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वर्ल्ड स्लीप डे: मोबाइल और सोशल मीडिया ने छीनी युवाओं की नींद, बढ़ रहा अवसाद और आत्महत्या का खतरा

आज की डिजिटल दुनिया में युवाओं की जीवनशैली तेजी से बदल रही है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और देर रात तक स्क्रीन के सामने बिताया जाने वाला समय उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। लेकिन इस बदलती आदत का सबसे बड़ा असर उनकी नींद पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि युवाओं में घटती नींद न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डाल रही है। यही कारण है कि अब कम नींद को अवसाद, आक्रामक व्यवहार और आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति से भी जोड़ा जा रहा है।

वर्ल्ड स्लीप डे के अवसर पर सामने आए आंकड़ों और विशेषज्ञों की चेतावनियों ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में यह समाज के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

युवाओं की नींद पर डिजिटल जीवनशैली का असर

आज के समय में अधिकांश किशोर और युवा देर रात तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, वीडियो देखना, ऑनलाइन गेम खेलना या दोस्तों से चैट करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। यही वजह है कि सोने का समय लगातार पीछे खिसकता जा रहा है।

नींद विशेषज्ञों के अनुसार देर रात तक मोबाइल स्क्रीन देखने से शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी यानी “सर्केडियन रिद्म” प्रभावित होती है। मोबाइल और लैपटॉप की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी दिमाग को यह संकेत देती है कि अभी दिन है, जिससे शरीर में नींद लाने वाला हार्मोन मेलाटोनिन कम बनने लगता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति को देर तक नींद नहीं आती और नींद की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है।

अधिकांश किशोर नहीं ले पा रहे पर्याप्त नींद

विभिन्न अध्ययनों के अनुसार दुनिया भर में बड़ी संख्या में किशोर पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि लगभग 60 से 70 प्रतिशत किशोरों को रोजाना जरूरी नींद नहीं मिल रही है।

अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 73 प्रतिशत हाई स्कूल के छात्र स्कूल के दिनों में आठ घंटे से भी कम सोते हैं। जबकि विशेषज्ञों के अनुसार किशोरों के लिए रोजाना कम से कम 8 से 10 घंटे की नींद बेहद जरूरी होती है।

भारत में भी स्थिति इससे अलग नहीं है। विभिन्न शोधों और सर्वेक्षणों में सामने आया है कि देश में लगभग 80 से 90 प्रतिशत किशोर किसी न किसी स्तर पर नींद की कमी का सामना कर रहे हैं। कई अध्ययनों में पाया गया है कि करीब 64 प्रतिशत किशोर आठ घंटे या उससे कम समय तक ही सो पाते हैं।

नींद की कमी से बढ़ता आक्रामक व्यवहार

कम नींद का असर केवल शरीर पर ही नहीं बल्कि व्यवहार पर भी साफ दिखाई देता है। शोध बताते हैं कि जिन किशोरों की नींद पूरी नहीं होती, उनमें चिड़चिड़ापन, गुस्सा और आक्रामकता अधिक देखने को मिलती है।

अध्ययनों के अनुसार जो किशोर रात में सात घंटे से कम सोते हैं, उनमें आक्रामक व्यवहार की संभावना आठ घंटे या उससे अधिक सोने वाले किशोरों की तुलना में लगभग डेढ़ से दो गुना ज्यादा होती है।

स्कूलों में किए गए सर्वेक्षणों से भी यह सामने आया है कि जिन छात्रों को पर्याप्त नींद नहीं मिलती, उनमें झगड़े और बुलिंग की घटनाएं अधिक होती हैं। आंकड़ों के अनुसार नींद की कमी से जूझ रहे किशोरों में मारपीट, झगड़े और बुलिंग के मामले 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक देखे गए हैं।

अवसाद और आत्महत्या से भी जुड़ रहा संबंध

विशेषज्ञों का कहना है कि नींद की कमी का संबंध मानसिक स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। जब व्यक्ति को लगातार कम नींद मिलती है, तो उसका मानसिक संतुलन प्रभावित होने लगता है।

कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह पाया गया है कि जिन लोगों को लंबे समय तक नींद से जुड़ी समस्याएं रहती हैं, उनमें अवसाद और चिंता की समस्या अधिक देखने को मिलती है। यही नहीं, ऐसे लोगों में आत्महत्या के विचार आने और आत्महत्या का प्रयास करने का खतरा भी सामान्य लोगों की तुलना में दो से तीन गुना तक अधिक हो सकता है।

युवाओं और किशोरों के मामले में यह समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि इस उम्र में मानसिक और भावनात्मक विकास तेजी से होता है। अगर इस समय नींद पूरी नहीं हो पाती, तो उसका असर उनकी सोच, व्यवहार और निर्णय लेने की क्षमता पर भी पड़ता है।

देश में बढ़ते आत्महत्या के आंकड़े

भारत में आत्महत्या के बढ़ते मामले भी इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार देश में आत्महत्या के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है।

आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013 में देश में आत्महत्या के करीब 1.34 लाख मामले दर्ज किए गए थे। वहीं 2023 तक यह संख्या बढ़कर 1.71 लाख से अधिक हो गई।

छात्रों में आत्महत्या के मामलों में भी चिंताजनक बढ़ोतरी देखी गई है। वर्ष 2013 में जहां छात्र आत्महत्या के 8,423 मामले दर्ज किए गए थे, वहीं 2023 में यह संख्या बढ़कर 13,892 तक पहुंच गई। यानी करीब 65 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

हालांकि आत्महत्या के पीछे कई कारण होते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक तनाव, अवसाद और नींद की कमी भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विशेषज्ञों की चेतावनी

नींद विशेषज्ञों का कहना है कि अच्छी और पर्याप्त नींद संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। कलकत्ता स्लीप सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. उत्तम अग्रवाल के अनुसार अगर लोग अपनी जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव करें तो नींद से जुड़ी कई समस्याओं से बचा जा सकता है।

उनका कहना है कि युवाओं को सोने से कम से कम एक घंटे पहले मोबाइल और अन्य स्क्रीन का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। इसके अलावा नियमित समय पर सोने और जागने की आदत भी विकसित करनी चाहिए।

समाधान क्या हो सकता है

विशेषज्ञों के अनुसार इस समस्या से निपटने के लिए परिवार, स्कूल और समाज सभी को मिलकर प्रयास करना होगा। माता-पिता को बच्चों की डिजिटल आदतों पर नजर रखनी चाहिए और उन्हें समय पर सोने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

स्कूलों में भी छात्रों को नींद और मानसिक स्वास्थ्य के महत्व के बारे में जागरूक किया जाना जरूरी है। अगर किशोर सही समय पर पर्याप्त नींद लेते हैं, तो इससे न केवल उनका शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर होगा, बल्कि मानसिक संतुलन भी मजबूत रहेगा।

निष्कर्ष

डिजिटल युग में जहां तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। युवाओं की नींद पर बढ़ता खतरा उन्हीं चुनौतियों में से एक है। अगर समय रहते इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और समाज पर भी पड़ सकता है।

इसलिए जरूरी है कि हम तकनीक का उपयोग संतुलित तरीके से करें और अपनी दिनचर्या में पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद को प्राथमिकता दें। यही स्वस्थ जीवन और मजबूत मानसिक स्वास्थ्य की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है।

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