धि केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस बदलती मानसिकता और सामाजिक परिस्थितियों का संकेत है, जिनमें कुछ किशोर भटकते नजर आ रहे हैं।
कुल किशोर अपराधों में भी बढ़ोतरी
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और आईपीसी के तहत दर्ज मामलों को देखें तो 2024 में 2,999 नाबालिग पकड़े गए थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 3,649 हो गई। सभी श्रेणियों को मिलाकर कुल 2024 में 3,270 और 2025 में 3,833 नाबालिग अपराध के मामलों में सामने आए। यानी कुल अपराधों में भी 21 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।
दिल्ली पुलिस अधिनियम से जुड़े मामलों में भी 17 प्रतिशत से ज्यादा का इजाफा हुआ है। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि समस्या केवल किसी एक अपराध तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक बदलाव से जुड़ी है।
क्यों भटक रहे हैं किशोर?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई परतें हैं। सबसे पहली वजह है घर और स्कूल की निगरानी का कमजोर होना। कई किशोर पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं या नियमित रूप से स्कूल नहीं जाते। माता-पिता की व्यस्त दिनचर्या और संवाद की कमी बच्चों को भावनात्मक रूप से अकेला छोड़ देती है।
टूटते संयुक्त परिवार भी एक कारण माने जा रहे हैं। पहले दादा-दादी, चाचा-चाची और अन्य रिश्तेदारों की मौजूदगी बच्चों को नैतिक मार्गदर्शन देती थी। अब एकल परिवारों में यह सहारा कम होता जा रहा है।
सोशल मीडिया और डिजिटल प्रभाव
इंटरनेट और सोशल मीडिया ने किशोरों की दुनिया को तेजी से बदल दिया है। गैंगस्टर संस्कृति, हथियारों के प्रदर्शन और आक्रामक छवि को महिमामंडित करने वाले वीडियो कुछ युवाओं को आकर्षित करते हैं। लोकप्रियता और ‘हीरो’ बनने की चाह कई बार उन्हें गलत कदम उठाने की ओर धकेल देती है।
किशोरावस्था में जिज्ञासा स्वाभाविक है, लेकिन अनियंत्रित डिजिटल सामग्री रिश्तों और जिम्मेदारियों की समझ को प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि डिजिटल साक्षरता और अभिभावकीय निगरानी आज पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।
गैंग और नशे का जाल
कुछ आपराधिक गिरोह नाबालिगों को आसान लक्ष्य मानते हैं। उन्हें पैसों, रोमांच या नशे का लालच देकर छोटे-मोटे अपराधों में शामिल किया जाता है। कानून के तहत कम सजा मिलने की धारणा भी ऐसे गिरोहों को किशोरों का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करती है।
रोकथाम के प्रयास
दिल्ली पुलिस और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने स्थिति से निपटने के लिए कई पहल शुरू की हैं। स्कूलों और बस्तियों में जागरूकता कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं, युवा क्लब और नशामुक्ति अभियान चलाए जा रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों और एनजीओ की मदद से परामर्श सत्र आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि किशोरों को सकारात्मक दिशा दी जा सके।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून प्रवर्तन पर्याप्त नहीं होगा। परिवार, स्कूल, समाज और डिजिटल प्लेटफॉर्म—सभी को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी। संवाद, भावनात्मक सहयोग और नैतिक शिक्षा को फिर से केंद्र में लाना होगा।
एक साझा जिम्मेदारी
किशोर अपराध का बढ़ना केवल पुलिस या अदालत का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज का दर्पण है। आंकड़े चेतावनी देते हैं कि यदि समय रहते व्यापक और संवेदनशील कदम नहीं उठाए गए, तो समस्या और गहरी हो सकती है।
जरूरत है कि बच्चों को केवल अनुशासन से नहीं, बल्कि समझ और मार्गदर्शन से जोड़ा जाए। सही वातावरण, सकारात्मक रोल मॉडल और निरंतर संवाद ही उन्हें अपराध की राह से दूर रख सकते हैं।
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