आगरा के ग्रामीण इलाके में सामने आई एक घटना ने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक मामूली विवाद में हिरासत में लिए गए 10वीं के छात्र को पुलिस चौकी में बेरहमी से पीटा गया, जिससे उसका हाथ टूट गया। परिवार का कहना है कि अब वह बोर्ड परीक्षा नहीं दे पाएगा और उसका पूरा साल बर्बाद हो जाएगा

घटना सामने आने के बाद मामला तेजी से तूल पकड़ गया। जब यह खबर मीडिया तक पहुंची तो प्रशासन हरकत में आया। मामले को संज्ञान में लेते हुए आदित्य कुमार ने जांच के आदेश दिए। प्रारंभिक जांच में आरोप सही पाए जाने पर संबंधित दो दरोगाओं को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।
बताया जा रहा है कि विवाद की शुरुआत गांव के दो किशोरों के बीच हुई मामूली कहासुनी से हुई थी। दोनों पक्षों ने पुलिस से शिकायत की, जिसके बाद पुलिस ने फोन पर समझाइश देकर मामला शांत करा दिया था। परिवार को लगा कि मामला खत्म हो गया है। लेकिन अगले ही दिन घटनाक्रम ने अचानक भयावह मोड़ ले लिया।
परिवार के मुताबिक, छात्र परीक्षा देकर घर लौटा ही था कि पुलिस चौकी से दो दरोगा उसके घर पहुंच गए। उन्होंने कहा कि शिकायत आई है और पूछताछ के लिए दोनों लड़कों को चौकी चलना होगा। छात्र के पिता उस समय घर पर नहीं थे, इसलिए परिजन उसे लेकर चौकी पहुंच गए।
चौकी में दूसरे पक्ष को भी बुलाया गया। वहां पूछताछ के दौरान दूसरे लड़के को तो छोड़ दिया गया, लेकिन छात्र को रोक लिया गया। परिवार का आरोप है कि उन्हें कहा गया कि पूछताछ के बाद डेढ़ घंटे में उसे छोड़ दिया जाएगा। इस भरोसे परिजन घर लौट आए।
लेकिन जब वे दोबारा चौकी पहुंचे, तो मामला बदल चुका था। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने छात्र को छोड़ने के बदले पैसे की मांग की। परिजनों ने आर्थिक तंगी का हवाला देकर रकम देने से मना कर दिया। इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया।
परिवार का कहना है कि पैसे न देने पर छात्र को चौकी के भीतर बांधकर पीटा गया। पट्टों और डंडों से की गई पिटाई में उसका हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया। दर्द से कराहते हुए उसे देर शाम छोड़ा गया। जब वह घर पहुंचा तो पूरी रात दर्द से तड़पता रहा।
अगली सुबह डॉक्टर को दिखाया गया तो एक्स-रे में उसके हाथ में फ्रैक्चर निकला। डॉक्टरों ने हाथ पर प्लास्टर चढ़ा दिया। इसके बाद परिवार को समझ आया कि अब वह बोर्ड परीक्षा नहीं दे पाएगा, जिसके लिए वह महीनों से तैयारी कर रहा था।
यह खबर गांव में आग की तरह फैल गई। लोग आक्रोशित हो उठे और पुलिस पर कार्रवाई की मांग करने लगे। परिवार अधिकारी से शिकायत करने गया, लेकिन उस समय अधिकारी ड्यूटी पर बाहर थे। इसके बाद मामला मीडिया में पहुंचा और प्रशासन ने तत्काल संज्ञान लिया।
जांच के लिए एसीपी स्तर के अधिकारी को पीड़ित के घर भेजा गया। प्रारंभिक जांच में चोट की पुष्टि हुई और यह भी पाया गया कि छात्र को चौकी में रोका गया था। इसके बाद दोनों दरोगाओं को निलंबित कर दिया गया। पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आगे एफआईआर दर्ज की जाएगी।
इस घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या मामूली विवाद में किशोर को हिरासत में लेना जरूरी था? क्या पूछताछ के नाम पर बल प्रयोग किया गया? क्या पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही की कमी है?
विशेषज्ञों का मानना है कि किशोरों से जुड़े मामलों में पुलिस को संवेदनशीलता बरतनी चाहिए। कानून भी नाबालिगों से पूछताछ के दौरान विशेष नियमों का पालन करने की बात करता है। लेकिन ऐसे मामलों से लगता है कि जमीनी स्तर पर नियमों का पालन हमेशा नहीं होता।
शिक्षकों का कहना है कि बोर्ड परीक्षा छात्रों के जीवन का अहम पड़ाव होती है। एक साल का नुकसान उनके भविष्य पर गहरा असर डाल सकता है। इसलिए प्रशासन को ऐसे मामलों में सिर्फ कार्रवाई ही नहीं, बल्कि पीड़ित छात्र के भविष्य के लिए भी विशेष कदम उठाने चाहिए।
परिवार की मांग है कि दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो और छात्र को परीक्षा देने का विशेष अवसर दिया जाए। गांव के लोग भी चाहते हैं कि इस मामले में निष्पक्ष जांच हो, ताकि भविष्य में कोई और छात्र ऐसी यातना का शिकार न बने।
घटना ने यह भी दिखा दिया कि पुलिस और जनता के बीच भरोसे का रिश्ता कितना नाजुक है। एक तरफ पुलिस सुरक्षा का प्रतीक मानी जाती है, तो दूसरी तरफ ऐसे आरोप लोगों के मन में डर पैदा करते हैं।
अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर है। अगर आरोप पूरी तरह साबित होते हैं, तो यह मामला पुलिस सुधार और जवाबदेही पर फिर से राष्ट्रीय बहस छेड़ सकता है।
यह घटना सिर्फ एक छात्र की पीड़ा नहीं, बल्कि उस भरोसे पर चोट है जो समाज कानून और व्यवस्था से करता है।
स्वर्णिम टाईम्स : Swarnim Times आपका अपना इंटरनेट अख़बार !